पं. बेनीमाधव तिवारी: जैसा मैंने देखा

beni madhav tiwari

गिरीश पंकज
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपनी विशेष सामाजिक-राजनीतिक छवि के लिए मशहूर रहे पंडित बेनीमाधव तिवारी जी का 19 अगस्त, 2014 को निधन हो गया। अपने जीवन में ईमानदारी, समर्पण और निष्ठा के पर्याय पं. तिवारी का जाना समाज से एक और भले इंसान का चला जाना है। वैसे भी अब भले लोगों की कमी होती जा रही है। ऐसे समय में बेनीमाधव तिवारी जी का जाना घर-परिवार और उनके मित्रों के लिए दुखद घटना ही है। लेकिन उनको निकट से जानने और मानने वाले लोगों के दिलों में वे हमेशा बसे रहेंगे। जब उनका निधन हुआ तो वे 86 साल के हो चुके थे। शरीर कमजोर हो चुका था मगर वे बेहद सक्रिय रहते थे और समय-समय पर सही मार्गदर्शन करते रहते थे। पत्रकारिता में सक्रिय रहने के कारण कभी-कभी मेरी उनसे भेंट होती रहती थी।
मुझे याद है कि पच्चीस लाल पहले एक बार वे मुझसे मिलने प्रेस क्लब भी आए थे। तब मैं समझ नहीं पाया था कि कारण क्या था। बाद में रहस्य समझ में आया कि वे मुझे देखने और मेरे बारे में कुछ पता करने आए थे। उनके आगमन का रहस्य बाद में तब खुला जब उन्होंने मेरे पिता से मुलाकात की और मुझे अपना दामाद बना लिया। पहले तिवारीजी को मैं दूर से ही जानता था, मगर पारिवारिक रिश्ता जुड़ जाने के बाद उनको हमेशा निकट से देखने का सुअवसर मिलता रहा। पत्नी से पापजी के अनेक प्रेरक किस्से मैंने सुने। बाल्यावस्था में उन्होंने आजादी के संघर्ष में भी भाग लिया। लेकिन देश की स्वतंत्रता के बाद काम की तलाश वे घर से निकल पड़े और लभेदी (इटावा)से नागपुर आ गए। और पं. रविशंकर शुक्ल परिवार से जुड़ गए। पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के साथ सन् 1951 से जो रिश्ता कायम हुआ, तो वह जीवनपर्यंंत बना रहा। श्री शुक्ल के बेहद करीबी लोगों में एक होने के बावजूद उन्होंने कभी भी अपनी राजनीतिक पहुँच का दुरुपयोग नहीं किया, यह सर्वाधिक उल्लेखनीय बात है। हाँ, जब कभी किसी को जरूरत पड़ी तो उसकी सहायता के लिए वे हमेशा आगे रहे। क्योंकि लोकमंगल उनका लक्ष्य था। और जीवन भर वे यही करते रहे। कुछ लोगों ने उन्हें आहत करने की कोशिश की मगर वे उनको माफ करते रहे। किसी के प्रति बदले की भावना से काम न करने का जीवन-मंत्र देने वाले पं. तिवारी जैसे लोग अब दुर्लभ हैं। यही कारण है कि उनके निधन के बाद उनके समकालीन और उनके स्नेह-सहयोग से जीवन और राजनीति में सफल हुए अनेक लोग दुखी हुए।
पं. तिवारी का पत्रकारिता से भी जुड़ाव रहा। रायपुर में अँगरे•ाी समाचार पत्र द हितवाद को शुरु करने का श्रेय इन्हीं को जाता है। वे लम्बे समय तक हितवाद के प्रकाशक रहे। पं. तिवारी विद्या भैया के सच्चे सलाहकार के रूप में जाने जाते रहे। लोग जानते हैं कि अनेक मौकों पर तिवारी जी ने विद्याचरण जी के गलत निर्णयों का प्रतिवाद भी किया। बाद में विद्या भैया ने भी स्वीकारा कि आपने बिल्कुल सही कहा था। यह और बात है कि जब विद्या भैया के इर्द-गिर्द चंगू-मंगू किस्म के लोगों को घेरा बढऩे लगा, तो पं. तिवारी धीरे-धीरे दूर होते गए लेकिन उनसे पारिवारिक आत्मीयता बनी रही। वे दिल से कभी अलग नहीं हुए और अंतिम सांस तक विद्याभैया और उनके परिवार के प्रति सद्भावना बनाए रखी। गत वर्ष जब नक्सली हमले में विद्या भैया घायल हुए तो पं. तिवारी की बेचैनी बढ़ गई थी। और एक माह बाद जब विद्या भैया का निधन हुआ तो तिवारी जी खाना-पीना छोड़ कर दिन भर गुमसुम रहे।
