लेखक परिचय

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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भविष्य की कहानी क्या ऐसी होगी
rashtrawadi       दरवाजे पर दस्तक हुई|”मम्मा मम्मा, बाहर कोई दरवाजा पीट रहा है”एक
दस ग्यारह साल के बेटे ने अपनी मां को आवाज़ लगाई|
“अब इतनी रात गये कौन आ गया”,वह बड़बड़ाआई|”पूछो कौन है,क्या काम है
इतनी रात को?”उसने किचिन में से ही जोर से चिल्लाकर बेटे को समझाइश दी|
बेटे ने वैसा ही किया तो बाहर से आवाज़ आई”दरवाजा खोलो मैं हि‍दु हूं
जरूरी काम है|”
“अरे बाप रे हिंदु”,बेटा डर गया|
“माँ कोई हिंदु है, कहता है दरवाज़ा खोलो जरूरी काम है|”बेटा चिल्लाकर
बोला|
माँ घबड़ाकर बाहर के कमरे में आ गई”कौन है क्या काम है?”अब माँ ने पूछा|
“देखिये मैं राष्ट्र वादी हिंदु हूं}कृपया दरवाज़ा खोल दें आप लोगों से
बहुत ही जरूरी बात करना है|”
राष्ट्र वादी हिंदु और इतनी रात को, यह राष्ट्रवादी हिंदु तो
साम्प्रदायिक होता है वह सिहर गई,राष्ट्रवादी हिंदु हैं तो राष्ट्र के पास
जाये यहां  क्यों  आ मरा?”वह बड़बड़ाने लगी|
“अजी सुनते हो ,बाहर कोई  राष्ट्रवादी हिंदु दर‌वाजा खोलने के लिया कह रहा
है”वह अपने पति रमेश को आवाज़ देने लगी|
पति महॊदय धड़धड़ाते हुये ऊपरी मंजिल से नीचे आ गये| “क्या कहा, राष्ट्र
वादी हिंदु?इतनी रात गये यहां,यहां उसका क्या काम है?”देखिये इतनी रात को
हम दरवाज़ा नहीं खोल सकते|आप राष्टवादी हिंदु है,राष्ट्रवादी हिंदु देश से
प्रेम करता है और हमारे देश में जो देश सॆ प्रेम करता है वह साम्प्रदायिक
होता है|आप जाईये प्लीस|”
“देखिये मैं राष्ट्रवादी हिंदु………आप से आवश्यक
काम…………….|”
“आप जाईये|”रमेश दहाड़ा|
इधर रमेश की पत्नी ने फोन उठाया और पड़ोसियों को सूचना देने लगी बाहर
राष्ट्रवादी हिंदू घूम रहा है कोई दरवाजा न खोले प्लीज़|

7 Responses to “राष्ट्र वादी”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ.मधुसूदन

    सुरीनाम की एक बडी हिन्दु संस्था में, घटी हुयी एक सत्य घटना सुनायी।

    एक दाह संस्कार पर गडबडी में गलत मंत्र पढे गए। बेचारों को अर्थ का पता तो था नहीं। संस्कृत भी अधूरी समझ में आती थी–या नहीं? पता नहीं।

    वास्तव में जो मंत्र पढे गए, वे विवाह के मंत्र थे।
    बोलिए। क्या कहोगे?

    कभी हम अपनी परम्पराओं को इतनी खो देंगे, कि अर्थ का अनर्थ हो सकता है।
    एक वेदान्त की कॉन्फ़ेरेन्स में देखा, कि संस्कृत वर्तनी की अनगिनत अशुद्धियाँ दिखी। और वें भी देवनागरी में। शोध पत्र सारे अंग्रेज़ी रोमन में पर संस्कृत उद्धरण –जब देखें तो प्रत्येक पंक्ति में गलती।
    अंग्रेज़ी वर्तनी में गलती थी नहीं। होती तो लजा जाते। क्षमा माँगते।
    पर देवनागरी वर्तनी। भाई अपनी भाषा में हम अपनत्व के कारण गलती करने का अधिकार रखते हैं।
    सही है न?

    बडे बडॆ विद्वान? –विलम्ब अभी भी हो ही चुका है।
    धरोहर धरोगे नहीं, तो, हरी जाएगी, फिर हरी हरी करना!
    कभी हमारी अगली पीढी देवनागरी की लिखावट देख कर पूछेगी, ये कौनसी लिपि है?

    कवि-लेखक को शत शत धन्यवाद।

    पण्डितों को भी धन्यवाद, आपके बिना दूसरा पहलु कौन प्रकाशित करता?

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  2. आर. सिंह

    आर.सिंह

    यह राष्ट्रवादी हिन्दू किस जाति से ताल्लुक रखता है? क्या आज के भारत में ऐसा हिन्दू भी है ,जो जाति पाति ,अगड़े पिछड़े और दलित इत्यादि के भेद भाव से ऊपर हो? हो सकता है कि उसने केवल आम आदमी को बहकाने के लिए ढोंग रचा हो?

