राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री एक गाड़ी के दो पहिए

0
441

प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी ने जब से देश की बागडोर संभाली है, तब से देश एवं विदेश में कुछ न कुछ बेहतर होता जा रहा है। होने के लिए तो वैसे भी बहुत अच्छा हो रहा है किंतु मैं तो यही मानकर चल रहा हूं कि यदि धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा भी बेहतर होता रहे तो भी कम नहीं है।
प्रधानमंत्राी ने अभी तक जिन भी देशों की यात्रा की है वहां भारत का झंडा बुलंद किया है। अपने देश भारत में अभी तक उन्होंने जो कुछ भी किया है उससे यह आभास होता है कि देश में कोई क्रियाशील सरकार चल रही है अन्यथा पहले तो ऐसा लगता था कि जैसे देश में कोई सरकार ही नहीं चल रही है। इस समय देश के लिए सबसे अच्छी बात यह है कि सरकार के द्वारा जो कुछ भी किया जा रहा है उसे राष्ट्रपति महोदय के द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सराहा गया है।
भारत के इतिहास में शायद यह पहली बार हुआ है कि सत्ता पक्ष द्वारा उठाये गये कार्यक्रमांे को ऐसे राष्ट्रपति द्वारा सराहा गया है जिसका सत्ता पक्ष से कोई वास्ता भी न रहा हो। यदि देखा जाये तो यह अपने आप में सत्ता पक्ष के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। 21 जून को पूरी दुनिया में योग दिवस मनाया गया, इसे लेकर तमाम तरह के विवाद उत्पन्न हुए। योग दिवस को लेकर विपक्षी दलों ने आलोचना का कोई मौका छोड़ना उचित नहीं समझा, किंतु ऐसे समय में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी जहां भी गये, उन्होंने योग की महत्ता को ही स्थापित करने का प्रयास किया।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रपति जहां भी गये, सत्ता द्वारा उठाये गये कदमों के समर्थन में अपनी कूटनीतिक शैली में सत्तापक्ष के विचारों को ताकत देने के लिए अपनी बौद्धिक क्षमता के द्वारा बखूबी प्रस्तुतिकरण किया। राष्ट्रपति ने सभी क्षेत्रों, अमूमन अर्थ क्षेत्रा, व्यापारिक क्षेत्रा, सांस्कृतिक क्षेत्रा, शिक्षा क्षेत्रा या कोई अन्य और क्षेत्रा रहा हो सभी में भारत सरकार की खूबियों को उभारने का काम किया है।
भारत को सुपर वैश्विक पावर बनाने के लिए सरकार द्वारा जो भी प्रयास किया जा रहा है उन प्रयासों को राष्ट्रपति ने अपनी विदेश यात्राओं के दौरान जिस तरह प्रस्तुत किया है वह एक दुर्लभ राष्ट्रभक्त व्यक्तित्व का परिचायक है।
यहंा गौर करने लायक एक बात यह भी है कि श्री नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्राी बनने के बाद राष्ट्रपति महोदय ने जितनी भी विदेश यात्राएं की हैं। उनका वहां घुमा-फिराकर या सीधे तौर पर विचारों का रखना या बोलना दर्शाता है कि यह सब अन्य राष्ट्रपतियों की अपेक्षा अलग हटकर हो रहा है। देखने में यह भी आया है कि राष्ट्रपति ने योजनाबद्ध तरीके से उन देशों की यात्रा करना चुना है जहां प्रधानमंत्राी मोदी नहीं पहुंच पाये हैं। लगता है कि राष्ट्रपति ने उन देशों को अपनी यात्राओं में शामिल करने का शायद संकल्प सा ले लिया है।


