पेट को प्रसन्न करिए ….

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रविकिरण महाजन

एक उल्टे विचार की सीधी शुरूआत : 

मेरे एक चाचाजी को अपने साथ मैं योग्याभासी मंडल में ले गया, उन्हें पेट का पुराना रोग था। आदरणीय रामभाऊ ने उनकी जांच पड़ताल की। सब कुछ होने के बाद, बाहर आने पर मैंने पूछा ” रामभाऊ इन्हें क्या हुआ ? ” वह अपने अंदाज में झट से बोले, “कुछ नहीं रे! माथे पर तनाव रेखायें हैं अतः पेट में भी तनाव लकीरें उमटी हैं । यह सुनकर मैं सोच में पड़ गया।

मैं विचार करने लगा । “मुड ऑफ ” रहने पर काम करने की इच्छा नहीं होती, शरीर में आलस छा जाता है । यह मेरा पक्का अनुभव है । परन्तु यह केवल ” वन वे ट्रेफिक ” है क्या? मुझे पडा हुआ एक उल्टा प्रश्न.. हमारा शरीर एक विशाल, अद्भुत, आश्चर्य कारक, एक महान् रहस्य है ! अपने ह्रदय को ही लीजिए, एक दिन में सात हजार पांच सौ लीटर रक्त शरीर में अखण्ड प्रवाहित करता है । हमारी पाचन क्रिया इतनी महान है कि आधुनिक विज्ञान को भी इसे हजम करना दुष्कर है । हमारे पाचन क्रिया की शुरुआत ओठों से होती हुई सीधे मूलाधार तक जाती है । इस इक्कीस फुट की लम्बी यात्रा में कितनी ही रासायनिक प्रक्रियाये घटती हैं, इसका अंदाज लगाना आधुनिक विज्ञान की भी समझ के परे है । उदाहरण के तौर पर हमारा यकृत (जिगर): वैज्ञानिकों की जानकारी में पांच सौ से भी ज्यादा कार्य सरलता से करता है । वैज्ञानिकों के अनुसार यह और भी हजारों कार्य करता होगा, जिसकी जानकारी हमें ज्ञात नहीं है । कुछ अमीनो अम्लों को श्रृंखला बद्ध करने के लिए, हमारी अत्याधुनिक प्रयोगशालाओ को दो-दो महीने लग जाते हैं, यह कार्य हमारा यकृत चंद एक से डेढ़ सेकंड में करता है । है न आश्चर्यजनक!

हमारे शरीर के उपयोगी महत्वपूर्ण घटक और कार्य हेतु लगने वाली उर्जा का निर्माण तथा अन्न का पचन के बाद बचे हुए द्रव्य का मल में रूपांतरण करना, इस महान् पाचन क्रिया का इतना महान् उद्देश्य होगा, यह मुझे कुछ-कुछ हजम नहीं हुआ । जैसे मन का प्रभाव शरीर पर होता है वैसे शरीर भी मन को प्रभावित करता है क्या? इस पर कुछ एक आधुनिक वैज्ञानिक खोजें तथा आयुर्वेद सहायक हुआ । जैसे मनोकायिक ( psycho-somatic ) परिणाम होते हैं वैसे ही काया मानसिक ( somatic-psochic) परिणाम भी होते हैं । हमारे पाचन क्रिया का मन पर क्या परिणाम होता है और यह कैसे निष्पन्न करती है?

” जैसा आहार वैसा मन ” यह कहना सही है क्या ? इसकी संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करना ही इस संक्षिप्त लेख का उद्देश्य है ।

हमारा शरीर एक महान् प्राणिसंग्रहालय है….

