लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

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प्रवीण गुगनानी

शिवाजी कथा को उत्तरभारतीयों सहित पूरे भारत को सगर्व सुनाएँ यही श्रेयस्कर होगा.. क्षेत्रवादी,विभाजनकारी संकीर्ण मानसिकता से उबरकर राष्ट्रवाद का गीत गाना होगा..

सफल राजनीति करना हो तो उत्तरभारतीयों को कोसना बंद करें राज..

 

११ अगस्त को मुंबई में आजाद मैदान में जो तलवारों, लाठियों, हथियारों, हाकीयों का हिंसात्मक प्रदर्शन हुआ और उसका स्वरुप जैसा था उसे पूरे देश ने अपनी आखोँ से देखा था. असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों ने वहाँ का स्थानीय सामाजिक ताना बाना भंग करके, स्थानीय लोगो के रोजगार, जमीन, अर्थव्यवस्था पर कब्जा जमाकर जिस प्रकार व्यवस्था को तार तार कर दिया और करते ही जा रहे थे उस दृश्य श्रंखला को भी पूरे देश ने अश्रुपूरित और मजबूर आँखों से देखा था. २१ अगस्त को राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना ने जिस प्रकार रैली, प्रदर्शन करके मुम्बई के घावों की सामाजिक सर्जरी करी उसे भी मुम्बई सहित पूरे राष्ट्र ने सगर्व देखा. कहने का आशय और अर्थ यह है कि ये दोनों प्रदर्शन जो ११ और २१ अगस्त को हुए इनके मूल में असम के दंगे थे किन्तु प्रश्न यह है कि हम हमारी धरती पर किनके दर्द, पीड़ा, अवसाद, व्यथा और कष्ट को बतानें और दूर करने के लिए प्रदर्शन और मांग करेंगें. मुझे दीवार फिल्म का वह डायलाग याद आता है जिसमें कहा जाता है कि “जिसने तेरे हाथ पर लिख दिया कि तेरा बाप चोर है वो तेरा कौन था??” दीवार फिल्म की तर्ज पर उन ११ अगस्त के प्रदर्शनकारी और तथाकथित मुम्बई निवासियों से पूछा जाना चाहिए कि असम के जिन घुसपेठियों के लिए वे हमदर्द हो रहे है वे उनके कौन है? इस देश की भूमि, हवा, पानी,संसाधन का उपयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने पराये की परिभाषा स्पष्ट करनी होगी. क्या अपने देश में खटमल की भांति घुस कर इस देश की व्यवस्था का रक्त चूसने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों को अपना मानना उनके लिए सही है?? बांग्लादेशी घुसपैठियों को यहाँ वोटों के लिए बसाने वाले देश द्रोही राजनैतिक तत्वों ने ही इस हिंसात्मक प्रदर्शन को भी कराया होगा यह मानने के पर्याप्त कारण और परिस्थितियाँ है. इन बांग्लादेशी खटमलों ने असम में घुस कर वहाँ के मूल आदिवासियों और वनवासियों के संसाधनों पर जिस प्रकार कब्जा किया और उनका शोषण किया उसकी स्वाभाविक प्रतिक्रया तो देर सबेर आनी ही थी सो आई किन्तु मुम्बई के ११ अगस्त के प्रदर्शनकारियों को यह जवाब देना होगा कि वे असम में हजारों वर्षों से रह रहे वनवासियों को अपना भाई मानते है या बांग्लादेश से आये खटमलों को??? मुम्बई में ११ अगस्त को जिन लोगो ने जिस प्रकार का प्रदर्शन किया उसकी याद एक टीस, संत्रास और नासूर बनकर मुम्बई के शांतिप्रिय अंतर्मन में लंबे समय तक रहेगी यह तो तय था किन्तु उस दर्द, टीस और नासूर बनने की तरफ बढते घाव को कोई २१ अगस्त जैसा मंच देकर इतनी जल्दी उसका मवाद बाहर निकाल कर सामाजिक सर्जरी करेगा यह निर्धारित नहीं था. यद्दपि इस मंच से एक बार फिर राज ने क्षेत्रवाद की बात करके और उत्तरभारतीयों को कोस कर अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया है तथापि एकत्रित कार्यकर्ताओं ने भी यह सन्देश मुखर होकर दिया है कि यदि वे भविष्य में क्षेत्रवाद की छोटी राजनीति छोड़ते है तो ये उनके और राष्ट्रवाद दोनों के लिए उत्तम होगा. उन्हे केवल मराठी का नारा छोड़कर शेष भारतीयों के लिए भी अपनी बाहें फैलानी होगी और स्वयं का नया संस्करण प्रस्तुत करना होगा. उन्हें आवश्यक तौर पर यह भी समझना होगा उत्तरभारतीय यदि मुम्बई छोड़ देंगे तो मुम्बई की रक्तवाहिनियां थम जायेंगी.

