डॉ अजय खेमरिया

लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने सबंधी कर्नाटक सरकार की सिफारिश जिन आधारों पर की गई है वह विशुद्ध राजनीतिक है औऱ सिर्फ हिंदुओं को विभाजित कर वोट हासिल करना इसका एकमात्र लक्ष्य है।जिस समिति के अध्ययन पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लिंगायतों को हिन्दू धर्म से अलग बताया है उसके अनुसार लिंगायतों को हिन्दू विधि के विरुद्ध अंतिम संस्कार के दौरान दफनाया जाता है,लिंगायत जाति बन्धन को नही मानते है जिस इष्ट लिंग को वे धारण करते है वह शिवलिंग नही है,सिर्फ निराकार शक्ति की आराधना करते है लिंगायत।लेकिन ये सच्चाई नही है मूलतः कर्नाटक के मेरे एक मित्र प्रोफेसर वी सतीश के मुताबिक लिंगायत औऱ शेव वीर एक ही है शैव जिस लिंग को धारण करते है वह शिवलिंग ही है और शिव उपासक है लिंगायतों में दो धाराएं है जो स्वामी बासन्न को मानती है जिसके अनुसार इष्टलिंग शिवलिंग नही है जबकि शैव वीर शिव को मानने वाले है,यही नही लिंगायतों में भी हिंदुओं की तरह जाति के ऊंचे नीचे आग्रह है ये सही है कि कोई निम्न जाति का व्यक्ति इष्टलिंग धारण कर लिंगायत बन सकता है पर कन्नड़ लोक व्यवहार में ये इतना ही कठिन है जैसा वैष्णव,शैव हिंदुओं में है हाल ही में जिस कुलबर्गी नामक समाजिक कार्यकर्ता की हत्या हुई थी वह भी इसी ऊंच नीच को लेकर थी।दूसरी तरफ यदि मान लिया जाए कि लिंगायतों के रीतिरिवाज हिन्दुओ से जुदा है तब ये कोन कह सकता है कि पूरी दुनियां के हिन्दू मत मानने वाले एक सी जीवन पद्धति का अनुशरण करते है,हमारे उत्तर भारत मे मन्दिरों की पूजा करने वाले त्यागी,गोस्वामी,बाबा समाज,के लोगो औऱ शनिवार के दिन तेल मांगने वाले लोगो का भी दाग यानी अग्निदाग नही होता उनका अंतिम संस्कार दफनाकर ही किया जाता है । कई बड़े महंत औऱ साधुओं को भी दफनाया ही जाता है ठीक वैसे जैसे लिंगायतों को।इसका मतलब ये नही की वे लोग हिन्दू नही है।सुप्रीम कोर्ट ने जिस जीवन पद्धति के साथ हिन्दुधर्म को व्याख्यायित किया है उसमें किसी एक विशिष्ट जीवनशैली या उपासना पद्धति को समाहित नही किया है,हर10- 20 किलोमीटर पर हमारे यहां जीवन का रंग रूप बदल जाता है सदियों से हिन्दुमत में ऐसी उपधारायें विकसित होती रही है जिन्होंने तत्समय की मान्य परम्पराओं को चुनोती दी है और वे आज भी इस मत के साथ तादात्म्य बनाकर बनी हुई है ,कबीर को मानने वाले हो या शिरडी में सांई के भक्त ,सबकी अलग अलग जीवन दृष्टि है लेकिन वे इस आधार पर अलग धर्म के हामी नही हो सकते।ज्ञान,भक्ति की धाराएं भी सदियों से अपने अपने हिसाब से चली आ रही है,यहाँ तो इतनी स्वतंत्रता है कि ब्रज में कुछ लोग सिर्फ कृष्ण को मानते है और हमारे जैसे लाखों लोग कृष्ण की जगह राधा को ही पूजते है।गुर्जर लोग देवनारायण को अपना इष्ट मानते है,किरार बलराम को,रघुवंशी राम को,निषाद,मल्लाह,केवट को,आदिवासी सबरी को।कहने का आशय यही की इष्ट अलग मानने की पूरी आजादी हमे मिली है और ये कोई हजार दो हजार साल से नही है अनादि काल से यही जीवनशैली रही है हमारी।