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    Homeधर्म-अध्यात्ममहत्वपूर्ण पुस्तक ‘सत्यार्थप्रकाश का प्रभाव’ का प्रकाशन

    महत्वपूर्ण पुस्तक ‘सत्यार्थप्रकाश का प्रभाव’ का प्रकाशन

    -मनमोहन कुमार आर्य
    स्वामी वेदानन्द तीर्थ आर्यसमाज के एक शीर्ष व प्रमुख विद्वान थे। आपने अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं जिनमें एक लघु आकार का ग्रन्थ है ‘सत्यार्थप्रकाश का प्रभाव’। यह पुस्तक अनेक वर्षों से अनुपलब्ध था। हमने इस ग्रन्थ का नाम तो सुना था, परन्तु यह हमें अब उपलब्ध हुआ है। पुस्तक यथा नाम तथा गुण हैं। पुस्तक में सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का संक्षिप्त परिचय देकर उसके आर्यावर्तीय मतों सहित ईसाई एवं इस्लाम मत पर प्रभाव का वर्णन किया गया है। सभी आर्य बन्धुओं के लिए यह एक उपयोगी ग्रन्थ है। इसे पढ़कर हम ऋषि दयानन्द के अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के अन्य मतों पर प्रभाव से कुछ सीमा तक परिचित हो सकते हैं। यह विषय ऐसा है जिस पर आर्यसमाज के वर्तमान प्रौढ़ विद्वानों को भी लिखना चाहिये जिससे आने वाली पीढ़ियां लाभान्वित हो सकें। पुस्तक के लेखक उच्च कोटि के विद्वान एवं महान् ऋषिभक्त स्वामी वेदानन्द (दयानन्द) तीर्थ विरजानन्द वैदिक संस्थान, गाजियाबाद के भी सम्पादक रहे हैं। पुस्तक का प्रकाशन हिण्डौन-सिटी स्थित ‘हितकारी प्रकाशन समिति’ ने कुछ महीने पहिले सन् 2021 में किया है। प्रकाशक का नाम व पता है हितकारी प्रकाशन समिति, ‘अभ्युदय’ भवन, अग्रसेन कन्या महाविद्यालय मार्ग, स्टेशन रोड, हिण्डौन सिटी-322230 तथा पुस्तक का मूल्य 80 रुपये है। प्रकाशक श्री प्रभाकरदेव आर्य जी से सम्पर्क करने के लिए मोबाइल नम्बर 7014248035 एवं 9414034072 है। पुस्तक में 128 पृष्ठ है। पुस्तक में अच्छे कागज का प्रयोग है तथा मुद्रण भी भव्य, सुन्दर व सुरुचिपूर्ण है।

    पुस्तक का सम्पादकीय डा. विवेक आर्य एवं श्री संजय कुमार जी ने लिखा है। सम्पादकीय में बताया गया है कि ‘सत्यार्थप्रकाश’ युग प्रवर्तक स्वामी दयानन्द की महान् कृति है जिसे आधुनिक भारत में सबसे प्रचलित पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है। सत्यार्थप्रकाश का नामकरण सत्य प्रकाश न करके ऋषिवर ने सत्यार्थ प्रकाश क्यों किया? इसका उत्तर विद्वत्तजनों ने करते हुए लिखा है कि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने सत्य का प्रकाश वेदों के माध्यम से कर दिया था। इसलिए स्वामी दयानन्द जी ने वेदों की महान् परम्परा को आगे बढ़ाते हुए वेद विदित सत्य के अर्थ को पुनः अपनी इस महान् कृति के माध्यम से प्रकाशित किया। स्वामी जी ने जिस काल में इस कालजयी ग्रन्थ की रचना की थी, उस काल में छपी हुई पुस्तकें आदि बड़ी कठिनाई से उपलब्ध होती थीं। न तो बड़े-बड़े सुसज्जित पुस्तकालय सुलभ थे और न ही आने-जाने के संसाधन उपलब्ध थे। वीतराग संन्यासी ने अपने पुरुषार्थ से इस ग्रन्थ को रचने के लिए कितना महान् तप, कितना पुरुषार्थ किया होगा? यह सचमुच में केवल कोई ईश्वरीय कृपा प्राप्त महामानव ही कर सकता है। स्वामी दयानन्द ने यह ग्रन्थ बोल-बोल कर लगभग तीन महीने में लिखवाया। किसी पुस्तकालय की सुविधा के बिना केवल स्मृति के आधार पर बोल-बोल कर लिखाई पुस्तक में वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, उपनिषदों, स्मृतियों, विभिन्न दर्शन ग्रन्थों, सूत्रों, महाभारत आदि 377 ग्रन्थों के सन्दर्भ और 1542 वेदमन्त्रों/श्लोकों के उद्धरण देख कर स्वामी (दयानन्द) जी की असाधारण स्मरणशक्ति पर आश्चर्य होता है। सम्पादकीय में पाठक सम्पादकद्वय के अनेक कथनों को पढ़कर लाभान्वित होंगे। 
    
