लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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भारत के प्रति चीन की दुर्भावना को लेकर एक और प्रश्न आम तौर पर पूछा जाता है। वह प्रश्न चीन के इतिहास और संस्कृति से ताल्लुक रखता है। आज से लगभग दो हजार साल पहले चीन में बुद्ध वचनों का प्रसार हुआ था। बुद्ध के बचनों और बुद्ध के प्रवचनों ने चीन की मानसिकता को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चीन में स्थान-स्थान पर भगवान बुद्ध के विशाल मंदिर बने हुए हैं। बुद्ध मत से सम्बंधित सभी महत्वपूर्ण ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद हुआ है। नालंदा विश्वविद्यालय जो अपने वक्त में बौद्ध दर्शन का विश्व विख्यात केन्द्र था, चीन से पढने के लिए अनेक छात्र और विद्वान आते थे। विख्यात चीनी दार्शनिक ह्वेनसांग इसी ध्येय की पूर्ति के लिए अनेक कठिनाइयां सहते हुए भारत आया था। भारत और चीन के बीच दर्शन शास्त्र के विद्वानों का आना -जाना लगा रहता था। चीन के लोग भारत को पावन स्थल मानते थे और उनके जीवन की एक आकांक्षा बौद्ध गया और सारनाथ के दर्शन करने की भी रहती थी। साधारण चीनी के मन में भारत का स्वरुप एक तीर्थ स्थान का स्वरुप बनता था। अतः चीनियों के मन में भारत के प्रति दुर्भावना हो, ऐसा सम्भव नहीं लगता। यह परम्परा प्राचीन इतिहास पर ही आधारित नहीं है बल्कि इसको अद्यतन इतिहास तक में देखा जा सकता है। रविन्द्र नाथ ठाकुर ने जब शांति निकेतन की स्थापना की तो उसमें अध्ययन के लिए चीनी विभाग भी स्थापित किया और चीन से विद्वानों को निमंत्रित किया। यहां तक कि माओ ने जब चीन में गृह युद्ध शुरु किया तो उस गृह युद्ध में दुख भोग रहे चीनियों की सहायता के लिए महाराष्ट्र के एक डॉक्टर श्री कोटनिस ने अपना पूरा जीवन ही उनकी सेवा में समर्पित कर दिया। वे भारत से चीन चले गए और गृह युद्ध में घायल चीनियों की सेवा-सुश्रुशा करते रहे। वहीं उन्होंने एक चीनी लड़की से शादी की। और सेवा करते-करते उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। चीन के लोग आज भी डॉ.कोटनिस का स्मरण करते हुए नतमस्तक हो जाते हैं। तब यह प्रश्न पैदा होता है कि इस परम्परा की पृष्ठभूमि में चीन भारत का विरोधी कैसे हो गया। इतना विरोधी कि उसने 1962 में भारत पर आक्रमण ही कर दिया और आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी उसने अपने भारत विरोध को छोड़ा नहीं है।

इस प्रश्न का उत्तर खोजने से पहले एक और प्रश्न का सामना करना पड़ेगा। वह प्रश्न है कि क्या आज का चीनी शासकतंत्र सचमुच चीन के लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा है। चीन में जो साम्यवादी पार्टी सत्ता पर कुंडली मारकर बैठी है उसने यह सत्ता बंदूक के बल पर हथियाई है, न कि लोकमानस का प्रतिनिधि बनकर। साम्यवादी दल का सत्ता संभाले हुए आज 60 साल से भी ज्यादा हो गए हैं लेकिन उन्होंने कभी भी लोकमानस को जानने का प्रयास नहीं किया और न ही कभी लोगों की इच्छाओं के अनुरुप चुनाव होने दिए। इसके विपरीत लोक इच्छा को दबाने के लिए शासक साम्यवादी दल ने थ्यानमेन चौक पर अपने ही लोगों पर टैंक चढ़ा कर उन्हें मार दिया। साम्यवादी दल, दरअसल चीनी की पुरानी परम्परा और सांस्कृतिक विरासत को समाप्त करने का प्रयास कर रहा है इसलिए उसने चीन में महात्मा बुद्ध के प्रभाव को विदेशी प्रभाव घोषित कर दिया है। साम्यवाद मूलतः भौतिकवादी दर्शन है। वह मुनष्य को बाकी सभी स्थानों से तोड़कर केवल भौतिक प्राणी के नाते विकसित करना चाहता है। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी यही प्रयोग कर रही है। इस प्रयोग के लिए यह जरुरी है कि चीन को उसकी विरासत, इतिहास और संस्कृति से तोड़ा जाए। इसलिए, आधिकारिक चीनी प्रकाशनों में भगवान बुद्ध को कायर और पलायनवादी तक बताया गया है। एक चीनी अधिकारी ने तो यहां तक कहा कि बुद्ध के माध्यम से भारत ने चीन पर बिना कोई सैनिक भेजे दो हजार साल तक राज्य किया। इन प्रश्नों को लेकर चीन के भीतर भी घमासान मचा हुआ है। चीनी साम्यवादी शासकदल लोगों का इन प्रश्नों पर एक प्रकार से मानसिक दमन कर रहा है और उन्हें पशुबल से चुप रहने के लिए विवश किया जा रहा है। रुस ने लगभग एक शताब्दी तक यह प्रयोग मध्य एशिया के अनेक देशों में किया था लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो पाया। चीन के लिए महात्मा बुद्ध के प्रभाव को समाप्त करने के लिए जरुरी था कि बुद्ध वचनों के उद्गम स्थल भारत को भी शत्रु की श्रेणी में रखा जाए। चीनी साम्यवादी शासक दल के भारत विरोध का यह एक मुख्य कारण हो सकता है। चीन के लोग कहां खडे हैं और चीन की साम्यवादी शासक पार्टी कहां खड़ी है इसका पता तो तभी चलेगा जब भविष्य में कभी चीन में लोगों द्वारा चुनी गई सरकार स्थापित होगी। तब भारत और चीन के रिश्तों की नए सिरे से व्याख्या होगी। लेकिन यह सब भविष्य की बातें हैं। फिलहाल तो चीन हिमालय पर घात लगाकर बैठा है।

