पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-7

जब जिह्वा पर परमेश्वर की गुणों की चर्चा होने लगे और रसना उसी के मधुर गीत गाने लगे, जब हमारे श्वांसों की सरगम में परमेश्वर के गीत भासने लगें तब समझना चाहिए कि हमारे दुर्भाग्य के दुर्दिन हमसे दूर हो रहे हैं और हमारे सौभाग्य का उदय हो रहा है। हमारे भीतर सर्वांशत: व्यापक स्तर पर परिवत्र्तन हो रहा है। हमारे भीतर और बाहर सर्वत्र क्रांति व्याप रही है।

राकेश कुमार आर्य

छोड़ देवें छल-कपट को मानसिक बल दीजिए

गतांक से आगे….
प्रार्थना की अगली पंक्ति-‘छोड़ देवें छल-कपट को मानसिक बल दीजिए’ है। यह पंक्ति भी बड़ी सारगर्भित है। इसमें भी भक्त अपने शुद्घ, पवित्र अंतर्मन से पुकार रहा है कि मेरे हृदय में कोई कपट कालुष्य ना हो, कोई मलीनता न हो, यह पंक्ति पहली वाली पंक्ति अर्थात ‘पूजनीय प्रभो! हमारे भाव उज्ज्वल कीजिए’ की पूरक है, और उसकी फलश्रुति भी कही जा सकती है। पूरक तो इसलिए कह सकते हैं कि भावों की उज्ज्वलता तभी मानी जा सकती है जब हमारा हृदय निष्कपट और निश्छल हो, और फलश्रुति इसलिए कही जा सकती है कि भावों की उज्ज्वलता से ही हृदय निष्कपट और निश्छल बनाया जा सकता है।
इस पंक्ति में एक विशेष बात कह दी गयी है कि हमें हे प्रभो! आप मानसिक बल दीजिए। ये मानसिक बल ऐसे ही नही मिलता, इसके लिए एक गंभीर और ठोस साधना करनी पड़ती है, बहुत कुछ संभलकर चलना पड़ता है, और मन के अंधकार को मिटाने के लिए अंतर्मुखी होना पड़ता है। मन को अंधकार का उपासक न बनाकर ्रप्रकाश का पुजारी या उपासक बनाना पड़ता है। मन अंधकार से निकलकर ज्ञान के प्रकाश में जितना ही अधिक गोते लगाने लगता है, पता चलता है कि उतना ही हमारी सोच में परिवर्तन आता जाता है। परिवर्तन भी ऐसा कि आप स्वयं कह उठेंगे-
सोच बदलो तो सितारे बदल जाएंगे।
नजर बदलो तो नजारे बदल जाएंगे।
कश्तियां बदलने की जरूरत नही,
दिशा बदलो तो किनारे बदल जाएंगे।
वास्तव में ही हमारी दृष्टि में सृष्टि समाविष्ट है। इसीलिए कहा गया है कि ‘‘जैसी होगी दृष्टि-वैसी होगी सृष्टि। ’’
जब परमेश्वर के गुण गाने की हमारी प्रवृत्ति हमारी प्रकृति के साथ हृदय से तारतम्य स्थापित कर लेती है और प्रभु के नाम जाप में आनंदानुभूति लेने लगती है, तब मन की दिशा में सकारात्मक परिवर्तन आ जाता है, तब हमारा मन संसार की ओर नही भागता, अपितु वह संसार की ओर से परमेश्वर की ओर गति करने लगता है। ऐसी अवस्था हमारे जीवन के उत्थान की प्रतीक होती है। ऐसी अवस्था में हमारा मन ‘जब संसार वाले’ की ओर भागने लगता है और उसी के गीतों में आनंद लेने लगता है, तब पता चलता है-
परमेश्वर के गुण गाने से
खुशियों की दौलत मिलती है।
मन से छल-कपट मिटाने से
खुशियों की दौलत मिलती है।।
जब जिह्वा पर परमेश्वर की गुणों की चर्चा होने लगे और रसना उसी के मधुर गीत गाने लगे, जब हमारे श्वांसों की सरगम में परमेश्वर के गीत भासने लगें तब समझना चाहिए कि हमारे दुर्भाग्य के दुर्दिन हमसे दूर हो रहे हैं और हमारे सौभाग्य का उदय हो रहा है। हमारे भीतर सर्वांशत: व्यापक स्तर पर परिवत्र्तन हो रहा है। हमारे भीतर और बाहर सर्वत्र क्रांति व्याप रही है। परिवत्र्तन की टंकार का नाद हो रहा है, पुरातन के स्थान पर सनातन अधुनातन बनकर स्थान ग्रहण कर रहा है, जिसे हमारी आत्मा अनुभव कर रही है। जब आत्मा इस नाद का अनुभव करने लगे तब यह समझना चाहिए कि मानसिक बल अपना रंग दिखाने लगा है, हमने मन की गति को समझ लिया है और उसे नियंत्रित करने में भी हमने सफलता प्राप्त कर ली है।
‘मुण्डकोपनिषद’ (खण्ड-1 मंत्र-10) में कहा गया है जब विद्वान उपासक योगी पुरूष प्रकृति का आधार छोडक़र अपने विशुद्घ सत्व आत्मदिव्य स्वरूप से निष्केवल=परमशुद्घ परमात्मा के ही आधार में मृत्यु को उल्लंघन करके अमृत=मोक्षसुख को प्राप्त होता है तब जिस-जिस सूर्यादि लोक में पहुंचने का मन से संकल्प अर्थात इच्छा व्यक्त करता है, और जिन सुख भोगों की अभिलाषा करता है, उस-उस लोक और उन सब कामनाओं को प्राप्त होता है। इसलिए योग संबंधी सिद्घियों के चाहने वाले जिज्ञासु पुरूष को उचित है कि ब्रह्मज्ञानी महात्मा की सेवा-सुश्रषा सत्कार अवश्य करे।
यह चित्रण किसी मानसिक बल के धनी महापुरूष का ही है। कितनी दिव्य और महान छटा है-उसके व्यक्तित्व की? पर उसके लिए भी यह अनिवार्य कर दिया गया है कि ब्रह्मज्ञानी महात्मा की सेवा सुश्रूषा-अवश्य करे। ऐसा निर्देश देने का उपनिषद के ऋषि का एक विशेष मंतव्य है, और वह मंतव्य यह है कि ऐसे महापुरूषों के श्रीचरणों से ही ज्ञानगंगा का अमृतपान किया जाना संभव है। महात्माओं के श्रीचरणों में ध्यान रहने से व्यक्ति सदा ही अहंकार शून्य रहता है। इसी अहंकार शून्य हृदय में ही भक्ति का सागर अठखेलियां करता है। इन अठखेलियों का आनंद जो व्यक्ति लेना आरंभ कर देता है वह उनका रसिक बन जाता है। उसके मन से छल-कपट अपने आप मिटने लगते हैं। वह तो अपने मन का धोबी अपने आप बन जाता है। उसे किसी अन्य व्यक्ति का आश्रय अपने मन की स्वच्छता के लिए लेना नही पड़ता। उसे अपना परिमार्जित स्वरूप स्वयं ही दिखाई देने लगता है, और वह उस परिमार्जित स्वरूप को चिरस्थायी बनाने के लिए साधना में लीन हो जाता है। क्रमश:

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