प्रधानमंत्री मोदी ने विदेशनीति में नये मापदंडो का निर्माण किया

लोकेश कुमारशोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की विदेश नीति के संदर्भ मे ऐसा कहा जाता है, कि यहां पर  सामान्यतः प्रति 5 वर्ष मे सत्ता का स्थानांतरण तो होता है, परंतु विदेश नीति के स्वरूप और आधारभूत ढांचे मे कोई खासा परिवर्तन नहीं होता। देश में यादि पूर्व प्रधानमंत्रियों के सदंर्भ में बात की जाए की तो देश की विदेश नीति की नींव रखने वाले सर्वप्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर डॉ.मनमोहन सिंह की विदेश-नीति प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर बड़ी नपी-तुली और लचीली दिखाई देती है।

परन्तु वर्तमान मोदी सरकार ने 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा किया है, उसका आवलोकन करें तो आभास  होता है कि इस काल में विदेश नीति “राष्ट्रहित” और “राष्ट्रीय सुरक्षा”को ध्यान मे रखकर बनाई गई है। प्रधानमंत्री मोदी सरकार की विदेश नीति में हमको संतुलन, सामंजस्यता और योजनाबद्ध-नीति का समावेश देखने को मिलता है। एक तरफ जहाँ उन्होंने अपने परंपरागत मित्र रूस के साथ रिश्तों की सुगमता बनाये रखा है तो वहीं अमेरिका के साथ में भी भारत के रिश्तों को एक -दूसरे स्तर पर लेकर गये है। इसके साथ-साथ इजरायल और ईरान के साथ ‘दोस्ती’ की एक नई शुरुआत भी कि जो कि एक अनूठी पहल है ।

इस वर्तमान परिवेश में भारत की विश्व में स्थिति देखें तो आभास होता है कि प्रधानमंत्री मोदी जी की विदेश नीति का ही कमाल है,कि सम्पूर्ण विश्व में भारत ‘अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र’ बनकर एक महाशक्ति  के रूप में उभर  रहा है। मोदी सरकार की विदेश नीति में अप्रवासी भारतीयों के ऊपर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया इसका ही परिणाम है कि अप्रवासी भारतीयों का  ‘स्वदेश’ से पुनः एक नये तरीके से जुड़ाव हुआ है| जिसको कि पूर्व की मनमोहन सरकार स्थापित करने में पूर्णत: विफल रही थी।

सत्ता में आने के बाद में मोदी सरकार की विदेश नीति में दक्षिण एशिया और विशेष कर पडोसी देशो पर बड़ी ही प्रमुखता से ध्यन केन्द्रित किया है| इस बात का अंदाज़ा हम  इससे ही लगा सकते हैं, कि उन्होंने अपने शपथ-ग्रहण समारोह में दक्षेस देशों के सभी नेताओं को आमंत्रित किया था। इसके साथ ही प्रधानमत्री  मोदी ने पाकिस्तान के तत्कालीन वज़ीर-ए-आज़म नवाज शरीफ को शपथ-ग्रहण समारोह मे आमंत्रित कर भारत ही नहीं अपितु विश्व के प्रमुख रणनीतिकार एवं बुद्धिजीवियों को चौका दिया था।

इसी क्रम  मे उन्होंने नेपाल और भूटान कि यात्रा की और दोनों देशों के साथ मधुर  संबंधों कि  एक नई ‘इबारत’ लिखी | मोदी सरकार के  आने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की विदेश नीति मे दृढ़ता के साथ मजबूती आई है। मोदी की विदेश नीति का ही करिश्मा था कि एक सुर मे सुरक्षा परिषद मे निषेधाधिकार (वीटो) वाले देशों ने भारत की स्थायी सदस्यता का पुरजोर समर्थन किया।

पाकिस्तान को लेकर मोदी सरकार की विदेश नीति आक्रामक होने के साथ संतुलित और संयमित दिखती है। जब प्रधानमंत्री मोदी जी सत्ता में आये उस समय में पाकिस्तान के साथ भारत के  संबंध मधुर नहीं रहे है । मोदी सरकार का हूर्रियत-मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ सचिव-स्तर वार्ता स्थगित करना यह बताने के लिए काफी था कि आतंकवाद और कश्मीर-मुद्दे पर भारत पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। इसके साथ ही हाल में हुए पुलवामा हमले का जिस तरह से बालाकोट में जबाव लिया, साथ ही अभिन्दन को पुनः भारत लाने का कुटनीतिक कार्य किया उसने मोदी सरकार कि छवि को विश्व समेत भारत के जनमानस में और मजबूती से स्थापित कर दिया है|