    सम्पादकीय के बाद पुस्तक के प्रकाशन में आर्थिक सहयोग करने वाले ऋषिभक्त विद्वान डा. मोक्षराज जी ने ‘दो शब्द’ शीर्षक से अपने विचार प्रस्तुत किये हैं। डा. मोक्षराज जी ने अपने आलेख में कहा है कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान तथा धार्मिक एवं सामाजिक ढांचे को गिराने की नीयत से षड्यन्त्र कर रही शक्तियों के अरमानों पर (सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के प्रकाशन ने) पानी फेर दिया। महर्षि दयानन्द सरसवती इस महान् शस्त्र को अपने सत्पात्रों को सौंपने लगे और कुछ काल में ही आर्यसमाजियों की एक ऐसी सेना तैयार हुई, जिसकी कदमताल से उठी आंधी से अरब, यूरोप और अमेरिका में रखी साम्प्रदायिक पुस्तकों पर गर्द की परतें जमने लगी। करोड़ों नर-नारियों के लिए दुर्लभ वेदज्ञान पाना सरल हो गया। ऋषियों की भूमि पर पड़े गोरों के कदम कांपने लगे, मुगलों की आंखें शर्म से झुकने लगीं और पौराणिकों की मिथ्या बातों की पोल खुलने लगी। सत्यार्थ के प्रकाश में जिन्हें जागना था, वे उठ खड़े हुए और जो स्वार्थ, हठ, दुराग्रह एवं भोग की नींद से उठना नहीं चाहते थे, वे इसका एक पृष्ठ भी खोलने से धबराने लगे। इस प्रकाशपुंज ने उन सबको प्रदीप्त किया जो सच्चा मानव बनना चाहते थे। पूज्य स्वामी वेदानन्द तीर्थ जी के पुरुषार्थ के परिणामस्वरूप प्राप्त इस पुस्तकरत्न ‘सत्यार्थप्रकाश का प्रभाव’ में हम सत्यार्थप्रकाश के महत्व को सहज ही समझ सकेंगे। 
    
    पुस्तक में इसके प्रथम संस्करण की स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती जी द्वारा लिखी प्रस्तावना भी प्रस्तुत की गई है। इस पुस्तक के महत्व को रेखांकित करते हुए स्वामी विज्ञानानन्द जी ने कहा है कि “सत्यार्थप्रकाश” के लिखे जाने के ठीक अस्सी वर्ष पश्चात् महर्षि के अनन्य भक्त महाविद्वान् पूज्यपाद श्री स्वामी वेदानन्द तीर्थ जी ने अपने देहावसान से कुछ दिन ही पूर्व यह ‘सत्यार्थप्रकश का प्रभाव’ नामक प्रबन्ध लिखा था। ‘सत्यार्थप्रकाश का प्रभाव’ एक प्रतिवेदन (लेखा-जोखा) है, इस बात का कि गत अस्सी वर्ष में स्वामिदयानन्दानुमोदित ब्रह्मा से लेकर जैमिनिमुनिपर्यन्त (जिन्हें प्रबन्ध लेखक ने ‘विरजानन्दमुनिपर्यन्त’ लिखा है), महाशय महर्षियों के मन्तव्य कहां तक सर्वत्र भूगोल में प्रवृत्त हो पाये हैं। पाठक पुस्तक पढ़कर स्वयं जान लेंगे कि सत्य किस प्रकार अपने विरोधियों को मूक बना देता है, किस भांति प्रबल प्रचार होते हुए भी निराधार ईसाई मन्तव्य ऋषि की समीक्षा के कारण अपने आस्थावान अनुयायियों के हृदय में भी ‘आधारशून्य’ से प्रतीत होने लगते हैं, क्यों और कैसे इस्लामी सिद्धान्त ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ के आलोक में नये-नये प्रकार से निर्वचित (निरुक्त) होकर मूलप्रवर्तकानुमोदित अपने परम्परागत रूप को छोड़ कर विज्ञानानुकूल रूप धारण कर रहे हैं। आर्यसमाज उन सब विधर्मी लेखकों का आभारी है जिन्होंने ‘सत्यार्थप्रकाश’ में की गई समीक्षा की सुखद छाया में उत्साहपूर्वक अनृत (असत्य) को त्याग कर सत्य को ढूंढ़ने का प्रयत्न किया है और इस प्रकार भिन्न-भिन्न मतमतान्तरों में बंटी हुई मानवजाति के विभिन्न समुदायो ंको एक दूसरे के समीप लाने का प्रयास किया है। 
    