 हमारे शरीर में सिर से लेकर पांव तक अनेक सूक्ष्म जीव रहते हैं । वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे शरीर में करीब-करीब चालीस ट्रिलियन कोशिकाएं हैं….सूक्ष्म जीवों की संख्या कोशिकाओं की दस गुना होनी चाहिये । अकेले बडी आंत्र में इनकी एक हजार से ऊपर प्रजाति है । संख्या साधारणतः 10^14 ( एक करोड़ करोड़ ) बाप रे ! इस धरती पर जितने जीव जंतु हैं उनसे थोडे से ज्यादा सूक्ष्म जीव हमारे शरीर में ( अंदर व बाहर ) निवास करते हैं । इसे विज्ञान में ” माइक्रो बायोटा ” कहते हैं ।

हमारे जीनोम के साथ साथ उनका ( सूक्ष्म जीव ) जीनोम भी हमारे अस्तित्व के लिए अत्यावश्यक है । इसे “माइक्रो बायोम ” कहते हैं । इतनी बडी संख्या में पाये जाने वाला यह कोश, हमारे शरीर में क्या करता है ? हमारे जीने में उसका कोई संबंध है क्या ? हमारे शरीर के कार्य कलाप इनसे संबंधित हैं क्या ? वैज्ञानिक इस कोश के कार्यों को देख कर अचंभित हैं । वैज्ञानिकों ने अनेक आन्तरिक संबंध खोज निकाले हैं । हमारे शरीर एवं इनके कार्य के आपस में अनेक घनिष्ठ संबंध हैं । वैज्ञानिकों का अंदाज है कि यह कोश और भी अनेक रहस्यमय कार्य करता होगा ! इसके अनुसंधान के लिए अथक प्रयास जारी हैं । इसका एक महत्त्वपूर्ण संबंध, हमारी पाचन संस्था का हमारे मस्तिष्क पर होने वाले परिणाम । इस कोश के कार्यों के संदर्भ में यहाँ पर विस्तृत जानकारी देना दुष्कर है । परन्तु इस विषय को समझने के लिए कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे अधोलिखित हैं ।

प्रतिकार शक्ति बढाना एवं घटाना, विशिष्ट रोगों के लिए प्रतिकार शक्ति प्रदान करना, उम्र के अनुसार होने वाले परिवर्तनों को कम ज्यादा करना, ऐसे महत्वपूर्ण कार्य यह कोश करता है ।

  • मधुमेह के रोगी का रात्रि को चोरी से मिठाई खाना,  यह कृति के लिए कोश जवाबदार है, ऐसा वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है ।
  • अनेक प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक रोगों को उत्पन्न करना, उनको कम ज्यादा करना इसका काम है ।
  • बडी आंत्र से महत्वपूर्ण घटक अलग करना, अनेक उपयोगी द्रव्यों का निर्माण, रेशेदार अन्न को ज्यादा से ज्यादा उपयोग में लाना, मल के स्वरूप का निर्धारण का कार्य भी यह कोश करता है।
  • K, B2, B9, B12 के समान महत्वपूर्ण जीवन सत्व तैयार करना भी कोश का काम है ।

पाचन संस्था का एक महत्त्वपूर्ण घटक बडी आंत्र है । यहां पर मात्र शारीरिक ही नहीं मानसिक रोग भी उत्पन्न होते हैं , यह आश्चर्य की बात है । इसके निर्माण में जीव कोश की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है । यदि एसे रोगों का निर्माण कोश करते हैं तो निश्चित ही, इनका और मस्तिष्क का कुछ तो संबंध है । यह सब कैसे होता है ? इतनें सूक्ष्म जीव मस्तिष्क से कैसे संवाद करते हैं ? यह जानना बहुत ही अत्यंत महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है ।

पाचन संस्था का मस्तिष्क पर होने वाले परिणाम:

छोटी आंत्र का मन और मस्तिष्क पर खुब परिणाम होता है । यह एक स्वतंत्र विषय है । फिलहाल हम बडी आंत्र का मस्तिष्क में क्या परिणाम होता है देखेंगे । मजेदार बात यह है कि ये सूक्ष्म जीव, हमारी आंत्र की प्रतिकार शक्ति से संबंधित घटक तथा अन्तर श्लेष्मा की परतें ( mucus membrane ) के साथ मिलकर अनेक रासायनिक द्रव्य बनाते हैं । इन्हें neuro transmitters कहते हैं ।