मोदी सरकार की महान शक्तियों के प्रति कूटनीति

मोदी सरकार की सबसे बड़ी विदेशी नीति की सफलताएँ भारत के बाहरी देशों विशेषकर विश्व की प्रमुख शक्तियों के साथ जो सम्बन्ध रहे है उसने मोदी सरकार कि छवि के साथ ही भारत को सम्पूर्ण विश्व के समक्ष में एक प्रमुख देश के रूप में स्थापित किया है |

यह विशेष रूप से हमको विशेष रूप से भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी के  सम्बन्ध में देखने को मिलता है, जहां द्विपक्षीय भागीदारी के मामले में दोनों देशों ने इतिहास के बोझ को उतार फेंका और रक्षा सहयोग, आधारभूत लौजिस्टिकल समझौतों और भारत-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग सहित विभिन्न मुद्दों पर जोर दिया है । इसको देख कार ऐसा लाग रहा कि मोदी सरकार के द्वारा जो मधुरता हमको ओबामा के काल में देखने को मिली वो ट्रम्प  प्रशासन में भी देखने को मिल रही है |

विपक्ष तथा कुछ अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि अमेरिका को प्रमुखता देने के कारणवश भारत के रूस के साथ संबंध बिगड़ गए हैं क्योंकि भू-राजनीतिक गतिशीलता में बदलाव के कारण भारत अमेरिका संबंध घनिष्ठ हुए हैं लेकिन इन सभी को सटीक जवाब देने का कार्य स्वयं रूस ने किया है जिसने अपने देश का सर्वोच्च सम्मान माननीय मोदी जी को दिया जो कि ये साबित करता है कि भारत की रूस के साथ  स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से जो मधुरता चली आरही है उसे कोई भी खत्म नहीं कर सकता है |

इसके साथ ही प्रधानमत्री  मोदी जी के द्वारा जो ईरान, इराक, इजरायल, और सऊदी अरब की यात्रा की है उसने देश के लिए नये विकल्प खोले हैं जिसका ही परिणाम है कि जो एक दूसरे के धुर-विरोधी देश हैं वो वर्तमान समय में स्वयं के हित को भुलाकर भारत को विश्व के विभिन्न मंचों पर समर्थन करते हैं, इस बदलाव का प्रमुख कारण मोदी जी की इन देशों की यात्रा ही है।

मोदी सरकार ने एशिया समेत विश्व के प्रत्येक मंच पर चीन को भी संतुलित करने का कार्य बहुत ही सटीक तरीके से किया। इसका ही परिणाम है कि डोकलाम विवाद को भारत ने बड़ी ही सरलता के साथ में सुलझाने में सफलता हांसिल की है। प्रधानमत्री मोदी के काल में अफ्रीका महाद्वीप के देशों के साथ भी भारत के सम्बन्ध मधुर हुए है, इसका आभास हम इस बात से ही लगा सकते है कि प्रधानमंत्री मोदी जी के सत्ता में आने के बाद में लगभग 25 के करीब अफ्रीकी देशों की भारत के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति समेत अन्य गढ़मान्य लोगों ने यात्रा की और साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीकी, रक्षा तथा अन्य विभिन्न विषयों पर समझौते किये| जिसका ही परिणाम है कि इन देशों के साथ में भारत के सम्बन्धों को एक नया मुकाम मिला है जो कहीं ना कहीं इस क्षेत्र में चीन को चुनोती प्रस्तुत करता है|

निष्कर्ष

मोदी सरकार की विदेश नीति के पिछले 5 वर्ष इसलिए याद किए जाएंगे कि उन्होंने विदेश में भारतीय प्रवासी वर्ग को एक विशेष प्रकार कि अनुभूति प्रदान की है जिसके निर्माण में नरेंद्र मोदी की सांस्कृतिक कूटनीति ने मुख्य भूमिका निभाई  है| इसका ही परिणाम है कि विश्व के सभी देशों में जहाँ भी भारतीय लोग रह रहे वो पुनः मोदी  को ही देश के प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं| इसीलिए वर्तमान वैश्विक परिवेश को देखकर ऐसा लगता है कि नरेंद्र मोदी 2019 में पहले की तुलना में और अधिक शक्तिशाली रूप से भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे।

साभार : https://www.academics4namo.com

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