जनसंख्या असंतुलन की चुकायी कीमत

                                                  इ. राजेश पाठक       
           देश की भोगोलिक एकता को प्रभावित करने वाला पहला विदेशी आक्रमण मीर कासिम द्वारा सन ६३८ में किया गया था. इसकी शुरुआत उसने सिंध पर चढ़ाई करके की थी, जब दाहिर सेन वहां के शासक हुआ करते थे . समुद्र मार्ग से होती हुई  मीर कासिम की सेना नें जब समुद्र से रेगिस्तानी इलाके में प्रवेश किया तो दाहिर के मंत्रीयों नें उसे सलाह दी कि दुश्मन की रसद काट दी जाये . जिससे कि युद्ध में जाने के पहले ही भूख-प्यास  से उनके प्राण निकल जाए.  परन्तु ये वो समय था जब कि भारतीय युद्ध-कला में  छल-कपट युक्त चेष्टाओं  को  हेय दृष्टि से देखा जाता था. दाहिर को ये सलाह ‘क्षात्र-धर्म’ के विरुद्ध  लगी; उसने इसको अस्वीकार कर दिया. परिणामस्वरुप, कासिम की सेना कराची के पास देवल के किले तक जा पहुंची. और, दाहिर के ठीक विपरीत, क्षात्र-धर्म क्या होता है इससे बेखबर, कासिम नें जो पहला काम किया वो ये कि किले के मुख्य द्वारपाल के तीन बच्चों को धोखे से अपहरण करवा लिया. और बिना देरी किये उसने एक बच्चे का सर धढ़ से अलग करवा दिया, ये दिखाने के लिए कि अगर उसकी बात न मानी गई तो उसके शेष बच्चों के साथ क्या हो सकता है! असहाय, मुख्य द्वारपाल ने किले के दरवाजे खुलवा दिये. दोनों सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया, और अंत में दाहिर के हाथों पराजय लगी. सिंध हमारे हाथों से निकल गया.
                     इसके बाद देश पर अगला विदेशी हमला ९८०ई में हुआ. इस बार हमलावरों नें जिस मार्ग को चुना वो हमारी सीमा पर स्थित उपगानिस्तान[ आज का अफ़गानिस्तान]  से होकर गुजरता था. उनका सेनापति गज़नी का सुलतान, सुब्क्तगिन, था.  गुप्तचरों से सुब्क्तगिन को पता चला कि भारतीय परंपरा में रात्रि में युद्ध नहीं लड़ा जाता . उसने अपना दूत भेजकर भारतीय राजा जयपाल शाहिया के साथ तय किया कि रात्रि के बाद अगली सुबह युद्ध लड़ा जायेगा. परन्तु अपनी ही बात से मुकरते हुए, जैसे ही आधी रात ढली कि उसने भारतीय  सेना पर हमला बोल दिया; जबकि सैनिक निहत्थे, गहरी नींद में थे! इस एक तरफ़ा युद्ध में पराजित, जयपाल को  काबुल से पीछे हट  पहले उदाबंदपुर और फिर अन्तत: लवकुशपुर[लाहोर]  को अपनी राजधानी बनाना पड़ा. सरहद पार  से होने वाले  जिहादी हमलों का सिलसिला फिर भी ना थमा.  सुबुक्तगिन नें युद्ध जहां पर समाप्त किया था, वहां से उसे आगे बढ़ाया उससे भी ज्यादा बर्बर व धूर्त उसके लड़के मोहम्मद   गज़नवी नें. अपने पूर्वजों के सबसे भरोसेमंद छल-कपट  रुपी शस्त्र का उपयोग करते हुए, उसने जयपाल शाहिया  के वंशज आनंदपाल और त्रिलोचनपाल शाहिया को पराजित किया, और अफ़गानिस्तान व पंजाब को भारत से अलग करते हुए अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया. 
