पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-9

पर संसार के लोगों में और विद्वान लोगों में एक बात सांझा होती है कि संसार के साधारण लोग भी जिस सुख-समृद्घि की प्राप्ति करना चाहते हैं उनके लिए वह भी यज्ञयागादि और ज्ञान चर्चाएं करते हैं और विद्वान लोग भी अपने स्तर पर ऐसी ही कार्य प्रणाली को अपनाते हैं। इन सबका उद्देश्य होता है-अपने-अपने उद्देश्यों की प्राप्ति, अपनी-अपनी आकांक्षाओं की प्राप्ति।

छोड़ देवें छल-कपट को मानसिक बल दीजिए

गतांक से आगे….
संसार के साधारण लोगों के विषय में यह सत्य है कि उन्हें लोकैष्णा, वित्तैष्णा और पुत्रैष्णा घेरे रखती हैं। इन से वह बाहर नही जा सकता। विद्वान लोग इन ऐषणाओं के घेरे को तोडऩे के लिए तैयारी करते हैं। इसलिए उन्हें ये ऐषणाएं अपने मार्ग में बाधा दिखाई देती हैं। क्योंकि उन्हें दूर जाना होता है-प्यारे प्रभु के पास। उनकी जीवन साधना का लक्ष्य बड़ा होता है, इसलिए उन्हें संसार की ऐषणाएं छोटी-छोटी कंटीली झाडिय़ां दिखाई देती हैं, जिन्हें पीछे छोडक़र आगे बढऩा उनका उद्देश्य होता है।

पर संसार के लोगों में और विद्वान लोगों में एक बात सांझा होती है कि संसार के साधारण लोग भी जिस सुख-समृद्घि की प्राप्ति करना चाहते हैं उनके लिए वह भी यज्ञयागादि और ज्ञान चर्चाएं करते हैं और विद्वान लोग भी अपने स्तर पर ऐसी ही कार्य प्रणाली को अपनाते हैं। इन सबका उद्देश्य होता है-अपने-अपने उद्देश्यों की प्राप्ति, अपनी-अपनी आकांक्षाओं की प्राप्ति। जिनकी पूर्ति के लिए प्रेरणा देने वाला मन है। यह मन ही हमें श्रेय मार्ग का ‘पथिक’ बनाता है और यही हमें प्रेयमार्ग का पथिक बनाता है। हम जो कुछ हैं या जो कुछ बनना चाहते हैं-वह हमारे मन पर ही निर्भर करता है। इसलिए मन को यजुर्वेद (11-34) में दिव्य सुखवर्षक कहा गया है। ऐतरेय ब्राह्मण में इस मन को परमात्मा का अपूर्व शरीर कहा गया है। कहने का अभिप्राय है कि मन अपूर्व है-अद्वितीय है। मन एक अपूर्व ज्योति है, परम ज्योति है, जिसके आलोक में हम अपने जीवन का निर्माण करते हैं। इस ज्योति को समझ लेना और इसकी ऊर्जा का सकारात्मकता के साथ प्रयोग करना ही मानसिक बल प्राप्ति की साधना है। जिसके मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता अनुभव होने लगता है, और व्यक्ति मानसिक बल का पुजारी बनने लगता है। उसकी झोली में मानसिक बल की पूंजी आने लगती है।
तीसरा मंत्र है :-
यत प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च
यज्ज्योतिरंतरमृतं प्रजासु।
यस्मान्न ऋते किं चन कर्म क्रियते
तन्मे मन: शिवसंकल्प मस्तु।।

(यजु. 34-3)

अर्थ-जो मन ज्ञान, स्मृति और धारणा शक्ति का साधन है, जो प्राणिमात्र के भीतर अमर ज्योति है, जिसके बिना कोई काम नही किया जा सकता है, वह मेरा मन शिवसंकल्प-शुभ संकल्प अथवा शुभ विचारों वाला हो।

यहां पर वेद का ऋषि मन को ‘प्रज्ञान’ कहकर सुशोभित कर रहा है। ‘प्रज्ञान’ का अभिप्राय है कि मन ज्ञानरूप है। दूसरी विशेषता मंत्र का ऋषि बताता है कि यह मन ज्ञात वस्तुओं की स्मृति रखता है। मन एक संगणक (कंप्यूटर) है, एक विशाल पुस्तकालय है, जिसमें कितने ही विषय और ज्ञान-विज्ञान की बातें सुरक्षित रखी रहती हैं। मनुष्य किसी व्यक्ति को 20 वर्ष पश्चात मिलता है तो भी उसे पहचान लेता है और न केवल पहचान लेता है अपितु उसके साथ हुए वार्तालाप और वार्तालाप के समय का मौसम वह कक्ष, या जंगल का मनोरम स्थान आदि भी उसे स्मरण आने लगते हैं जहां उन दोनों की भेंट हुई थी। इसी मन के कोषागार में पूर्वानुभूत बहुत से तथ्य संग्रहीत रहते हैं। जब आप चाहें उन्हें पढ़ सकते हैं, खोल सकते हैं और देख सकते हैं। कहा जाता है कि मन में अपने मन में तो कोई मूर्ख नही होता, यह सच है। क्योंकि हर व्यक्ति अपना काम चलाऊ ज्ञान अपने मन में संग्रहीत रखता है, इसलिए अपने मन के आलोक से अर्थात अंत:प्रेरणा से वह कार्य करता रहता है। सांसारिक पढ़ाई-लिखाई से हम किसी व्यक्ति के ज्ञान के स्तर का अनुमान लगाते हैं, पर यह नही देखते कि उसने अपने भीतर कितना ज्ञान संचित किया हुआ है। कितने ही लोगों ने अशिक्षित होकर राज्य संभाले हैं, तो कितने ही लोग समाज में अशिक्षित होकर भी बड़ों को रास्ता दिखाई हैं। ऐसे लोगों का मानसिक बल ही होता है, जो दूसरे लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन जाता है।

ऐसे मन के विषय में ही वेद का ऋषि कह रहा है कि उसके बिना कोई कार्य नही किया जा सकता। किसी भी कार्य के साथ जब तक मन का योग नही हो जाता है, तब तक वह सफल नही होता। आपके मन में कोई गंभीर चिंतन चल रहा हो, पर आंखें खुली हों, तो भी आंखें देखने का काम नही कर सकतीं, क्योंकि उनके साथ मन की शक्ति का योग नही था। ऐसा देखा भी गया है कि कोई व्यक्ति आपके पास से निकल जाता है, जब उसी के विषय में आपसे कोई अन्य व्यक्ति पूछता है कि क्या आपने अमुक व्यक्ति को देखा था? आप तब कहते हैं कि नही, उसे मैंने नही देखा है। ऐसा ही कानों के विषय में या अन्य ज्ञानेन्द्रियों के विषय में समझना चाहिए। बहुत अच्छा प्रवचन चल रहा है, परंतु यदि हमारा मन उसके साथ योग नही कर रहा है तो सारा प्रवचन हमारे ऊपर से निकल जाता है। अत: कार्य के साथ मनोयोग अत्यावश्यक है। मनोयोग से किया गया कार्य, संवाद, चर्चा, अध्ययन आदि मन के कोषागार में सुरक्षित हो जाते हैं, जिन्हें हम भुला नही पाते हैं। ऐसे मानसिक बल की ही इच्छा हमें होनी चाहिए। क्रमश:
-राकेश कुमार आर्य

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