प्रो रामजी सिंह जिन्होंने गांधी के चिंतन और दर्शन को साक्षात उतारा है

कुमार कृष्णन
प्रो.रामजी सिंह प्रख्यात गांधीवादी चिंतक हैं,जिनकी ख्याति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है। जिन्हें देख कर गांधी,विनोवा के दर्शन का साक्षात्कार होता है। गांधी के चिंतन और दर्शन को साक्षात इन्होंने अपने जीवन में उतारा है। पूरा जीवन गांधी के विचारों के प्रति समर्पित रहा है। वे न सिर्फ गांधीवादी चिंतक हैं,बल्कि चिंतन को अपने जीवन में उतारा है। उनकी सरलता और सहजता सवोें पर अपना प्रभाव छोड़ती है।
लंबा दुबला—पतला,खद्दरधारी कंधे में झोला लटकाए, चाल में किसी युवा से भी अधिक फुर्तीला,भारत के हर कोने में गांधी समागम में दिख जानेवाला, युवकों के साथ धुलने—मिलने और निराभिमानी व्यक्तित्व के धनीप्रो. रामजी सिहंका यही परिचय है। बिहारके मुंगेर में एक साधारण किसान परिवार में जन्म लेकर उन्होंने विद्वता के जिस शिखर को छुआ है, वह प्रेरणापुंज की तरह है।पटना विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर,जैन धर्म पर पीएचडी, राजनीति विज्ञान के अंतर्गत विचार में डी.लिट कर प्रो.सिंह हिन्दस्वराज पर यूजीसीके इमरीटस फेलो रह चुके हैं।उनके जीवन में सारस्वत साधना और सक्रिय सामाजिक प्रतिवद्धता का अद्भूत समन्वय रहा है। पचाास से अधिक ग्रंथें का लेखन एवं संपादन केअलावा उनके हजारों लेख देश—विदेश में प्रकाशित हुए हैं। गांधी विचार और सामाजिक साधना सर्वोदय से जुड़े रहने के कारण उनकी ख्याति पूरी दुनिया मे गांधीविचार के गुढ़ अध्येता, व्याख्याकार और इंनसाइकलोपीडियाके रूप में है।शिक्षकों के नेताके रूप में उन्होंने अनवरत संघर्ष किया।कभी व्यवस्था से टकराना पड़ा तो कभी खुद से। विहार विश्वविद्यालयों के शिक्षक महासंघ के संघर्षशील अध्यक्ष और आचार्यकुलके संस्थापक सदस्यके रूप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कीं।जब वे भागलपुर विश्वविद्यालय के शिक्षक थे, उन्हीं दिनों विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में सक्रिय हुए। शिक्षकीय दायित्व का निर्वहन करते हुए वे गंगा नदी पर कर रात में भूदान के कार्यमें लग जाते थे। अपनी जमीन भी उन्होंने भूदानमें दान की।शैक्षिक प्रयोजन से उन्होंने दुनिया के बीससे अधिक देशों की यात्रा कीहै। वेल्स के स्वानसी में राष्टमंडलीय कुलपति सम्मेलन केे साथ—साथ राष्ट्रपिता गांधी के 125वीं वर्षगांठ पर इंंगलैंडमें बर्मिधम से लंदन की यात्रा और 1907 ई. में स्थापित हवाई विश्वविद्यालय की में आयोजित प्रची—प्रतीची दार्शनिक सम्मेलनमें शिरकत की।1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के साथ—साथ 1974—75 के छात्र आंदोलन में भी उन्होंने शिरकत की। लगभग बीस माह तक मीसा एक्ट के अंतर्गत बंदी रहे।1977 में भागलपुर से सांसदके रूप में निर्वाचित हुए। अपने अल्प कार्यकाल में जीवन में कामके अधिकार पर विधेयक लाया।आज़ादी के आंदोलन से निकले रामजी सिंह ने जब चुनाव लड़ा तो एक पैसा भी खर्च नहीं किया।
वो कहते हैं, “मैंने जब चुनाव लड़ा तो अपराधियों के गढ़ तक में गए, लेकिन कभी किसी ने चोट नहीं पहुंचाईं बल्कि वो हमसे डरते थे. अब तो ये सब कुछ सपने जैसा लगता है। आज मैं चुनाव लड़ना चाहूँ तो लोग मेरी जात पूछेंगें।” वोघगया भूमि मुक्ति आंदोलन सहित देशभरके अहिंसक के आंदोलनों में विनम्र सत्याग्रही की तरह सहभागी रहे हैं। विनम्रता और सिद्धांतो के प्रति दृढ़ता एक व्यक्ति में किस प्रकार संगठित होती है,यह प्रो.रामजी सिंह के व्यक्तित्व में देखनेको मिलती है।गांधी, विनोबा और जयप्रकाशके विचारों के प्रखर प्रवक्ता के रूप में पूरी दुनिया में इनकी ख्याति है। बिहार सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष के रूप में बिहार के विभिन्न जिलों में भूदान किसानों की बेदखली को लेकर लगातार सत्याग्रह आंदोलन चलाया। गांधी विचार में यकीन रखनेवाले सांसदों को संगठित का प्रयास हो या फिर राज्यके 391 वुनियादी विद्यालयों को गांधी विचारके अनुरूप संगठित करने का सवाल हो,वे लगातार सरकार के साथ संवाद कर रहे हैं।राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकरके कुलपतित्व काल में जब गांधी विचार के अध्ययन—अध्यापन का प्रस्ताव रखा गया तो प्रो. सिंह नेउन्हें कार्यरूप दिया। परिणामस्वरूप1980 में भागलपुर विश्वविद्यालय मेंगांधी विचार की पढ़ाई आरंभ हुई और वे इस विभाग के संस्थापक विभागाध्यक्ष हुए।गांधी विचार विभाग के संस्थापक अध्यक्ष रहे प्रोे.