    प्रस्तावना के बाद पुस्तक में अध्यायों की विषय सूची दी गई है। हम यहां मुख्य अध्यायों का उल्लेख कर रहे हैं। ये अध्याय क्रमशः हैं:- 1- सत्यार्थप्रकाश के प्रथम 10 सम्मुलासों का विषय, 2- पौराणिकों का विरोध शान्त, 3- जैनियों की प्रतिक्रिया, 4- ईसाई मन्तव्यों की आधार-शून्यता तथा 5- इस्लामी सिद्धान्तों में परिवर्तन। 
    
    प्रथम अध्याय ‘अथ सत्यार्थप्रकाश-समीक्षा-प्रभावः’ में प्रथम समुल्लास के विषयों पर प्रकाश डालते हुए पुस्तक के विद्वान लेखक ने बताया है कि ‘सत्यार्थप्रकाश एक ऐसा ग्रन्थ है जिनमें अनेक विषयों का समावेश है। प्रथम समुल्लास में साधारणतया परमेश्वर के सौ नामों का वर्णन है, किन्तु आनुषंगिक (सहायक) विषय देखिये। 1. अनेक अर्थों वाले शब्द के किस अर्थ को कहां कैसे लिया जाता है, इसका भी विवेचन है। इसको समझाने के लिये व्याख्याता को मीमांसा शास्त्र का पण्डित होना चाहिये। उसे ज्ञात होना चाहिये कि अर्थ निश्चय करने में प्रकरण का एक विशिष्ट स्थान है। 2. शब्दों के अर्थ अभिधा, लक्षणा, व्यंजना एवं तात्पर्य की समझ रखकर किये जाते हैं। 3. सभी संज्ञावाचक शब्द यौगिक रीति से परमेश्वर के भी नाम हैं। 4. वेद के शब्दरूढ न होकर यौगिक अथवा योग-रूढी वा यौगिकरूढी होते हैं। 5. परमेश्वर के गुण-कर्म अनन्त हैं, अतः उसके नाम भी अनन्त हैं। 6. मंगलाचरण, जो मध्यकाल के ग्रन्थ लेखक अपने ग्रन्थों में व्यवहृत (उपयोग) करते रहें हैं, क्या है, उसे करना वा न करना। 7.  ‘हरिओम्’ शब्द समुदाय को तान्त्रिक होने के कारण निषिद्ध ठहराना। इसी प्रकार से सत्यार्थप्रकाश के अवशिष्ट समुल्लासों पर भी इस पुस्तक में महत्वपूर्ण जानकारी है। स्वामी वेदानन्द तीर्थ आर्यजगत के शीर्ष विद्वान थे। उन्होंने जो भी लिखा है, उनका एक एक शब्द महत्वपूर्ण है, जिसे सभी आर्यों को पढ़ना चाहिये। पुस्तक के अन्त में उन ग्रन्थों के नाम दिये गये हैं जिनके प्रमाण पुस्तक में दिये गये हैं। ऐसे कुल 35 ग्रन्थों के नाम पुस्तक में हैं। 
    
    ‘सत्यार्थप्रकाश का प्रभाव’ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तक है। सभी ऋषिभक्तों को इसका अध्ययन करना चाहिये और इस पुस्तक को अपनी भावी पीढ़ियों को देकर जाना चाहिये जिससे वह भी सत्यार्थप्रकाश के महत्व व इसके अन्य मतों पर प्रभाव को जान सकें। पुस्तक के प्रकाशन के लिए ऋषिभक्त श्री प्रभाकरदेव आर्य जी आर्यसमाज की ओर से धन्यवाद एवं बधाई के पात्र हैं। हम आशा करते हैं कि पुस्तक का अधिक से अधिक प्रचार होगा तभी पुस्तक के लेखक एवं प्रकाशक का पुरुषार्थ सफल होना सम्भव होगा। 
    मनमोहन आर्य
    मनमोहन आर्यhttps://www.pravakta.com/author/manmohanarya
    स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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