आज देश में यदि इस प्रकार का संयोग बनना है तो यह देश के लिए नितांत सौभाग्य की बात है। राष्ट्रपति देश का राष्ट्राध्यक्ष होता है और प्रधानमंत्राी देश का शासनाध्यक्ष होता है। दोनों मिलकर यदि देश का भविष्य संवारने के लिए सोच लें तो देश का कायाकल्प निश्चित रूप से हो सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि दोनों लोग यानी राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्राी देश का भविष्य संवारने में लगे हैं।
राष्ट्रपति महोदय ने हाल में अभी स्वीडन एवं बेलारूस की चार दिन की यात्रा की। उनकी उस यात्रा से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि वहां उन्होंने जो कुछ किया उससे देश का मान-सम्मान और अधिक बढ़ा ही है। इस चार दिन की यात्रा में जिस तीव्र गति से हवाई यात्राएं हुईं, संधियां की गयीं, वार्ताएं हुईं और जो भी भाषण दिये गये, वे सब उनकी आयु को झुठला रहे हैं। इनसे उनके अनेक मेहमानों के साथ संपर्क बनाने तथा उनके साथ हुए परस्पर लाभप्रद समझौतों की ताकत के नये कीर्तिमान स्थापित हुए हैं। चूंकि भारत के राष्ट्रपतियों से परंपरागत रूप से यह आशा नहीं की जाती कि वे अमरीका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन और अन्य सुपर पावर राष्ट्रों का दौरा करें। राष्ट्रपति ने सदैव उन राष्ट्रों का दौरा किया जो भारत के सामाजिक एवं व्यापारिक संबंधों में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जुलाई 2012 में भारत के 13वें राष्ट्रपति बनने के बाद अभी तक किया गया उनका 10वां विदेशी दौरा था। अंतिम विदेश दौरों स्वीडन एवं बेलारूस में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से पहले किसी अन्य राष्ट्रपति ने वहां का दौरा नहीं किया था। उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से अपनी बैठकें इस प्रकार निधार्रित कीं जिसका कोई मकसद हो और उसका कोई सार्थक
परिणाम आये। उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान राजनीति, कूटनीति, व्यापार, संस्कृति एवं शिक्षा जैसे सभी महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की।
जिन 25 बैठकों और सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रपति ने भाग लिया, वे महज औपचारिक नहीं थीं अपितु सोच-विचार के लिए गये थे। राष्टपति ने वहां ऐसी थीम को अपनाया जो प्रत्येक अवसर एवं श्रोताओं के अनुकूल था। उनका मकसद था वहां कारोबारी नेताओं, भारतीय समूह, शिक्षाविदों तथा विदेशी नेताओं के बीच जीवंत संबंध स्थापित किया जा सके। राष्ट्रपति प्रत्येक मंच से श्रोताओं को यह अवगत कराते रहे कि पुनः उभरते हुए भारत के साथ संबंधों से आपसी लाभ होगा। उन्होंने वहां के व्यापारिक फोरम को संबोधित किया। महत्वपूर्ण विश्वद्यिालयों का दौरा किया और अपनी यात्राओं के दौरान राष्ट्रपति ने वहां रह रहे भारतीयों को सलाह दी कि वे वहां की स्थानीय संस्कृति से जुडे़ं और स्थानीय कानूनों को ध्यान में रखते हुए भारत की उन्नत विरासत के गैर सरकारी राजदूत बनें।
चूंकि श्री प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति बनने से पूर्व भारत के वरिष्ठतम नेता रहे। उन्हें यह अच्छी तरह पता है कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कब किन शब्दों का प्रयोग करना है। भारत एवं दुनिया के अन्य देशों के बारे में गहराई से उन्हें जानकारी है। स्वीडन एवं बेलारूस के पहले राष्ट्रपति बांग्लादेश, मॉरीशस, वेल्जियम, टर्की, वियतनाम, नार्वे, फिनलैंड, भूटान एवं रूस की भी यात्रा कर चुके हैं।
भारत के रक्षा, आर्थिक तथा राजनायिक संस्थाओं के प्रशासन का भारी अनुभव रखते हुए राष्ट्रपति ने अपने आप में एक वैश्विक सुपर पावर बनने की भारत के प्रयासों में प्रधानमंत्राी मोदी का सबसे अच्छा साथी सिद्ध किया है। भारत के हितों में मुखर्जी को विश्व की विजय में शांति का अलख जगाने और राष्ट्रों को परस्पर जोड़ने की शानदार झलक मिलती हैं।
कुल मिलाकर राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में निष्पक्ष रूप से विश्लेषण किया जाये तो कहा जा सकता है कि दोनों लोग एक गाड़ी के दो पहिये हैं। दोनों लोग एक मत होकर भारत को विश्व विजेता या विश्व गुरू बनाने के लिए भ्रमण करने में लगे हैं।

  • अरूण कुमार जैन

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here