पं. तिवारी ने अपने जीवन को समाज सेवा के लिए होम कर दिया। राइस किंग नेमीचंद्र श्रीश्री माल जी से उनके मित्रवत् संबंध थे। मित्रता इतनी प्रगाढ़ थी कि अनेक मौकों पर दोनों किसी मुद्दे पर शर्त भी लगाया करते थे। नेमीचंद जी करोड़पति थे लेकिन उन्होंने पं. तिवारी से मित्रता सिर्फ इसलिए निभाई कि उन्होने तिवारी जी में ईमानदारी देखी। त्यागभावना देखी। दोनों ने एक साथ विदेश यात्राएँ भी की। पं. तिवारी ने कृषि कार्यों का अवलोकन करने जापान की यात्रा की। वहाँ वे तीन माह रहे । वहाँ की कृषि की तकनीक का अध्ययन करके वे लौटे तो अनेक किसानों को उसका लाभ मिला। पं. तिवारी ने चालीस साल पहले अनेक देशों की हवाईयात्राएँ की। उस वक्त बहुत कम लोग ही हवाई यात्रा करते थे। यह वह दौर था जब राजनीति के केंद्र हुआ करते थे विद्या भैया और उनके सलाहकार हुआ करते पं. बेनीमाधव तिवारी। विद्या भैया इनके भरोसे राजनीति में निश्चिंत हो कर सक्रिय रहते और पं. तिवारी उनके भरोसे को बरकरार रखते हुए क्षेत्र के लोगों की जितनी भलाई में लगे रहते थे। पं. तिवारी का नाम लेते ही अनेक लोग उन्हें श्रद्धा से याद करते। बड़े नेताओं के इर्दगिर्द मंडराने वाले अनेक छुटभैये लोग मालामाल हो जाते हैं, लाल हो जाते हैं, लेकिन पं. तिवारी हमेशा सामान्य जीवन जीते रहे। न धन कमाया, न कभी दंभ नहीं दिखाया। मेहनत और ईमानदारी से परिवार का भरण-पोषण करके बच्चों को लायक बना दिया। वे कभी सक्रिय राजनीति में नहीं गए न बेटों को उस ओर जाने दिया। कारण यही था कि उन्होंने राजनीति के विद्रूप को निकट से देखा-समझा था। वे राजनीति में सक्रिय नहीं रहे लेकिन कांग्रेस के प्रति गहरा लगाव था। आपात्काल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी और इंदिरा गांधी गिरफ्तार की गई थी इसके विरोध में पं. तिवारी ने सपत्नीक गिरफ्तारी दी थी। वे चाहते तो कांग्रेस से जुड़ कर काफी आगे निकल जाते लेकिन पार्टी पालिटिक्स से सदैव दूर रहे।
सत्साहित्य अध्ययन में उनकी गहरी रुचि थी। मेरे साहित्य प्रेम को वे जानते थे इसलिए जब भी उनसे मिलता था तो वे मुझे कल्याण के कुछ अंक जरूर दे दिया करते थे। घनश्याम प्रसाद बिड़ला की लोकप्रिय कृति बापू की प्रेम प्रसादी आज भी मेरी धरोहर है। पं. रविशंकर शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ भी उन्होंने मुझे भेंट किया था। जब कभी मेरी कोई नई पुस्तक प्रकाशित होती तो वे बहुत खुश होते और पुस्तक पढ़ कर प्रतिक्रिया भी देते थे। कुछ सार्थक सुझाव भी देते ताकि मेरा लेखन और बेहतर हो सके। मेरा उपन्यास एक गाय की आत्मकथा पढ़ कर उन्होंने भारतीय गायों की दुर्दशा पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।
पिछले साल मेरे पिताजी का निधन हुआ तो लगा कि एक बरगद उखड़ गया, अब मुझे छाँव कौन देगा, तब संतोष था कि पापा जी (पं. बेनीमाधव तिवारी)तो हैं लेकिन अब यह छाँव भी छिन गई। विधि के विधान के आगे हम सब विवश हैं। अब केवल यादें हैं। यही यादें हमारा मार्गदर्शन करती रहेंगी। उनके सदकार्यों के पीछे-पीछे चल कर हम सबको एक दिशा मिलेगी। मृत्यु एक अटल सत्य है। इसे स्वीकार करना ही पड़ता है। इस पर किसी का वश नहीं। मैं कर्मनिष्ठ पं. बेनीमाधव तिवारी जी को शत्-शत् नमन करता हूँ। इन पंक्तियों के साथ कि
चमन खामोश है कि फूल कोई झर गया है
भला वो कौन है जो दुख से हमको भर गया है 
यहाँ गमगीन हैं आँखें अनेकों देखिए तो
कि बस्ती में भला इंसान कोई चल बसा है

3 thoughts on “पं. बेनीमाधव तिवारी: जैसा मैंने देखा

  1. सांसारिक होते हुए भी पं बेनीमाधव तिवारी जी ने लोक कल्याण के लिए एक यति सा जीवन जीया। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि एवं नमन। ईश्वर से प्रार्थना है कि परिजनों को दारुण दु:ख सहने की शक्ति प्रदान करे।

  2. परम आदरणीय सर गिरीश पंकज जी,
    बहुत सुन्दर तरह से प्रकाशित किया आपने ”श्रद्धेय स्वर्गीय प. बेनीमाधव” जी के जीवन को। जानकर प्रसन्नता हुई, कि आज भी इस तरह के इंसान हैं, जिनके वज़ह से जीवन अभी भी संभव है।
    मृत्यु वाकई में एक अटल सत्य है।
    मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ
    कि इनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।
    ॐ शांति ॐ

  3. पं. बेनीमाधव तिवारी जी के व्यक्तित्व और उनके कार्यों से परिचित कराने के लिये आभार, गिरीश पंकज जी। बहुत सी सुन्दर आलेख। स्व. तिवारी जी को मेरा प्रणाम और आपको साधुवाद।

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