रवीन्द्रनाथ टैगोर: क्षेत्रीय से वैश्विक कवि

—विनय कुमार विनायक
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर बंगाल के,
बंगाली अस्मिता, भाषा के रवि थे!
गुलाम भारत के एक मात्र कवि थे,
राष्ट्रीय नहीं, अंतरराष्ट्रीय छवि के!

वे सात मई अठारह सौ इकसठ को,
शारदा व देवेन्द्रनाथ के, घर जन्मे!
वे कुलीन जमींदार से कलाकार बने,
बैरिस्टर बनने की तमन्ना छोड़ के!

वे रविन्द्र संगीत के जनक,गीतकार,
लेखक,नाटककार, कवि, कथाकार थे!
उनकी कविता का स्वर राष्ट्रीय नहीं,
रहस्य-रोमांच से पूर्ण गीतात्मक थी!

उनकी कविताई ‘एकला चालो रे’ से
निकलकर क्षेत्रीय से वैश्विक हुई थी!
टैगोर गोरे के गुण,प्रशस्तिगायक थे,
भारत से अधिक, विदेश में छाए थे!

उनका राष्ट्रगान, जन गण के नहीं,
अधिनायक जार्ज पंचम; सुर के थे!
उनके सुस्वर जन-मन के गायन से,
ब्रिटिश किंग जॉर्ज पंचम कायल थे!

बंगला भाषा, उन्हें समझ आई नहीं,
पर मधुर काकली से गोरे घायल थे!
बस क्या था राजा की जिज्ञासा बढ़ी,
अंग्रेजी में अनुवादित गीतांजलि पढ़ी!

विलियम रोथेनस्टाइन और यीट्स के,
सह पे गीतांजलि अंग्रेजी में छपी थी!
गीतांजलि नहीं गीता का उपदेश जैसी,
न गीत गोविंद,न हुंकार गोरे के प्रति!

ना कुलीनतंत्र के खिलाफ आवाज थी,
ना जाति बुराई के विरुद्ध रश्मिरथी!
जबकि बंगाल में, अंग्रेजों का डेरा था,
बाल-बहु विवाह, सतीप्रथा ने घेरा था!

बंगाल क्रांतिकारी बलिदान की भूमि,
खुदीराम, बटुकेश्वर की जन्म स्थली!
किन्तु गीतांजलि में, ऐसी कुछ नहीं,
स्वछंद गीतों का गुच्छा शांति-शांति!

गीतांजलि शांति के नोबेल पुरस्कार
के काबिल, एक संकलित रचना थी!
तेरह नवंबर उन्नीस सौ तेरह तिथि,
गीतांजलि को नोबेल से नवाजने की!

अंग्रेजी तेरह की तिथि मनहूस होती,
तेरह अप्रैल जलियांवाला घटना घटी!
तेरह अप्रैल उन्नीस सौ उन्नीस बनी,
अंग्रेजों के गुलाम,भारत की समाधि!

टैगोर ने आत्मग्लानि वश त्याग दी,
अंग्रेजों की नाइटहुड सर की उपाधि!
अंग्रेज बड़े ही शातिर क्रूर-जालिम थे,
बंगाली क्रांति दबाने की ये शांति थी!

टैगोर ब्रह्म समाजी थे, सनातन संग,
रोमन यूरोपीय संस्कृति मिजाजी थे!
टैगोर-गांधी के मतभेद, जगजाहिर थे,
गांधी राष्ट्रवादी,टैगोर मानवतावादी थे!

राष्ट्रवाद विरोधी,जमींदारी प्रथा के यती,
टैगोर बंगाली कुलीनता के,थे हिमायती!
उन्नीस सौ पांच के बंग भंग से उपजी,
आमार सोनार बांगला की अभिव्यक्ति!

बंगाल की दीन-हीन जनता की नहीं थी,
बांग्लादेश में जमींदारी चिंता से निकली!
बंगाल में छद्म भाषा अस्मिता के नाम,
कुलीनतंत्र हीं सदा सत्ता में रहा है हावी!

कभी खादी,कभी मार्क्सवादी, कभी धोती,
तांतसाड़ी में ये कुलीन बंगाल को बांटते!
बंगाली को कुछ और भद्र बंगाली कहके,
शेष भारत से काटकर ये कंगाल बनाते!

बंगाली की विडंबना है कि क्षेत्रीयता से,
वे उबर हिन्दी भाषा लिपि नहीं सीखते!
जबकि बांगला है अंगिका,मैथिली जैसी,
हिन्दी की बोली, जिसे बंगाली नकारते!

बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश की संस्कृति,
बंगाल का कुलीनतंत्र व वर्णाश्रम रीति,
मिथिला,काशी,प्रयाग ,कन्नौज के आर्य,
बंगाल के कैवर्त्त की मिली,जुली जाति!

बंगाल का अलग से कहां है उपलब्धि,
सिवा सेन राजवंश का संस्कृति करण,
अंग्रेजी दमन, कुलीनतंत्र का भ्रम जाल,
एकला चलो रे से बंगाल होगा बदहाल!

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