-डा.कुलदीप चंद अग्निहोत्री

4 Responses to “भारत को लेकर चीन का मनोविज्ञान”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    द्वंद्वात्मक साम्यवादी (Dialectics) प्रणालियां, जैसे चीनी शासकीय विचार प्रणाली, पहले स्वस्थ परंपराओंको समाप्त करनेमें विश्वास करती है।जिसके कारण, फिर (chaos )अस्तव्यस्तता, अराजकता, अव्यवस्था, पैदा होती है। इस अव्यवस्थासे , क्रांति होनेमें सहायता होती है।उसमेसे गुजरकरही नयी व्यवस्था जन्म लेती है; ऐसा मानती है।–जैसे, जमा हुआ सुगठित दहि मथनेके बादहि छाछ, और मक्खन(नयी व्यवस्था) उपर लाता है, वैसे सुगठित परंपराएं क्रांतिके लिए पोषक नहीं होती है, ऐसी उनकी मान्यताएं होती है। इसीलिए सारी परंपराओंको समाप्त करनेमें यह प्रणालीयां, एडी चोटीका-(हिंसाभी स्वीकार्य)- भगिरथ प्रयास करनेमें जुटी हुयी दिखायी देती है। भारतकेभी सारे कथित, अकथित वामवादी, अपने समाजमेभी शत्रुता, वैमनस्य, विघटन, (राष्ट्रविरोधी) और विभाजनकोभी उत्तेजित करते दिखाई देते हैं।इनका सिद्धांत : जब तक समाज टूटता नहीं, क्रांति असंभव है। यह मान्यता रखनेवाले, चीन के शासक ही नीति निर्धारित करेंगे, जनता नहीं। वहां खूनी क्रांति हुयी है। करोडों ( ४०+३०= ७० करोड) जनोंको मारकर शासन सुधार(?) कर सका है। शासन से अपेक्षा करना मुझे तर्कहिन लगता है। किंतु, फिर बर्लिनकी दीवारका ढहना, या USSR का विघटन, अनपेक्षित रीतिसेहि हुआ था। यदि ऐसा कुछ हो तो कहा नहीं जा सकता। किंतु संप्रति घटनाओंके आधारपर यह असंभव लगता है। जनता भारतसे और भगवान बुद्धसे सहानुभूति रखनेसे कुछ विशेष अंतर नहीं पड सकता। मैने तो वहां (२००७, अगस्तके प्रवासमें)लोगोंको, बुद्ध मंदिरोंमें जुते पहनकर और टिकट खरीदकर अंदर जाते देखा। बुद्धका उपयोगभी मुद्रा कमानेमें चीन कर रहा है।
    संक्षेप: शासक निर्णय लेता है, चीनकी जनता नहीं। भारत अत्याधुनिक शस्त्रास्त सज्ज, और सिद्ध यदि रहा, तो चीन युद्ध करनेके पहले चार बार सोचेगा।यही रास्ता है, हमारे लिए।शांतिके लिए।

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  2. p.c.rath

    aapaka china virodh kewal comounist virodh hai yah samajh me aata hai isi tarah amerika ke liye kam karte rahe. hame apane padosi se bina koi purvagrah rakhe behtar sambandh banane chahiye antath vahi hamare kam aata hai.

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  3. Anand G.Sharma

    भगवान बुद्ध चीन के शाशकों को सदबुद्धि दें – यही प्रार्थना है l

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    • yash rattan Devgon

      p.c.rath का यह कहना गलत है कि, ” आपका चाइना विरोध केवल कोमौनिस्ट विरोध है यह समझ में आता है इसी तरह अमेरिका के लिए काम करते रहे | हमें अपने पडोसी से बिना कोई पूर्वाग्रह रखे बेहतर सम्बन्ध बनाने चाहिए अंतत वही हमारे काम आता है |”
      पहले उसने १९६२ में हम पर हमला किया और सेकड़ों मील हमारा इलाका हथिया लिया जिस पर वो अब भी काबिज है | अब १९ किलोमीटर हमारे इलाके में घुस आया | तिब्बत पर हमला कर पूरे देश पर काबिज है | उसकी नजरें बाकि पड़ोसी देशों कि जमीन और समुद्रों पर भी है | उस पर किसी तरह भी इतबार नहीं करना चाहिए, वह हिंदी चीनी भाई भाई कह कर पीठ में छुरा घोप्ने में माहिर है | १९६२ में भी जब चीन ने भारत पर हमला किया था कोम्मुनिस्ट्स ने पता नहीं क्यों चीन का भारत में साथ दिया था | अब वह smuggled मॉल भारत में भेज कर यहाँ कि अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर रहा है, चीन के मॉल का बिल मांग कर देखों चाहे वह मोबाईल हो या कुछ भी बिल इस लिए नहीं मिलता क्योंकि वह स्मुग्ग्लेद है और हमारी सरकार धडा धड वहाँ से मॉल मंगवा कर इस देश के कारखानों को बंद करवाने पर तुली है |

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