लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य

छोड़ देवें छल-कपट को मानसिक बल दीजिए

गतांक से आगे….

इसी अवस्था के आनंद की चर्चा करते हुए वेदांत स्पष्ट करता है:-

भिद्यंते हृदय ग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्व संशया:।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे पराह्यवरे।
मु. 2 खण्ड 2 मं. 18 (स.प्र. समु. 9 पृष्ठ 371)

अर्थात ‘जब इस जीव के हृदय की अविद्या अंधकार रूपी गांठ कट जाती है, तब सब संशय छिन्न होते हैं और दुष्ट कर्म क्षय को प्राप्त हो जाते हैं। तभी उस परमात्मा के दर्शन होते हैं, जो कि हमारे आत्मा के भीतर और बाहर सब ओर व्याप रहा है, उसमें निवास करता है, और तभी जीव मुक्त होकर परमेश्वर के आधार में मुक्ति के आनंद को भोगता है।’

हमारा मन कितना शक्तिशाली है और उसकी क्या-क्या विशेषाएं हैं, इस पर हमारे ऋषियों का स्पष्ट और गहन चिंतन सृष्टि प्रारंभ से ही रहा है।

वेद ने मन की विशेषताओं का बड़ा सुंदर चित्रण किया है, और उसकी विशेषताओं के दृष्टिगत ईश्वर से प्रार्थना की है कि ऐसी -ऐसी विलक्षण विशेषताओं से युक्त मेरा मन शिवसंकल्प वाला अर्थात शुभविचारों वाला हो। यज्ञ पर शांति प्रकरण के जिन मंत्रों को हम बोलते हैं, उनमें इस मन की विलक्षण विशेषताओं का कुछ मंत्र उल्लेख करते हैं। जिन्हें समझने से मन की शक्तियों का और मानसिक बल प्राप्त करने का उपाय समझ में आ सकता है। इन्हें ‘रात्रिशयन’ के मंत्र भी कहा जाता है।
पहला मंत्र है :-
‘यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं
तदुसुप्तस्य तथैवैति।
दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं
तन्मे मन: शिव संकल्पमस्तु।। ’ (यजु. 34.1)

अर्थ-‘जो दिव्य मन जागते हुए मनुष्य का दूर तक जाता है और जो सोते हुए मनुष्य का उसी प्रकार दूर तक जाता है। दूर तक जाने वाला प्रकाशों का प्रकाश वह मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।’

इस मंत्र में ऋषि ने मन की विशेषता बतायी है कि वह ‘प्रकाशों का प्रकाश है’- ज्योतियों में एक ज्योति है। अभिप्राय है कि मन कभी अंधकार युक्त नही होता। उसे अंधकार युक्त बनाती हैं-हमारी अपनी कामनाएं और इंद्रिय जन्य विकार। मन को इंद्रियों का स्वामी इसलिए कहा और माना गया है कि हर एक इंद्रिय अपने आप में एक ज्योति स्तंभ है-जो हमें ज्ञान कराती है, या कर्म करती है, ज्ञान और कर्म करने से वह प्रकाश स्तंभ है, और जो मन उनके भी ऊपर स्वामी बनकर विराजमान रहता है वह तो ‘प्रकाशों का भी प्रकाशक है।’ कोई भी इंद्रिय पूर्ण सुघड़ता से जब तक हमें कोई ज्ञान नही करा सकती और ना ही कोई कर्म कर सकती है जब तक उसमें मनोयोग ना आ जाए। मनोयोग के आते ही इंद्रियां भी ‘साधु’ हो जाती हैं। उनकी साधना सकारात्मक हो उठती है। इसीलिए मन को इंद्रियों का स्वामी कहा जाता है। इंद्रियों के स्वामी ऐसे मन की एक अन्य विशेषता यह होती है कि वह जाग्रत और स्वप्न दोनों अवस्थाओं में दूर-दूर तक भ्रमण करता है, अथवा दूर-दूर तक जाता है।

इस दूर-दूर तक जाने वाले मन का योग यदि अपनी पूर्ण शक्तियों के साथ हमारी नेत्रशक्ति के साथ हो जाए तो वह पत्थर के बीच से भी निकल जाएगी, पहाड़ों को तोड़ देगी, सागर की गहराई नाप लेगी, आकाश की ऊंचाई नाप लेगी इत्यादि-संसार के असंभव कार्यों को कर डालेगी। ‘नजर पत्थर को भी तोड़ देती है’ लोगों का ऐसा कहने का अभिप्राय यही होता है कि पूर्ण मनोयोग से जब हम किसी कार्य को करने का संकल्प लेते हैं तो हमारी संकल्प शक्ति उस असंभव कार्य को करके संभव कर दिखाती है, और हम उस पर पार पा लेते हैं। हमारी हर इंद्रिय को अपनी ज्योति से ज्योतित करने की शक्ति मन के पास है, यही कारण है कि ‘गोपथ ब्राह्मण’ मन को ब्रह्म कहा गया है। ‘मनोब्रह्म’ (गो.ब्रा.1-2-11)
अब आते हैं दूसरे मंत्र पर।
यह मंत्र है-
येन कर्माण्यपसो मनीषिणो
यज्ञे कृणवन्ति विदथेषु धीरा:।
यदपूर्वं यक्षमन्त: प्रजानां,
तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु।

(यजु. 34-2)

अर्थ: ‘जिस मन से कर्मठ तथा धीर विद्वान लोग यज्ञ तथा शास्त्रार्थों में कर्मों को करते हैं, जो मन अपूर्व तथा पूज्य है और प्राणिमात्र के भीतर है, वह मेरा मन शिवसंकल्प अर्थात शुभ विचारों वाला होवे।’

जितनी भर भी प्रेरणाएं हैं उनका एकमात्र स्रोत मन है, इसलिए इस मन को हमारे ऋषियों ने हमारी प्रेरणाओं का संचालक तथा नियामक-नियंता स्वीकार किया है।

इस मंत्र में मन की विशेषओं का उल्लेख करते हुए जहां उसे प्रेरणाओं का संचालक कहा गया है वहीं ‘यक्षमन्त:’ कहकर उसकी एक अन्य महान विशेषता की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया गया है। मन की यह दूसरी विशेषता है उसका यजनीय, पूजनीय अथवा पवित्र होना।

यही कारण है कि हमारा यजन भजन और प्रत्येक पवित्र कार्य तब तक पूर्ण नही होता जब तक उसके साथ मन का योग नही होता, अथवा मन की पवित्रता का संबंध स्थापित नही होता। इसलिए मन की पवित्रता को ईश्वर के यजन-भजन के लिए बहुत ही आवश्यक माना गया है।

क्रमश:

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