कविता-पुनर्जन्म:विजय निकोर

तुम्हारा अंकुरित स्नेह सुकुमार

ज्यों अकलंकित आकाश ने

फेंक दिए सितारे सारे

मेरी झोली में आज,

और फिर भी मैं डरा-डरा-सा खड़ा रहा

कितने कटु अनुभवों की भीड़ में,

अतीत की टीस में

अनवरत डूबा रहा।

टीस की ठिठुरन घबराई-सी

दुबकी पड़ी थी,

जाले लगे कितने अंतरस्थ कोनो में

गए रिश्तों के बर्फ़ीले दर्द थे जमे पड़े,

अब नये स्नेह की उत्कर्षक उष्मा से

शनै: शनै: थे पिघल रहे।

 

हर दर्द के रंग थे चाहे अतिशय परिचित

नाज़ुक नये रिश्ते के छूट जाने का भय,

मैं इस डर से डर रहा था, ठिठुर रहा था,

अत: करता रहा उसे स्वीकारने से इनकार,

निरर्थक भीतर ही भीतर मैं कब से

बस, था गल रहा ।

कंटकित कराह दाबे मौन मेरा

ठिठुरता रहा

उस पिघलते दर्द के फैलते तालाब में,

चिंतित तैरती कराह जो इतनी अपनी थी

पर रही सदियों से बे-आवाज़ …

अब मुझसे रहा न गया, रहा न गया,

उस मूक कराह को मैंने दे दी आवाज़, और

हर बिखरे दर्द के बिखरे रंगों को बटोरती

उस आवाज़ में मुझको लगा —

विक्षुब्ध गरम-गरम अश्रुओं से अब

मेरी आत्मा थी गीली, और तुम्हारी

उच्छवसित उपस्थिति में सराबोर

मैं धुल चुका था ।

 

मेरा नया निडर अस्तित्व, भार-मुक्त

तुम्हारे सम्मुख था खड़ा अब हँस रहा,

और

इस सारे होने और न होने के बीच

तुम संवेदनशील

साक्षी बनी मुस्कराती रही,

स्वर-गीत तुम्हारे, संजीवनी-से,

दे रहे थे प्राण-धन

मेरी कब से भटक रही आस्था को,

अब दे गए नवोदित अत्युत्त्म

पुनर्जन्म !

 

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