               भागते शत्रु पर पीछे से वार न करना; हाथ लगे शत्रु को क्षमा-दान, अभय-दान देने में अपनी शान समझना; निहत्थे प्रतिपक्षी पर शस्त्र ना उठाना; एक बार जो वचन दिया तो पीछे नहीं हटना, फिर भले ही कितना नुकसान उठाना पड़ जाए; जय-पराजय की परवाह न करते हुए रणभूमि में  लड़ते-लड़ते बलिदान हो जाने को ज्यादा गौरव की बात समझना – सद्गुणों के प्रति ये ऐसा एकान्तिक दृष्टिकोण था जिससे भारतीय  शासक  इतिहास में आगे भी अपने  को अलग नहीं कर पाए. जिसके कारण देश को गुलामी के कलंक से छुटकारा न मिल सका और एक के बाद एक इसके हिस्से विधर्मियों के कब्ज़े में जाते  चले गए. परन्तु इस अवधि में सर्वप्रथम जिन्होंनें  सही अर्थों में जिहादीयों के छल-कपट को समझकर उनकों उन्ही के खेल में मात देते हुए सफलता पूर्वक मुग़ल सल्तनत के पतन की नींव रखी वो थे मराठा हिन्दूवीर छत्रपति शिवाजी.  शिवाजी के द्वारा दिखाए  गए रास्ते पर चलते हुए, आगे चलकर मराठा इतने शक्तिशाली हो उठे कि भयभीत, हताश औरंगजेब नें उनके समक्ष संधि का प्रस्ताव तक भेजा. पर जब तक बहुत देर हो चुकी थी. बदले में मराठाओं से मिली अपनी अवहेलना से उत्पन्न  मानसिक प्रताड़ना से औरंगजेब को मुक्ति तब ही जाकर मिल सकी जब म्रत्यु ने उस अपने गले लगाया. और, विशेषकर १७४० के बाद, मोहम्मद शाह के शासनकाल में मुग़ल जब बहुत ही कमजोर हो चले थे, देश की वास्तविक सत्ता मराठाओं के हाथों आ चुकी थी. वर्ष १७५५-१७५६ के मध्य रघुनाथ राव और मल्हारराव होलकर के नेतृत्व में उन्होंने रोहिल्ला और अफगानों के विरुद्ध निर्णायक जीत हासिल करी, और मुसलामानों के  ८०० वर्षों के शासन से  पंजाब को मुक्ति दिलाई. आगे चलकर इस विजय अभियान को और आगे बढ़ाने का श्रेय जिसको जाता है वो हैं  सिख महाराजा रणजीत सिंह.  मुस्लिम वर्चस्व को तोड़ते हुए उनके सेनापति हरिसिंह नलुआ ने अफगानिस्तान के अंदर घुसते हुए काबुल तक को सिख साम्राज्य में मिलाने में सफलता प्राप्त करी, और जिस रत्न जड़ित द्वार को आठ सौ वर्ष पूर्व मेंहमूद गजनवी सोमनाथ के मंदिर को ध्वस्त  कर अपने साथ ले गया था उसे बापस लाकर पुनः उसी स्थान पर स्थापित करने का गौरव प्राप्त किया. अमृतसर के जिस हरिमंदिर गुरुद्वारा को  अहमद शाह अब्दाली ने ध्वस्त कर  दिया था, उसका पुनर्निर्माण कर  महाराजा रंजित सिंह ने  उसे आज के ‘स्वर्ण मंदिर’ का स्वरूप  प्रदान किया. साथ ही मुस्लिम शासन काल में सदियों से चले आ रहे गोवध पर प्रतिबन्ध लगाया.
                 इस प्रकार पंजाब और अफ़गानिस्तान  राजनैतिक रूप से भारत के अधीन आ गए. जवाहरलाल नेहरु के शब्दों  में-‘मराठा और सिख,  हिन्दू पुनरुत्थान के नेतृत्व के शिखर पर थे. और भारत से मुग़ल साम्राज्य को अन्तत: इनके द्वारा ही  उखाड़ फैंका गया, ना कि अंग्रेजों द्वारा’[पृ-३६५,३७०-‘ग्लिम्प्सेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री’] .पर भविष्य में होने वाले  देश के विभाजन को रोक सकने लायक इतना काफी ना था.क्यूंकि अफ़गानिस्तान की दिशा से लगातार होने वाले जिहादी  हमलों के कारण बड़ी संख्या में इस क्षेत्र के लोगों नें इस्लाम स्वीकार कर लिया था. परिणामस्वरूप, देश के विभाजन के समय इस क्षेत्र के  ऐसे लोग जो भारत में बने रहना चाहते थे वो अल्पसंख्यक हो चले थे. ऐसे में जब मोहम्मद अली जिन्ना नें ‘सीधी कार्यवाही’ का आव्हान किया तो धर्मांध मज़हबी हमलावरों के समक्ष हिन्दुओं नें  अपने को असहाय पाया. जिसके कारण  पाकिस्तान के निर्माण को रोका ना जा सका, और १४ अगस्त, १९४७ के दिन देश को अपना विभाजन देखना पड़ा.
              

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