पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-12

राकेश कुमार आर्य
छोड़ देवें छल-कपट को मानसिक बल दीजिए

गतांक से आगे….

यहीं जाग्रत साधक को अत्यानुभूति होती है, स्वानुभूति होती है, इसे ही आत्मदर्शन कहा जाता है। इस अत्यानुभूति के क्षणों में मन बहुत तुच्छ सा दीखने लगता है। वह जड़ जगत में रमाने वाला ही जान पड़ता है। इसलिए मानसिक बल आत्मिक बल की अपेक्षा छोटा है। मानसिक बल अध्यात्म और ब्रह्मविद्या के क्षेत्र में जाते ही आभाहीन हो जाता है। वहां आत्मबल ही साथ देता है। परंतु इसका अभिप्राय यह नही कि मानसिक बल का कोई मूल्य ही नही है। यदि मानसिक बल नही होगा तो व्यक्ति सांसारिक मायाजाल में ही उलझ कर रह जाएगा। मानसिक बल का ही कार्य है कि व्यक्ति इस ज्ञान-विज्ञान की सार्थकता और निरर्थकता का बोध कर पाता है और अपनी विवेकशीलता का विस्तार कर पाता है।

‘‘सांख्यकार के मत में मन चेतन नही है उसकी दृष्टि में आत्मा चेतन है। मन प्रकृति के विकास का परिणाम है। मन करण है, एक साधन है, जिस का उपयोग आत्मा करता है। ‘करण’ उपकरण या साधन होने के कारण मन भौतिक है, इसलिए जड़ है। उपनिषद में कहा गया है-‘अन्नमय ही सोम्य मन:’-हे सोम्य! मन अन्न से बना है, अर्थात मन भौतिक है। इसके उपरांत भी यह मन ही है जो ‘हिरण्यगर्भ: समवत्र्तताग्रे’ की प्रकृति की उस साम्यावस्था से लेकर विषमावस्था तक का हमारा यात्रा मार्ग निश्चित करता है या उससे परिचित कराता है। जब कुछ भी नही था तब प्रकृति अपनी साम्यावस्था में थी। उसके विषमावस्था में आते ही इस सृष्टि की रचना आरंभ हो गयी। यह सब कैसे हुआ? इसके पीछे कितना बड़ा रहस्य था और कैसे यह चल रहा है, इसके पीछे कौन सा विज्ञान है? कब तक यह चलेगा-इसके पीछे कौन सा लय है, ये सारी बातें हमारे अंत:करण में हैं अर्थात जब हम मन के ज्ञान क्षेत्र पर चिंतन करते हैं तो इस भजन में ‘मानसिक बल दीजिए’ के शब्दों के यथार्थ का बोध हमें हो जाता है।

वेद के रहस्यों को वेद की भाषा से ही जाना जा सकता है। अन्य भाषाओं के गद्य में या पद्य में जाते ही भाषा का अध:पतन हो जाता है। भाषा की उतनी पवित्रता नही रह पाती, जितनी कि अपेक्षित है। अत: जो लोग मन के विस्तृत लोक की उपेक्षा केवल इसलिए कर देते हैं कि वह तो जड़ है वह ज्योतियों का ज्योति नही है, उनके लिए आवश्यक है कि मन की स्थिति के विषय में वे प्रथमत:वेद उपनिषद ब्राह्मण ग्रंथों का अध्ययन करें, और इसके विशाल क्षेत्र का ज्ञान करें। जब यह कार्य संपन्न हो जाएगा तो पता चलेगा कि अब हम आत्मा के आलोक में और लोक में पहुंचने लगे हैं। वह अवस्था आनंद की अवस्था होगी। वहां कोई द्वंद्व नही होगा। मन के क्षेत्र में जितने द्वंद्व और अंतद्र्वंद्व थे वे सभी धीरे-धीरे पीछे छूटते गये और हमारी यात्रा सहज, सरल और सुगम होती गयी। यात्रा की इसी अवस्था की प्राप्ति के लिए ही ‘मानसिक बल दीजिए’ की प्रार्थना इस पंक्ति में की गयी है।
कब और कहां तक कहा जाए- छोड़ देवें छल कपट को
भजन की इस पंक्ति में हम कह रहे हैं कि ‘छोड़ देवें छल कपट को….।’ इस पर कुछ विद्वानों का तर्क है कि जीवन भर इसी गीत को गाते रहने का कोई औचित्य नही कि छोड़ देवें छल कपट को…।’ यदि 8 वर्ष से लेकर 80 वर्ष तक की अवस्था में निरंतर यही बात दोहराई जा रही है तो समझना चाहिए कि छल कपट छोड़े नही गये हैं, और केवल तोते की भांति यह भजन रट लिया गया है।

क्रमश:

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