ये द्रव्य रक्त में मिलकर मस्तिष्क में पहुँचते हैं, और क्या कहने ! इन दूतों के संदेशानुसार हमारा मस्तिष्क नाचने लगता है । ये संदेश,हमारे मन, मस्तिष्क तथा शरीर के लिए उपयोगी होते हैं , पर कभी-कभी घातक रोगों का निर्माण भी करते हैं । हमारे मन पर बहुत परिणाम करने वाला Serotonine नामक द्रव्य का निर्माण ये जीव करते हैं, वह भी कुल उत्पादन का नब्बे प्रतिशत । हमारे शरीर में निर्मित कुल उर्जा का दस प्रतिशत उत्पादन बडी आंत्र द्वारा होता है ।Tryptophan, Serotonine, dopamine, IL6,Butyrate, proponate, Acetate, Leptines, Tryosine, SFC ( Short Chain Fatty acids) ,BNDF, GABA etc.

ऐसे अनेक ग्यात व अग्यात द्रव्यों का निर्माण प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कर हमारे रक्त में छोड़कर, सीधे हमारे मस्तिष्क में पहुँचाने का कार्य ये जीव करते हैं । ये सहज ही मनचाहे परिणाम प्राप्त करते हैं । अब आपकी समझ में आया होगा कि क्यों मधुमेह के रोगी रात्रि को चोरी से मिठाई खाते हैं ? इसका शरीर पर क्या परिणाम होता है ?

Very ” SAD “

सिज़ोफ्रेनिया, अल्जाइमर और डिप्रेशन ये कुछ् प्रमुख रोग हैं ।स्वमग्नता ( उद्विग्नता) , विस्मृती, ADHD, मानसिक तनाव, मोटापा ऐसे अनेक रोग उत्पन्न होते हैं । जिस प्रकार के जंतु, उस प्रकार के संदेश और उसी प्रकार के रोग अथवा आपको स्वस्थ रखने वाले अच्छे संदेश ! आपके जंतु का प्रकार किस पर निर्भर है ? किस बात पर आधारित है कि ये सूक्ष्म जीव हमारे बडी आंत्र में उत्पन्न होते हैं । हमारे जेनेटिक्स के अलावा यह प्रजाति किस बात पर निर्भर है तो वह है हमारा आहार… मानसिक तनाव, प्रतिजैविक औषधि, जंतु संसर्ग, रसायन एवं प्रदूषण, इन सबका इन कोशों पर अत्यंत दोषकारक परिणाम होता है । और यह भी महत्वपूर्ण है जैसा आहार वैसा मन….इन जंतुओ का मुख्य भोजन है हमारे खाद्यान्न के फाइबर ( रेशेदार अन्न )। यदि हम एक तरफा केवल फाइबर मुक्त पदार्थ जैसे मैदा , शर्कराजन्य पदार्थ खुब खाते रहें, तो धीरे-धीरे हमारी आंत्र में उस प्रकार के जंतु बसने लगते हैं । कुछ दिनों के बाद हमें ध्यान में आता है कि, हमारे शरीर पर इस आहार का दुष्परिणाम होने लगा है , फिर भी ये कोश ,संदेश मस्तिष्क में भेजना नहीं रोकते और हमें ऐसे आहार की ओर लालायीत करते रहते हैं । हमें पिज्जा, बर्गर के सिवाय कुछ भी अच्छा नहीं लगता, ऐसा क्यों ?यह भी समझ में नहीं आता अर्थात हम एक प्रकार से गलत आहार के व्यसन में फंस जाते हैं । अब हमें अच्छे आहार का महत्व समझने लगता है । अच्छा आहार अच्छे जंतु अच्छा संदेश और उत्तम एवं पूर्ण स्वास्थ्य । ऐसा यह महत्वपूर्ण चक्र है । रसायन युक्त, बाजारू, पैकेट बंद, टिकाऊ, फाइबर रहित, शर्करा युक्त खाद्य पदार्थ एवं पेय हमारे मानसिक स्वास्थ्य को कैसे धक्का देते हैं, इसका वैज्ञानिक विश्लेषण हमें समझने लगता है । उपरोक्त पदार्थ के बदले हरी सब्जियों से परिपूर्ण, फलाहार, तथा आर्गेनिक समतोल आहार, मन और साधना के लिए अनिवार्य है ।

वैज्ञानिकों की नींद….

