पीली सरसों चन्द्रमुखी संग !

पीली सरसों चन्द्रमुखी संग, मन बगिया में खिलती देखी;
अद्भुत सुन्दर मन मोहक छवि, स्वप्न खेत बिच भायी नीकी!

आए चले संग पगडंडी, वाहन किसी अजब बहुरंगी;
स्वैटर पहन बान्द्री निकली, जंगल ओर गई वो टहली !

अभिनव दुर्लभ शोभा लख कर, अति आनन्द रहा मन छाई;
खींचन चाहा चित्र फ़ोन से, तभी गई निद्रा सुधि आई !

उससे पूर्व रहे दुविधा में, उद्योगों की किसी कड़ी में;
चले गए थे सारथि रथ में, पहुँचे शहर अटारी पल में !

खण्डहरों की चोटी देखे, यमुन धार ढ़िंग बहती चोखी;
ध्यान करन ‘मधु’ प्रभु का चाहे, दृग त्रिलोक गति रहे विलोकी!

✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’

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