प्रणव मुखर्जी का नागपुरी छक्का 

विजय कुमार

आखिर प्रणव दादा नागपुर चले ही गये। जब से ये खबर आयी थी, तब से कांग्रेसी परेशान थे। क्या हो गया उन्हें; क्यों जा रहे हैं वे नागपुर; आखिरी समय में बुद्धि भ्रष्ट क्यों हो गयी; क्या अब भी कोई महत्वाकांक्षा बाकी है; पार्टी ने उन्हें क्या नहीं दिया; राष्ट्रपति से भी ऊंचा कोई पद है क्या ? कइयों ने बेटे और बेटी के राजनीतिक भविष्य का वास्ता देकर उन्हें रोकने का प्रयास किया; पर दादा नहीं माने।सात जून को नागपुर में संघ के तृतीय वर्ष के वर्ग का सार्वजनिक समापन था। संघ के काम में प्रशिक्षण का बड़ा महत्व है। यों तो पूरे वर्ष यह काम चलता रहता है; पर गर्मी की छुट्टी में छात्र खाली रहते हैं। इसलिए बड़े प्रशिक्षण वर्ग इन्हीं दिनों होते हैं। एक सप्ताह वाला ‘प्राथमिक शिक्षा वर्ग’ प्रायः हर जिले में होता है। इसके बाद 20 दिन का ‘संघ शिक्षा वर्ग’ दो भागों में (प्रथम और द्वितीय वर्ष) होता है। प्रथम वर्ष का वर्ग लगभग 10 जिलों का तथा द्वितीय वर्ष का लगभग 25 जिलों का मिलाकर होता है। फिर मई-जून में 25 दिवसीय तृतीय वर्ष का वर्ग संघ की जन्मस्थली नागपुर में और पूरे देश का एक साथ होता है। अब प्रौढ़ स्वयंसेवकों के लिए सर्दियों में भी तृतीय वर्ष का वर्ग होने लगा है।ऐसा अनुमान है कि साल भर में एक हजार प्राथमिक वर्ग, 200 प्रथम वर्ष, 50 द्वितीय वर्ष और दो तृतीय वर्ष के वर्ग होते हैं। प्राथमिक वर्ग की औसत संख्या यदि सौ और संघ शिक्षा वर्ग की 250 मानें, तो एक साल में एक लाख स्वयंसेवकों ने प्राथमिक वर्ग और 65,000 ने संघ शिक्षा वर्ग में भाग लिया होगा। इनमें से 80 प्रतिशत 18 से 40 वर्ष के युवा होते हैं। संघ की कार्यवृद्धि का आधार ये कार्यकर्ता ही हैं।वर्ग के अंत में सार्वजनिक कार्यक्रम होता है। उसमें प्रशिक्षार्थी शारीरिक प्रदर्शन करते हैं। इसके बाद संघ के कोई वरिष्ठ कार्यकर्ता स्वयंसेवकों तथा वहां उपस्थित जनता को संबोधित करते हैं। समारोह में मुख्य अतिथि या अध्यक्ष के नाते किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति को बुलाते हैं। वे भी अपनी बात कहते हैं। ऐसे कार्यक्रमों में जाति, बिरादरी और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से ऊपर उठकर हजारों लोग संघ के मंच पर आये हैं।हर बार इनकी चर्चा स्थानीय स्तर पर ही होती थी; पर इस बार प्रणव दादा के कारण कांग्रेस वाले दुखी हो गये। इसलिए समारोह के बाद कांग्रेसी दिग्गजों ने मोर्चा संभाला। किसी ने कहा कि दादा ने संघ के गढ़ में ही उन्हें शीशा दिखा दिया। या कि उन्होंने संघ वालों को सेकुलरिज्म का काढ़ा पिला दिया। जैसी बुद्धि, वैसी बातें; पर कुल मिलाकर इससे कांग्रेस की खूब भद पिटी। उसका चेहरा बेनकाब हो गया। दुनिया ने देख लिया कि सहिष्णुता के नाम पर संघ को गाली देने वाले स्वयं कितने असहिष्णु है। दूसरी ओर संघ की खूब वाहवाही हुई कि उसने विरोधी विचारधारा के प्रणव दा को बुलाया और उन्हें भरपूर मान-सम्मान दिया।