वैज्ञानिक इस बात पर ना समझ थे, कि ये जंतु मस्तिष्क के पास स्थित ब्लड-ब्रेन बैरियर नामक छाननी से पार नहीं जा सकते ! और हमारे मस्तिष्क को क्षति नहीं पहुंचा सकते, किन्तु ये जंतु बहादुर निकले, खुद न जाकर किला फतह करने के लिए अपने सैनिकों भेजते हैं । इसकी कल्पना सपनें में भी वैज्ञानिकों को नहीं थी । परन्तु अनुसंधान से यह बात सच साबित हुई और वैज्ञानिक अचम्भित थे । हमारे उदर से मस्तिष्क की ओर जाने वाली शरीर की एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐसी ” Vegus Nerve ” एक बडी संदेश वाहिनी है । इस पर खोज हुई और वैज्ञानिक आश्चर्यचकित हुऐ । उनकी समझ में था कि हमारा सर्वे सर्वा मस्तिष्क ही शरीर में चारों ओर प्रचंड संदेश भेजता है , किन्तु हुआ उल्टा ! शरीर से मुख्यतः पेट से प्रचंड संदेश दिमाग की ओर जाते हुए दिखाई पडे । कुल संदेश का अस्सी फीसदी संदेश पेट से दिमाग की ओर जाते हैं, यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण खोज थी । हमारे पेट में कुल मिलाकर पचास करोड़ के लगभग न्यूरॉन्स हैं । अतः वैज्ञानिक हमारे उदर को ” प्रथम मस्तिष्क ” कहने लगे । ” रोग की शुरुआत उदर से ” इसका तगड़ा वैज्ञानिक आधार है ।

आयुर्वेद की सूक्ष्म दृष्टि:

आयुर्वेद अर्थात संपूर्ण आरोग्य का आश्चर्यजनक मार्ग दर्शक । पाचन संस्था का इतना सूक्ष्म अभ्यास संसार के किसी भी शास्त्र में नहीं हुआ होगा जितना आयुर्वेद में हुआ । आयुर्वेद के अनुसार बिमारी का प्रमुख कारण वात दोष है । कफ और पित्त दोनों पंगु हैं और वात की बैसाखी पर कार्य करते हैं । वात दोष का स्थान नाभि का निचला हिस्सा है । एसी जानकारी देकर हठ प्रदीपिका कहती है ” चलै वातम चलै चित्तम” । अर्थात मन का विचलित होना वात से संबंधित है । एक ओर रोग का प्रमुख कारण वात दोष है ,तो दूसरी तरफ मन विचलित होना वात से संबंधित है और तीसरे वात का स्थान नाभि के नीचे…. अब आपको सूत्र ध्यान में आया होगा कि हमारे मलाशय और मन के संबंध का आयुर्वेद ने कैसे खुलासा किया है ।

रोग कहीं भी हो चिकित्सा मात्र पचन तंत्र की यह आयुर्वेद का मर्म है । पंचकर्म चिकित्सा में नस्य एवं रक्त मोक्षण छोड़कर बाकी सब क्रिया पचन संस्था से संबंधित है । यह बहुत मायने रखता है ।आयुर्वेद ने स्पष्ट बताया है के सब रोगों की जड ” मंदाग्नी ” है ।आयुर्वेद के अनुसार ” पचन संस्था और मनोरोग ” यह एक गहन विषय है । आधुनिक विज्ञान को इस पर अनुसंधान के लिए आयुर्वेद में बहुत से विषय मिल सकतें हैं । कुछ ऋषि इस क्रिया को सब रोगों की संपूर्ण चिकित्सा मानते हैं । इसका इतना महत्व है । सब अंगों पर परिणाम करने वाली यह क्रिया, मानसिक रोगों पर उत्तम रूप से कार्य करती है । इस क्रिया में औषधि तेल और कुछ द्रव्य, मात्र गुदा द्वार से शरीर के अंदर छोडे जाते हैं । ध्यान रहे यहाँ पर हमारा ” Microbiota” रहता है ।

करा हो नियमित योगासने…..