आदिवासियों के मामले तो औऱ भी विविधताओं से भरे है उनकी उपासना के केंद्र में तो सिर्फ प्रकृति ही है,राम,शिव,कृष्ण,कहीं है ही नही,लेकिन ये हिन्दू जीवनशैली का ही हिस्सा है कि हम प्रकृति की भी पूजा करते है और इस धरती को अपनी माँ सदृश्य आदर देते है,पिछले काफी समय से आदिवासियों को इसी पूजा पद्धति के आधार पर हिन्दू धर्म से विमुख करने का संगठित प्रयास इस देश मे हो रहा है खासकर ईसाई मिशनरियों द्वारा।आज कितने ही हमारे आदिवासी भाई धर्मांतरित होकर ईसाई हो गए लेकिन उनकी जीवनशैली नही बदली है वे हिन्दू उत्सवों को वैसे ही मनाते है जैसे अन्य हिन्दू।कहा जा सकता है कि कर्नाटक सरकार का यह कदम केवल लिंगायतों के बीच विभाजन कर उनकी एकीकृत हिन्दू पहचान को समाप्त करना भर है।संभव है राहुल गांधी और सिद्धारमैया अपनी अंतिम बची बड़े प्रदेश की सरकार को मोदी से बचाने में कामयाब हो जाये,पर जनेऊधारी होने का दावा करने वाले राहुल गांधी क्या हिन्दू धर्म की इस विविधता और बहुलता को अक्षुण्ण बनाये रखने की गारंटी इस देश को दे सकते है ?देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाली कांग्रेस की कमान संभालने वाले राहुल गांधी के लिये अच्छा होता कि वे इस विभाजनकारी राजनीति को तिरष्कृत करने की एलानिया घोषणा करते उनकी दादी के राजनीतिक गुलदस्ते में देश की विविधताओं के फूल जब तक रहे कांग्रेस का तारा चमकता रहा लेकिन जब से इंदिरा युग का अवसान हुआ है लगता कांग्रेस का बौद्धिक पतन भी हो गया है,उसका थिंकटैंक भारत की नही सिर्फ सरकार और सत्ता तक केंद्रित होकर रह गया है।इसके लिये हिन्दू आस्था को चोट पहुचाना एक सरल उपकरण के रूप में मान्य कर लिया गया है यूपीए सरकार के दौरान सांप्रदायिक हिंसा पर बनाया गया बिल हो,या रामसेतु पर राम को काल्पनिक पात्र बताने वाला हलफनामा, या फिर हाल ही में कपिल सिब्बल का राम मंदिर की सुनवाई के दौरान रखा गया तर्क,पिछले 25 वर्षों में कॉन्ग्रेस सिर्फ अल्पसंख्यकवाद की राष्ट्र विरोधी राजनीति पर अबलंबित होकर सत्ता में आती रही है,लेकिन जिस हिन्दू मानमर्दन के उपकरण ने 10 जनपथ वाली कांग्रेस को सत्ता का सुख दिया उसी उपकरण ने उसकी ऐतिहासिक हार भी लिखने का काम किया है,2014 की करारी हार पर बनी एंटोनी कमेटी की रिपोर्ट यही कहती है।राहुल गांधी के बारे में कहा जाता है कि वे फुलटाइमर पॉलिटिशियन नहीहै यही कारण है की वे गुजरात मे जनेऊधारी हिन्दू हो जाते है कर्नाटक के मठ मन्दिरों में जाते है पर लिंगायतों के मामले में अपने एक चुतर सीएम की महत्वाकांक्षी चाल में फंस जाते है। राहुल गांधी को यह समझना होगा कि उनकी पार्टी अगर सत्ता में नही रहेगी तब भी संसदीय राजनीति की अपरिहार्यता तो रहेगी ही,कभी बीजेपी 2 सीट वाली पार्टी थी और इंदिरा गांधी भी जेपी की आंधी के बाद भी देश मे स्वीकार्यता के साथ स्थापित हुई थी ।संसदीय लोकतंत्र में कोई भी सत्ता चिर स्थाई नही होती है लेकिन देश और इसकी एकता अखण्डता का तत्व सदैव चिर स्थाई रहता है।

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