 

दादा ने अपने भाषण में लगभग वही कहा, जो उनसे पहले श्री मोहन भागवत ने कहा था। श्री भागवत ने संस्कृत के कुछ सुभाषित सुनाये, तो दादा ने चाणक्य, ह्वेनसांग, फाहियान, गांधी, नेहरू और रवीन्द्रनाथ टैगोर के उदाहरण दिये। सच तो ये है कि भारत और भारतीयता, राष्ट्र और राष्ट्रीयता, देश और देशभक्ति, विविधता में एकता, लोकतांत्रिक स्वभाव, संविधान की सर्वोच्चता, भारत गौरव.. आदि पर चिंतन करने वालों के निष्कर्ष समान ही होते हैं; पर अपने कार्यक्षेत्र की मजबूरी के चलते उनके शब्द और भाव बदल जाते हैं।संघ को चूंकि चुनाव नहीं लड़ना, इसलिए वह भारत और भारतीयता के साथ ही हिन्दू और हिन्दुत्व की बात भी उतनी ही जोर से कहता है; पर कांग्रेस को चुनाव के अलावा कोई और काम नहीं है, इसलिए वह हिन्दू और हिन्दुत्व से परहेज करती है। समझदार कांग्रेसी भी संघ की बात ठीक मानते हैं; पर कहने में डरते हैं। लेकिन राष्ट्रपति रह चुके प्रणव दा के सामने अब इस नकली आवरण में रहने की मजबूरी नहीं है। पिछली कुछ मुलाकातों में उन्हें संघ का जो साहित्य दिया गया, उससे भी वे प्रभावित हुए हैं। इसलिए वे नागपुर आये और संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार की समाधि पर जाकर उन्हें ‘भारतमाता का महान सपूत’ कहा।कई लोग दादा की सोनिया परिवार से पुरानी खुंदक को भी याद कर रहे हैं। यह तो सच ही है कि राजीव ने उन्हें योग्य होते हुए भी प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया। क्योंकि वे खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। सोनिया मैडम ने भी उनकी बजाय मनमोहन सिंह जैसे जनाधारहीन व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाया, जिससे राहुल का रास्ता साफ रहे। दादा के मन के किसी कोने में यह दर्द निश्चित रूप से दबा होगा।कांग्रेसी इस कार्यक्रम की प्रसिद्धि से भी दुखी हैं। भगवा और वंदे मातरम् से जिनके दिल जल जाते हैं, ऐसे कांग्रेसी अपने बाल नोच रहे हैं। दूरदर्शन के सब चैनलों ने समारोह को पूरा दिखाया। फिर इस विषय पर चर्चाएं भी हुईं। नागपुर में तो शायद दस हजार लोग होंगे; लेकिन टी.वी. पर देश और दुनिया के दस करोड़ लोगों ने इसे देखा। दादा की बात सुनने के चक्कर में कांग्रेसियों को ध्वजारोहण, प्रार्थना, शारीरिक प्रदर्शन और श्री मोहन भागवत का उद्बोधन भी सुनना पड़ा। नमाज के चक्कर में रोजे गले पड़ गये।अब सुना जा रहा है कि लाखों लोग इस समारोह से प्रभावित होकर संघ में जाने को तैयार हैं। इनमें हजारों कांग्रेसी भी हैं। सोनिया और राहुल को तो मानो सांप सूंघ गया है। इस पर प्रतिक्रिया देने के लिए वे अब तक सामने नहीं आये हैं। आयें भी कैसे ? दादा ने अपने नागपुरी छक्के से कांग्रेसी गेंद की बखिया उधेड़ दी है। उन्होंने कांग्रेस के विचार और व्यवहार के बीच का खोखलापन उजागर कर दिया है।अब इस बात की बहुत संभावनाएं हैं कि कांग्रेस एक बार फिर टूटेगी। बड़े दिल और खुले दिमाग वाले कांग्रेसी प्रणव दादा के नेतृत्व में अलग हो सकते हैं। फिर उधर दिमागी तौर पर सोनिया परिवार के गुलाम ही बचेंगे। जो भी हो; पर कांग्रेस की डूबती नाव अब और तेजी से डूबेगी, इसमें कोई संदेह नहीं रहा।

 

 

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