रामजी सिंह ने अपनी पांच हजार किताबें और हस्तलिखित फुटनोट्स विभाग को दे दी है। इन किताबों में अधिकतर दर्शन और गांधी विचार से जुड़ी हैं। वहीं, हस्तलिखित फुटनोट्स उनके व्याख्यान से जुड़े हैं। ये फुटनोट्स सेमिनार और अन्य आयोजनों में भाषण के दौरान बनाए गए थे। गांधी विचार विभाग में इन किताबों को व्यवस्थित करके डॉ. रामजी सिंह पीठ स्थापित की गई है। उन्हें जैन भारती विश्वद्यालयके कुलपति होने का भी गौरव हासिल है। जब 1989 भागलपुर का भीषण दंगा हुआ तो गांव—गांव जाकर शांतिके लिए काम किया। साम्प्रदायिकता की ज्वाला शांत हुई।अंखफोड़वा कोंड के समय भी न्यायका साथ दियाऔर इस सवालको सर्वोच्च न्यायालयमें उठाया जिसके कारण पीड़ितों को इंसाफ मिला। भूदान किसानों की बेदखलीके सवाल पर इनकी लड़ाई जारीहै।विवेकानंद के शिकागों भाषण के शताब्दी वर्ष पर शिकागोमें आयोजित विश्वधर्म संसद में उन्होंने तेरापंथी जैन धर्मका प्रतिनिधित्व किया।जबकि दक्षिण अफ्रीकाके धर्म सम्मेलनमें संतमत के प्रतिनिधि के रूप में हिस्सा लिया।सर्व घर्म समभावमें इनकी अटूट आस्था है। वे बारह वर्षो तक अखिल भारतीय दर्शन परिषद के मंत्री तथा अध्यक्ष रहे।इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय दर्शन सम्मेलन के वाइ टन के प्रमुख बक्ता और शिकागो 1993 तथा केपटाउन 2009 के विश्वधर्मसम्मेलन के प्रमुख बक्ता रहे हे।लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 113 जयंती पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें सम्मानित कर बिहारको गौरवान्वित किया।उनका मानना है कि गांधी विचारधारा भारतीय संस्कृति और वाग्मय का नवनीत है। गांधीजी ने अहिंसा के रास्ते छोटे-छोटे आंदोलन से पहले देश की जनता का मानस तैयार किया और फिर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरु किया। देश आज़ाद ज़रुर हो गया लेकिन गांधीजी जिन—जिन मुद्दों पर ज़ोर देते थे वह बरकरार है। गरीबी और बेकारी के साथ गैर बराबरी की समस्या दूर होने पर ही भारत सच्चे अर्थों में स्वाधीन होगा। गांधीजी एक गुप्त प्रस्ताव लेकर पाकिस्तान जाना चाहते थे। उस प्रस्ताव में दोनों देशों में कभी भी युद्ध ना करने और अपने अपने देश के अल्पसंख्यकों की रक्षा करना राज्य का जिम्मा होने की बात थी लेकिन वो कार्य पूर्ण नहीं हो पाया। वे कहते हैं कि गांधी को समझना है तो उनका साहित्य पढ़े ना कि सुनी-सुनाई बातों पर अपना मत बनाए। गांधीजी के पूरे दर्शन को समझने के लिए एक ही किताब पढ़ी जानी चाहिए और वो है हिंद स्वराज।जीवन के उलझे सवालों का जवाब देना ही दर्शनशास्त्र का बुनियादी उद्येश्य है। भौतिकता की आंधी में हमने अपने पर्यावरण का भी नाश कर दिया है, जिसका समाधान अपरिग्रह सिद्धांत के द्वारा ही संभव है। दर्शनशास्त्र का यही क्रियात्मक पहलु है कि हम विश्व को केन्द्र में रखें और आणविक युद्ध के कगार पर खड़ी दुनिया को बचाने का सामूहिक प्रयास करें। आत्मज्ञान के बिना अहिंसा की शक्ति प्राप्त नहीं होती। उन्होंने कहा कि गांधीजी को आज विज्ञान का विरोधी बताया जाता है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। गांधीजी आत्मज्ञान एवं विज्ञान के समन्वय पर बल देते थे। उनका कहना था कि आत्मज्ञान के बिना विज्ञान अंधा है और विज्ञान के बिना आत्मज्ञान पंगु है।, देश के सामने सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी एवं विषमता है। आज देश में आर्थिक विषमता की दर 27 प्रतिशत पहुंच चुकी है। जिसका मतलब है कि एक व्यक्ति के पास इतनी दौलत है जो 27 व्यक्तियों के पास नहीं है। आज जनता के हित की राजनीति नहीं हो रही है। केवल राजनीतिक दलों के प्रमुखों के दिशा-निर्देशों पर ही राजनीति हो रही है।यदि जनता की आवाज सुनी जाती तो निर्णय जनमत से लिए जाते। आज राजनीति में नीति नहीं है, सिद्धान्तहीन राजनीति का कोई आधार नहीं है। आज की राजनीति को बदलना होगा, यह राजनीति अंग्रेजों से उधार ली गयी राजनीति है। राम जी सिंह को लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 113 वीं जयंती प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सम्मानित किया है। 2019 में मुंगेर में आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र राष्ट्रीय सम्मान से परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने भी सम्मानित किया है। 2020 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मान मे सम्मानित किए जाने की घोषणा की थी। कल राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने पद्म सम्मान से अलंकृत किया। उनका व्यक्तित्व सभी सम्मानों से सर्वोपरि है।

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