बहन बेटियों की सुरक्षा पर सवाल

-आदर्श तिवारी-
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उत्तर प्रदेश के बदायूं में जो रोंगटें खड़े करने वाली जो घटना हुई हैं, उससे लड़कियों की असुरक्षा का हाल बताती हैं, तो यह प्रदेश की करीब दो साल पुरानी समाजवादी पार्टी कि अखिलेश सरकार के कामकाज पर भी गंभीर टिप्पणी है. इससे पहले भी यह सरकार कई मुद्दों पर असफल रहीं हैं यह कहने कि बात नहीं हैं. इससे पहले मुजफ्फरनगर की साम्प्रदायिक हिंसा पर भी समय से दंगे पर अंकुश नहीं लगा पाई और विफल रही थी. बदायूं के गावं कटरा सआदतगंज की दो नाबालिक लड़कियों के साथ को दिल को दहलाने वाली घटना हुई हैं, इससे प्रदेश की कानून व्यवस्था का परिचय कराती हैं और सबसे बड़ी बात जब लड़कियों के पिता गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने गए तो परिवारजनों के प्रति पुलिस वालों ने जो रवैया अपनाया था, उसी से साफ हो जाता हैं कि प्रदेश में कुछ बदला नहीं हैं. इस दर्दनाक घटना पर देश–दुनिया कि निगाहे जाने और गिरफ्तारियां होने के बाद भी कुछ दबंगो द्वारा पीड़ित परिवार को धमकाए जाने वाली बात सच हैं, तो कल्पना की जा सकती हैं कि राज्य में अपराधियों के हौसले कितने बुलंद हैं और उनमे कानून-व्यवस्था का डर कितना कम. बदायूं में ही नहीं इसके अलावा भी बलात्कार की कई घटनाएं सामने आई हैं. सच बात तो ये हैं कि जितने भी बलात्कार हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश पीड़िता समाज के निचले तबके से हैं, जिनकी सुरक्षा के प्रति सरकार को ज्यादा संवेदनशील होना ही चाहिए. पर सक्रियता दिखाना तो दूर, इस तरह की घटनाओं के बाद कुछ रूटीन कार्यवाही कर राज्य सरकार अपना कर्तव्य समाप्त मन लेती हैं. बदायूं की घटना की सीबीआई जांच के आदेश और पांच लाख की आर्थिक मदद भी सरकार ने तब दिया जब चारो तरफ से इस सरकार को घेरा गया. उसका यह रवैया हैरान करने वाला हैं कि अभी थोड़े दिनों पहले ही लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने विकास के मुद्दे पर भरोसा जताया. बदायूं की घटना पर समाज का उदासीन रुख भी चौकाने वाला आया हैं.

दिल्ली में ऐसी घटनाओं पर मोमबत्तियां जलाने वाले लोग कहां हैं? वह लोग ऐसी त्रासदियों पर उद्देलित क्यों नहीं हो रहे हैं? उत्तर प्रदेश या हमारे देश की महिलाओं के साथ जो अत्याचार हो रहा हैं हम चुप क्यों हैं? हम ऐसी घटनाओं पर हमारा देश आंदोलित क्यों नहीं होता? जबकि ग्रामीण इलाकों में इस तरह की लगातार घटती घटनाएँ ज्यादा चिंता जनक हैं, क्योंकि इनसे पता चलता हैं कि वहां अब भी शौचालय, पानी और बिजली जैसी बुनियादी सहूलियतें नहीं पहुचीं हैं, और यहां स्त्री सुरक्षा कि बात करना बेमानी भी होगी।

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