उन चिराग़ों को बुझा दो तो उजाला होगा

निर्मल रानी
उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर में पिछले दिनों गौमांस की अफ़वाह को लेकर फैली हिंसा में एक जांबाज़ व कर्मठ पुलिस अधिकारी सुबोध कुमार सिंह की उग्र भीड़ ने हत्या कर दी। पुलिस व उग्र भीड़ के मध्य हुए संघर्ष में भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता की भी हत्या हो गई। इस संबंध में सभी राजनैतिक दल अपने-अपने  राजैतिक फ़ायदे व नुकसान के मद्देनज़र बयानबाजि़यां करने में व्यस्त हैं। परंतु इस पूरे घटनाक्रम के आस-पास की दो महत्वपूर्ण घटनाएं ऐसी ज़रूर हैं जिनका जि़क्र करना यहां बेहद ज़रूरी है। पहली घटना बुलंदशहर जि़ले में ही चिंगरावटी पुलिस चौकी जहां हिंसक प्रदर्शन हुए व पुलिस चौकी को आग लगा दी गई एवं संघर्ष के दौरान चौकी प्रभारी निरीक्षक सुबोध कुमार सिंह को गोली मारी गई यहां तक कि उनकी लाईसेंसी पिस्टल व उनके तीन मोबाईल फ़ोन छीन कर गुंडे भाग खड़े हुए। उसी स्थान से लगभग 50 किलोमीटर दूर 1 से 3 दिसंबर तक मुस्लिम समुदाय द्वारा आयोजित किया गया तीन दिवसीय इजि़्तमा अथवा समागम जिसमें कि लाखों मुसलमान इकठ्ठा हुए थे,आख़िर उसी क्षेत्र में कथित गौरक्षकों द्वारा हिंसक प्रदर्शन क्यों किया गया? दूसरी बात यह कि अभी बुलंदशहर की घटना से ठीक पहले दिल्ली में एक व दो दिंसबर को देश के लगभग दो सौ से अधिक किसान संगठनों द्वारा बुलाए गए किसान प्रदर्शन में हज़ारों किसानों ने हिस्सा लिया। यहां तक कि देश के 21 राजनैतिक दलों का भी उन्हें समर्थन हासिल था। परंतु किसी स्वयंभू देशभक्त मीडिया ने न तो उन किसानों की मांगों की ओर तवज्जो दी न ही किसानों की समस्याएं किसी स्वयंभू राष्ट्रवादी संगठन अथवा नेता के गले उतरी।
गोया बुलंदशहर की घटना के आस-पास की इन दो घटनाओं से साफ़ ज़ाहिर है कि इस समय सत्ता के संरक्षण में पल रहे टीवी चैनल्स अथवा असामाजिक तत्वों के लिए किसानों की समस्याओं के पक्ष में खड़े होना,गौपालक किसानों के भविष्य की चिंता करना,पशुधन के वास्तविक वारिसों की बदहाली पर आंसू बहाना,देश में प्रत्येक वर्ष हो रही किसानों की आत्महत्याओं को रोकने का प्रयास करना अथवा इनपर आंसू बहाना इतना ज़रूरी नहीं है जितना कि हिंदू-मुस्लिम समाज के मध्य दरार पैदा करना, धर्म व संप्रदाय के नाम पर देश को संघर्ष की आग में झोंकना तथा स्वयं को झूठा गौरक्षक बताकर इसी बहाने अपनी रोज़ी-रोटी चलाने का प्रयास करना। बड़े आश्चर्य की बात है कि बुलंदशहर में जिस स्थान पर मुस्लिम समाज का विशाल समागम शांतिपूर्ण तरीके से हो रहा था वहां उस स्थल के चारों ओर के हिंदू बाहूल्य गांवों के लोग उस समागम में तन-मन-धन से अपनी सेवाएं दे रहे थे। बताया जाता है कि इस समागम में मुस्लिम उलेमाओं द्वारा देश में अमन-शांति,समाज में प्रेम,सद्भाव व भाईचाराा बनाए रखने की दुआएं मांगी गईं तथा आतंकवाद के विरुद्ध भी स्वर बुलंद किए गए। गोया इस समागम में ऐसा कुछ भी नहीं था जो राष्ट्रविरोधी हो या जिससे किसी दूसरे धर्म व समुदाय की भावनाएं आहत हों। इसके बावजूद इस समागम स्थल के मात्र 50 किलोमीटर दूर गौमांस की अफ़वाह को लेकर इतना बड़ा हिंसक प्रदर्शन होना तथा इसमें एक इंस्पेक्टर सहित दो लोगों को हत्या हो जाना अपने-आप में ढेर सारे सवाल खड़े करता है?
अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण विषय यह भी है कि जहां इस समय देश के कई प्रमुख टीवी चैनल सत्ता का गुणगान करने तथा सत्ताधारियों के लाभ-हानि के मद्देनज़र समाचार प्रसारित करने व समाज को तोड़ने वाली बहसें प्रसारित करने में व्यस्त हैं वहीं इन्हीं टी वी चैनल्स में प्रतिस्पर्धा करते हुए एक नाममात्र चैनल ऐसा भी है जिसका स्वामी स्वयं खांटी हिंदुत्व की पताका लेकर घूमता रहता है तथा इसका काम हिंदू समाज के लोगों को मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध उकसाना व भड़काना रहता है। इस टीवी चैनल ने बुलंदशहर के हिंसक प्रदर्शन के पीछे घटनास्थल से 40-50 किलोमीटर की दूरी पर हो रहे मुस्लिम समागम का हाथ बताया। ज़रा सोचिए यदि लाखों निहत्थे मुसलमानों के समागम के साथ कोई धार्मिक संघर्ष की स्थिति इस अफवाह के चलते बन जाती तो कितनी भयावह घटना घट सकती थी। परंतु टीवी चैनल द्वारा फैलाई जा रही इस अफ़वाह के बाद बुलंदशहर पुलिस द्वारा तत्काल एक ट्वीट के द्वारा कहा गया कि-‘कृपया भ्रामक ख़बर न फैलाएं। इस घटना का इज्तिमा कार्यक्रम से कोई संबंध नहीं है। इज्तिमा सकुशल संपन्न समाप्त हुआ है। उपरोक्त घटना इज्तिमा स्थल से 45-50 किलोमीटर थाना स्याना क्षेत्र में घटित हुई है जिसमें कुछ उपद्रवियों द्वारा घटना कारित की गई है। इस संबंध में वैधानिक कार्रवाई की जा रही है’। पुलिस द्वारा इस प्रकार की अफ़वाह पर तत्काल संज्ञान लेने के बाद इस फ़र्ज़ी टीवी चैनल को अपने नापाक मक़सद में कोई सफ़लता नहीं मिल सकी।
एक ओर तो देश का अन्नदाता व गौपालक किसान देश में आत्महत्याएं करने पर मजबूर है जिसकी न तो सत्ताधीशों द्वारा सुनवाई की जा रही है न ही स्वयंभू चौथे स्तंभ के मु य धारा के टीवी चैनल्स अथवा समाचार पत्र उनकी समस्याओं व मांगों को यथोचित रूप से प्रसारित कर रहे हैं। तो दूसरी ओर अनेक ऐसी बातें जिनका न तो देश के विकास से कोई लेना-देना है न ही समाज कल्याण से जुड़ी हैं। बजाए इसके देश को तोड़ने व धार्मिक दुर्भावनाएं फैलाने वाली हैं, ऐसी बातों का पूरे ज़ोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है। जबकि यदि गौसंरक्षण के विषय को ही ले लें तो इसकी भी वास्तविक तस्वीर बेहद भयावह है। गौरक्षा का ढोंग करने वाली तथा गाय के नाम पर हिंदू समाज को उकसाने वाली मोदी सरकार के राज में बी$फ निर्यात में बेतहाशा वृद्धि हुई है। देश में बीफ़ निर्यातक कंपनियों के अधिकतर स्वामी हिंदू समुदाय से ही संबंधित हैं। आज पूरे देश में गौपालक बछड़े का जन्म होते ही उसे धक्का देकर सड़कों पर भगा देते हैं। पूरे देश में गली-कूचे, राज्य तथा राष्ट्रीय राजमार्ग पर सांडों व बछड़ों के झुंड दिखाई देते हैं। आए दिन दुर्घटनाओं की सं या इन्हीं आवारा पशुओं के कारण बढ़ी जा रही है। कथित गौरक्षकों के भय से कोई किसान अपनी गाय या बछड़ा किन्हीं भी परिस्थितियों में क्रय-विक्रय नहीं कर पा रहा है न ही इसकी आवाजाही हो पा रही है। जहां भी जाईए वहीं कूड़े-करकट के ढेर में गौवंश गंदगी में मुंह मारता यहां तक प्लास्टिक व पॉलीथिन खाता दिखाई दे जाएगा। देश में जगह-जगह घायल व बीमार गौवंश घूमता दिखाई देता है। परंतु इन सभी सच्चाईयों से मुंह फेरकर ले-देकर गाय के विषय को केवल मुसलमानों से ही जोड़कर देखने की कोशिश की जा रही है। और धर्मांधता में डूबे बेरोज़गार युवा अपनी रोज़ी-रोटी नौकरी तथा व्यवसाय जैसी जीवन की ज़रूरतों के विषय में सोचने के बजाए भावनाओं में बहकर चंद मुठ्ठीभर नेताओं की सेाची-समझी साजि़श का शिकार हो रहे हैं।
इस बीच मृतक शहीद इंस्पेक्टर सुबोध सिंह के बेटे अभिषेक ने भावुक होकर एक चुभता हुआ सवाल समाज से पूछा है कि-आज मेरे पिता ने हिंदू-मुसलमान विवाद में जान गंवा दी। कल किसके पिता जान गंवाने को मजबूर होंगे? राहत इंदौरी भी अपनी एक गज़ल के एक शेर में कह चुके हैं कि-‘लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है? निश्चित रूप से अफवाह तथा विद्वेष फैलाने की साजि़शों को बेनक़ाब करने व इन्हें नाकाम करने की ज़रूरत है। वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए ही भावनात्मक विषयों का सहारा लिया जाता है। इसी लिए शायर ने कहा कि-‘जिन चिरागों से तअस्सुअब का धुंआ उठता हो, उन चिरागों को बुझा दो तो उजाला होगा। 

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