लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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raineतेज़ चमकती धूप मे कहीं से,

उमड़ धुमड़ कर काले बादल,

आ ही जाते हैं।

जैसे शांत मन मे अचानक,

नकारात्मक संवेग कभी भी,

छा ही जाते हैं।

अंतर्मन पर धुंध सी

छाने लगती है,

जो वेदना का धुंआ सा

बन जाती है।

ये ज़हरीला धुंआ भीतर

ही भीतर फैलता है….

धुटन ही धुटन देता है,

बाहर भी  घोर तम,

छा ही जाता है।

ये धुंआ बहुत तड़पाता है,

रुलाता है, नींद भी उड़ाता है।

इस गहन गहरी धुंध के ,

रूप जाने कितने हैं!

कभी कोई अपेक्षा

कोई अधूरी उम्मीद या

क्षोभ, ईर्ष्या द्वेष या क्रोध,

सताते हैं  तड़पाते हैं।

आसान नहीं है इन्हे पहचानना,

क्योंकि हम औरों के दोष

गिनाते हैं…

पर मै पहचान गई हूँ इन्हे,

सारी नकारात्मकता को,

कविता की नदी मे बहाकर,

शांत और शीतल हो जाती हूँ।

4 Responses to “कहीं से काले बादल आही जाते हैं”

  1. Dr.RKumar

    कविता अच्छी क I बीनू जी बधाई और शुभ कामना .

    धन्यवाद

    Reply
  2. बीनू भटनागर

    धन्यवाद उत्सावर्धक प्रतिक्रियाओं के लियें।

    Reply
  3. vijay nikore

    कविता के भाव अच्छे लगे। बधाई।
    वि्जय निकोर

    Reply

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