मेरे एक मित्र ने मुझसे एक टेढ़ा सवाल किया, योग अगर चित्तवृत्ती निरोध है, तो यम ,नियम, आसन एवं प्राणायाम किसलिए ? आँखे बंद कर ध्यान करें ? मैने प्रतिप्रश्न किया, यदि दुध के बर्तन में नमक लगा हो तो दुध का क्या होगा ? यदि दुध का आरोग्य रखना हो तो पात्र लवणमुक्त होना चाहिए । वैसे ही योग साधना करनी हो तो शरीर को दोषमुक्त करना होगा । यम,नियम, आसन, प्राणायाम के पीछे भी यह एक प्रमुख उद्देश्य है । मन की साधना हेतु शरीर को साधना युक्त बनाना अनिवार्य है ।

” व्यायाम का पचन संस्था पर होने वाले परिणाम ” इस विषय पर आधुनिक विज्ञान में बहुत सारी खोजें हुई हैं । व्यायाम से Tryptophan, PGC-1,alpha, Kynurenine Amino Transfrase एसे अनेक रसायन पेट में तैयार होते हैं , और हमारे दिमाग पर इनका परिणाम होता है ।

योगासनो की रचना शास्त्रीय आधार पर की हुई है । पचन संस्था आसनो के केंद्र स्थान पर है । सादे व्यायाम यदि पेट और दिमाग पर इतनें असर कारक हैं, तो आसन, प्राणायाम का कितना परिणाम होता होगा ? इस पर विचार करना चाहिए । मुलबंध, अग्निसार , उड्डीयान बंध, शंख प्रक्षालन आदि के वैज्ञानिक सूत्र क्या हैं ? यह अब बताने की आवश्यकता नहीं….

पेट को प्रसन्न करिए….

हमारी प्रत्येक कोशिका मस्तिष्क के समान बुद्धिमान है । इस शरीर की हर एक कोशिका एक दूसरे की पूरक हैं एवं तारतम्यता से शरीर एवं निसर्ग निष्ठा के साथ अथक और निष्काम कर्म करतीं रहतीं हैं । पचन संस्था तो पचास करोड़ से ज्यादा न्यूरॉन्स वाली महान् बुद्धिमान प्रयोग शाला है । यह हमारे कोश एवं मस्तिष्क की अन्नदाता है ।यह जैसे हमें उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करती हैं वैसे ही दुर्धर रोग भी उत्पन्न कर सकतीं हैं । यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य को धोखे में डाल सकती हैं । इस पचन संस्था की ब्रम्हाग्नि में हम विचार पूर्वक समिधा अर्पित करेंगे या कचरा डालेंगे ? हमें मात्र भोग चाहिए कि योग ? किसका चुनाव करना है, यह यक्ष प्रश्न हमारे समक्ष है?

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डॉ. राजेश कपूर
लेखक पारम्‍परिक चिकित्‍सक हैं और समसामयिक मुद्दों पर टिप्‍पणी करते रहते हैं। अनेक असाध्य रोगों के सरल स्वदेशी समाधान, अनेक जड़ी-बूटियों पर शोध और प्रयोग, प्रान्त व राष्ट्रिय स्तर पर पत्र पठन-प्रकाशन व वार्ताएं (आयुर्वेद और जैविक खेती), आपात काल में नौ मास की जेल यात्रा, 'गवाक्ष भारती' मासिक का सम्पादन-प्रकाशन, आजकल स्वाध्याय व लेखनएवं चिकित्सालय का संचालन. रूचि के विशेष विषय: पारंपरिक चिकित्सा, जैविक खेती, हमारा सही गौरवशाली अतीत, भारत विरोधी छद्म आक्रमण.

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