लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य

छोड़ देवें छल-कपट को मानसिक बल दीजिए
गतांक से आगे….

ओ३म्! येनेदम् भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतम मृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु।।
(यजु. 34-4)

अर्थ-‘जिस अमर मन ने ये तीनों काल भूत, वर्तमान और भविष्यत अपने वश में किये हुए हैं, जिसके द्वारा सात होताओं (यज्ञकत्र्ताओं) वाला यज्ञ किया जाता है, वह मेरा मन शुभ विचारों वाला होवे।’

इस मन को ऋषियों ने ‘अमृतेन’ अर्थात नाश रहित-अमर माना है। इसी नाशरहित मन से भूत, भविष्य और वर्तमान काल का सब व्यवहार हमारे द्वारा निष्पन्न होता है, या यह सब व्यवहार इसी के द्वारा जाना जाता है। कहने का अभिप्राय है कि भूत, वर्तमान और भविष्य ये तीनों काल मन के ग्रहण क्षेत्र हैं। मन के द्वारा ही तीनों कालों का ज्ञान होता है। इसी मन की गति को समझकर तत्वदर्शी लोग त्रिकालदर्शी बन जाते हैं।

हमारे शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियां बुद्घि और आत्मा ये सप्तहोता-सात यज्ञकत्र्ता हैं। इन्हीं के संयोग से मानव अपना सारा संसार व्यवहार चलाता है। इसीलिए ‘वृहदारण्यक उपनिषद’ के ऋषि ने मन को यज्ञ का ब्रह्मा कहा है। मन हमारी इंद्रियों का स्वामी है। एक-एक इंद्रिय को विजय करना बड़ा कठिन है और जो इनका भी स्वामी हो-उसके तो कहने ही क्या हैं? इसी लिए मन को सम्राट भी कहा गया है। इसी मन में सप्तहोता यज्ञ कर रहे हैं, इसी मन के द्वारा सात होताओं से संपन्न किया जाने वाला यज्ञ अनुष्ठित किया जाता है। ये सप्तहोता सात साधक हैं। जिनके द्वारा शुभकर्मरूप यज्ञ संपन्न किया जाता है। इस यज्ञ का ब्रह्मा मन है इसलिए उसके लिए कहा गया है कि वह मेरा मन शिवसंकल्प वाला होवे।

ओ३म्! यस्मिन्नृच: साम यजूं षियस्मिन प्रतिष्ठिता रथनाभाविवारा:। यस्मिंश्चित्त्ं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु।।
(यजु. 34-5)

‘जिस मन में जैसे रथ की नाभि के धुरे में अरे लगे होते हैं ऐसे जिसमें ऋक, साम, यजु त्रीविद्या रूप ऋग्वेद, यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद ये चार वेद प्रतिष्ठित हैं। जिस मन में प्राणियों की सब चिंतन या स्मरण शक्ति ओतप्रोत है, अर्थात संयुक्त है वह मेरा मन शुभ संकल्प-विकल्प शुभचिंतकों वाला होवे।’

इस मंत्र में मन को ज्ञान का अधिष्ठाता माना गया है। उसी के योग से व्यक्ति वेद की त्रयी विद्या अर्थात ज्ञान, कर्म और उपासना को हृदयंगम करता है। उसमें निष्णात होता है, स्नातक बनता है। इसी त्रयी विद्या को ओढक़र व्यक्ति अपने नंगेपन को भी ढांपता है। जिसके पास यह त्रयी विद्या नही है, वह व्यक्ति ही वास्तव में नंगा -नग्न का जाता है। इस प्रकार मन सारे वैदिक ज्ञान का आश्रय है, दूसरे सारी चेतनाओं का आश्रय है। सारे विश्व के समस्त ज्ञान का आश्रय यह मन है। ज्ञान के हर क्षेत्र में मन की पूर्णगति है। मन के संयोग से ही व्यक्ति की चेतना उदबुद्घ होती है, जिससे मानव का सर्वांगीण विकास होता है, उसके कौशल का और प्रतिभा का विकास होता है। ‘शतपथ-ब्राह्मण’ में इसीलिए इस मन को अंशु या किरण कहा गया है, क्योंकि यह ज्योति प्रदान करता है।

मनो हवा अंशु (शत 11-5-9-2) इससे अगला वेदमंत्र घोषित करता है कि मन ही मानव का नियंत्रक है। मंत्र है :-

ओ३म्! सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान् नेनीयते अभीशुभिर्वाजिन इव। हत्प्रतिष्ठम् यदजिरं जविष्ठं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु।।
(यजु. 34-6)

वेदमंत्र कहता है कि-‘जो मन को चलाता है, जैसे उत्तम सारथि लगाम से घोड़ों को चलाता है, उसी प्रकार जो मनुष्यों को नियंत्रित करता है-जो हृदय में रहता है, अत्यंत फुर्तीला है और अतिवेगशाली है, वह मेरा मन शुभ विचारों वाला होवे।’

इस मंत्र में स्पष्ट किया गया है कि यह जो हमारा मन है इसकी विशेषता है कि यह एक योग्य सारथि है, यह हृदय में प्रतिष्ठित है, यह अत्यंत फुर्तीला है और अत्यंत वेगवान (तीव्रतम गति वाला) है।

कठोपनिषद में आत्मा को रथि, शरीर को रथ, बुद्घि को सारथि तथा मन को लगाम बताया गया है। वहां इसे ‘मन: प्रग्रहमेव च’ कहकर मन की प्रशस्ति की गयी है। यह अजिरम्-अजर है, अर्थात वृद्घावस्था से रहित है।
अथर्ववेद (14-1-10) में मन को एक रथ कहा गया है :-
मनोअस्या अन आसीदद्यौरा सीदुतच्छदि:।
शुक्रावन आवाहावास्तां यदयात् सूर्यापतिम्।।

अर्थात जब सूर्या अपने पति गृह को चली उस समय उसका मन ही रथ बना और द्युलोक छत (आवरण) बना। उसमें दो पुष्ट बैल जुते थे।

वेद में अन्यत्र विभिन्न स्थानों पर मानसिक बल-मनोबल प्राप्ति की साधना अथवा उसकी प्राप्ति से होने वाले लाभों का उल्लेख किया गया है। जिनके अनुशीलन से स्पष्ट होता है कि मन का कितना महत्व है?
क्रमश:

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