लेखक परिचय

सुप्रिया सिंह

सुप्रिया सिंह

स्वतंत लेखिका

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“कोस कोस पर पानी बदले , चार कोस पर वाणी” । इस पंक्ति का प्रयोग हम अक्सर भारत की विभन्नताओं को दर्शाने के लिए करते हैं और पूरी दुनिया को ये दिखाने का प्रयास करते हैं कि कैसे हम जाति , धर्म , स्थान विशेष से अलग होने के बावजूद एक ही है । पर कहते है न कि “ हाथी के दांत दिखाने के कुछ और , और खाने के कुछ और ही होते है । ” उसी तरह हम पूरी दुनिया को दिखाते कुछ और है और वास्तविक सच्चाई होती कुछ और है ।

हमारे समाज मे जाति एंव धर्म के नाम पर बहुत पहले से ही लड़ाईयाँ होती आ रही है और कभी – कभी उम्मीद भी कम भी कम ही लगती है कि ये लड़ाई कभी खत्म हो पाएंगी लेकिन इन सब के बीच भी जो एक बड़ा भेदभाव आज भी दिख रहा है वे है प्रादेशिक आधार पर किया जाने वाला भेदभाव । समाज का बड़ा और पढ़ा – लिखा तबका आज भी इस भेदभाव को करने मे पीछे नही है ।

पूर्वोत्तर के राज्यों से आने वाले लोगों को समाज मे आज भी नेपाली या चीनी कहकर बुलाया जाता है , जबकि उनकी नागरिकता भी इसी देश की होती है और उनकी देशभक्ति भी इसी देश के प्रति ही होती है । देशभक्ति के मामले मे तो कई बार इनकी देशभक्ति तथाकथित देशभक्तों से ज्यादा ही देखने को मिल जाती है । पूर्वोत्तर राज्यों पर चीन अपनी नजर गड़ाए किस तरह बैठा रहता है , ये बात किसी से छुपी नही है , केन्द्र सरकार की अधिकांश योजनाओं से अछूते रहने वाले ये लोग फिर भी अपने देश के प्रति देशभक्ति रखते . और शायद ही देश की कभी सर्वाजनिक रुप से बुराई करते है । लेकिन उत्तर भारत समाज का एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो राह चलते अपने देश की अन्य देशों से तुलना कर देश की कमियों की बौछार बताने लगता हैं । भेदभाव का सामना सिर्फ पूर्वोत्तर भारत के लोग ही नही करते बल्कि इस भेदभाव का सामना दक्षिण के राज्यों को भी करना पड़ता हैं । और अगर आप बिहार से या बंगाल से है तो कुछ जगह तो बकायदा आपके लिए स्लोगन भी बनाकर रखे जाते हैं । जिसके जरिए आपको नीचे दिखाने का प्रयास किया जाता है ।

इस तरह का भेदभाव अगर समाज का अशिक्षित वर्ग करे तो एकबार को दु:ख भी कम होता है क्योकि समझा जा सकता है कि शिक्षा के अभाव मे वे ऐसा बोल रहे है लेकिन जब यही भेदभावपूर्ण बातें उच्च शिक्षित और बौद्ध्कि वर्ग के लोग करते है तो बुरा लगता है । देश का भविष्य कहे जाने वाले युवा भी भेदभाव करने के मामले मे पीछे नही है बल्कि वे तो इस मामले मे इन तथाकथित बौद्ध्कि वर्ग से कुछ ज्यादा ही आगे है क्योकि दोस्तों के बीच होने वाले मजाक और लड़ाई मे कई बार ये लोग क्षेत्रीय पहचान को आधार बनाकर एक – दूसरे का मजाक बनाने लगते है ।

कहने को बड़ी आसानी से कह दिया जाता है कि क्षेत्रीय भेदभाव को कम करने का प्रयास किया जा रहा है और ये भी कह दिया जाता है कि ये प्रयास बहुत हद तक सफल भी हुए हैं लेकिन फिर क्यों हर बार अरुणाचल प्रदेश , मिजोरम , मणिपुर के लोगों को यह कहना पड़ता और साबित करना पड़ता है कि वे नेपाली और चीनी नही है । आखिर क्यो हर बार एक बिहारी को संकोच होता है ये बताने मे की वे बिहार से हैं ।

देश भले ही चांद पर पहुँच जाए लेकिन क्षेत्रीय भेदभाव की सोच अभी तक जमीन से उपर उठने का नाम नही ले रही है । हालांकि समाज मे कुछ लोग ऐसे भी जो भेदभाव से परे समानता का व्यवहार करते है इसीलिए सबको एक ही तराजू मे तोलना भी उचित नही होगा लेकिन देश क्या करे जब भेदभाव करने वालों का पलड़ा न करने वालो पर भारी पड़ जाए ?समाज की इस सोच मे एकाएक बदलाव आना सम्भव नही है और नही किसी एक व्यक्ति से ऐसी उम्मीद कि जा सकती है वे बदलाव ला देगा । इसके लिए व्यक्तिगत तौर पर पहले अपनी सोच को अगर बदला जाएं तो धीरे – धीरे समाज मे भी बदलाव आ ही जाएंगा । और जब तक समाज मे ये व्यापक बदलाव नही आता तब तक देश सही मायनों मे पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक एक नही हो पांएगा ।

 

 

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