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    • डॉ. मधुसूदन

      Dr. Madhusudan

      आ. सिंह साहब-

      संघ में राष्ट्रीय संस्कार दिए जाते हैं। सारे स्वयंसेवक राष्ट्रवादी होनेका प्रयास करते हैं। आज उन्हीं के कारण आशा की किरण दिखाइ देती है। भारत के बाहर यहां अमरिका का, प्रत्यक्ष अनुभव भी इसी सत्य की पुष्टि करता है। परिपूर्णता की ओर सारे प्रयासरत ही होते हैं।
      इनके शिविरों में कोई भेदभाव नहीं होता।
      श्री. गुरुजी ने स्वयंसेवकों को, संघ को नहीं, पर राष्ट्र को प्रधानता देनें का परामर्श दिया था। इससे बढकर कोई राष्ट्रीय संस्था नहीं जानता।
      जो भारत का नागरिक, भारत को पुण्यभूमि, या मातृभूमि, या पितृभूमि, या कर्मभूमि, या धर्मभूमि मानता है; और जिसकी निष्ठाएं भारत की सर्वसमन्वयी संस्कृति में हैं, उन्हें राष्ट्रीय ही माना जाता है।
      मैं संघ को आजका अवतार मानता हूं।
      उसीके कारण अनेक संस्थाएं कार्यरत है।
      बाकी प्रायः अंधेरा दिखता है।

      Reply
      • आर. सिंह

        आर.सिंह

        डाक्टर साहब, मैं आपके विचारों का बहुत सम्मान करता हूँ. सैद्धांतिक रूप से आप एक दम सही हैं,पर हकीकत कुछ और है. १९९० के मंडल कमंडल के खेल में भारत पूर्ण रूप से बँट चुका है बिहार जैसे राज्यों में तो आर. एस. एस में जातीयता पहले से ही दिखने लगी थी. आज जब सुशील मोदी नरेन्द्र मोदी को बीजेपी का प्रधान मंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित किये जाने पर यह कहते हैं कि इससे उत्तर प्रदेश और बिहार का अति पिछड़ा वर्ग नरेन्द्र मोदी के चलते बीजेपी के पक्ष में आयेगा,तो वे किस राष्ट्र वाद और राष्ट्रवादी के बारे में बात करते हैं?

        Reply
        • डॉ. मधुसूदन

          Dr. Madhusudan

          आ. सिंह साहब–
          (१)संघ और बी जे पी में अंतर कीजिए।
          एक आदर्श सत्तासे दूर, और दूसरी क्षेत्रमें रत है।
          (२)आदर्श और वास्तविकता अनादिकाल से ही अलग ही होती रही है।
          संघ १०० % आदर्श दिशा दिखाता है। यहां प्रान्तवाद, जातिवाद, भाषावाद, संप्रदाय वाद—कुछ नहीं होता। केवल राष्ट्र्वाद अवश्य होता है। और फिर भी मैं ने सुक्श्म्मतिसूक्ष्म वास्तविकता संघ में ही देखी है।
          महाराष्ट्र के, तथाकथित ब्राह्मणों के अनुभव भरसक हुए हैं। शिविरोमें गया हूं।
          मेरी जानकारी भी है, और अनुभव भी।
          (३) मैं भी गांधीवादी परिवार में जन्मा हूं।
          सारे पूर्वाग्रहों से ग्रस्त था।
          जब तक भांडा पूर्वाग्रह रूपी जूठन से लथ पथ होता है, कितना भी शुद्ध जल डालिए, स्वच्छ नहीं होगा।
          जल ही जूठा हो जाता है। ऐसे अनुभव से भी उपर उठ सका। कठिन ही था।
          ऋतम्भरा दृष्टि (पातन्जल योग दर्शन ) से शायद आप के पूर्वाग्रह मिट जाएं।
          ध्यान में अनुभव किया होगा।
          मैं संघ की मेरे अनुभव से सिद्ध, बात कर रहा हूं।
          राजनीति===>
          राजनीति में समझौता होता है। आज के सभी पर्यायोमें मोदी मुझे सर्वश्रेष्ठ प्रतीत होता है।
          आपको कौन? बोलिए।
          बिंदू से भी कुछ अलग लिख गया-पर मेरे मनकी बात कह गया।
          आपका मित्र मधुसूदन। अमरिका आए तो अवश्य भेंट करें।

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          • आर. सिंह

            आर.सिंह

            डाक्टर साहब,धन्यवाद. मैं शायद कभी भी किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं रहा. बीजेपी और संघ का अगर भेद हो भी तो वह उतना स्पष्ट नहीं है. मैं संघ का स्वयं सेवक तो कभी नहीं रहा,पर संघ को नज़दीक से केवल देखा हीं नहीं ,उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम भी किया है. ख़ासकर आपातकाल या उसके पहले जब . जे. पी. आंदोलन बहुत जोरो पर था,उस समय मैने बहुत ऐसे काम भी किए थे, जो मेरे पद से मेल नहीं खाता था और शायद इसी लिए किसी को उन कामों में मेरे सम्मिलित होने का शक भी नहीं हुआ,पर मुझे लगा था कि ये काम उस समय देश के लिए आवश्यक थे, अतः आज तक उसके लिए कोई पश्चाताप भी नहीं है. इसीलिए संघ की अच्छाइयों और खामियों से मैं बहुत हद तक परिचित हूँ. मैं सब बातें यहाँ लिख भी नहीं सकता. रही बात नरेंद्र मोदी के विकल्प की तो मैं टीना में विश्वास नहीं करता हाँ यह अवश्य है कि उनके मुकाबले राहुल गाँधी का नाम लेना भी मैं नरेंद्र मोदी का अपमान समझता हूँ.
            जहाँ तक अमेरिका पहुँचने की बात है तो देखिए,फिर कब संयोग बनता है. आपको पुनः धन्यवाद.

  3. ​शिवेंद्र मोहन सिंह

    हा हा हा…. बहुत सुंदर प्रस्तुति

    Reply

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