राज ठाकरे ने जिस प्रकार २१ अगस्त को प्रदर्शन किया और उस प्रदर्शन को ११ अगस्त के प्रदर्शन का घोषित प्रतिकार बताया वह आज के तथाकथित सुविधाभोगी राजनैतिक ताने बाने में आसान काम नहीं है!! उनका घोषित प्रतिकार या सामाजिक सर्जरी राजनैतिक रूप से आत्मघाती भी सिद्ध हो सकती थी किन्तु उन्होंने अपने घोषित वैचारिक एजेंडे को आगे बढाते हुए आत्मघाती कदम उठाने से भी गुरेज परहेज नहीं किया यह उनकी राजनैतिक ईमानदारी, प्रतिबद्धता और वैचारिक निष्ठा का परिचायक है.

समाज की नब्ज पर हाथ रखने वाले, राजनैतिक दल, सामाजिक संगठन, मुम्बई में बसने वाले व्यापारिक घराने, विचारक, चिन्तक, समाचार पत्र समूह, लेखक संपादक, इलेक्ट्रानिक मीडिया सभी जानते थे कि ११ अगस्त के हिंसक प्रदर्शन में जिस प्रकार की हिंसा हुई वह एक प्रायोजित तंत्र की पूर्व नियोजित सोच का दुष्कर्म था. सभी इस बात को भी जानते थे कि ११ अगस्त के हिंसात्मक प्रदर्शन में जितनी हिंसा की गई थी उससे बड़ा हिंसात्मक सन्देश उस दिन मुम्बई के ह्रदय में दे दिया गया था. १७,१८ अगस्त के मेरे मुम्बई प्रवास में कई लोगो से चर्चा के दौरान मैंने मुम्बई के लोगो में ११ अगस्त के प्रदर्शन के बाद निराशा और भय का संचार स्पष्ट महसूस किया था. मुम्बई के लोगो को भयभीत करने का पूरा ड्रामा ११ अगस्त को नंगे अंदाज में बेखौफ चल रहा था तब भारतीय राजनीति के ये तथाकथित बयानबाज, व्यक्तव्यवीर कहाँ थे? उस दिन के प्रदर्शन में; मुम्बईया अंदाज में कहे तो में “ये तो ट्रेलर है पिक्चर अभी बाकी है ” का सन्देश स्पष्ट प्रवाहित था जिसे मुम्बई के आम निवासियों ने सुना -और मेरे मुम्बई प्रवास के दौरान मैंने उस सन्देश को आम निगाहों में तैरता पाया- आज जो लोग मिलकर राज ठाकरे के प्रदर्शन को कोस रहे है और उसे प्रतिक्रियावादी बता रहे है तो उन्हें यह भी बताना चाहिए कि मुम्बई की आत्मा पर ११ अगस्त को अनावश्यक रूप से लगाए गए घाव का जवाब कौन देगा? कौन है जो उस दिन से मुम्बई के लोगो के मानस पर छाये भय के बादलों का घटाटोप हटाता?? कौन है जो आता और कहता कि “मुम्बई के लोगो, जब मौका आएगा तब एक लाख लोग मुम्बई की सड़कों पर उतरने को तैयार है”??? राज ठाकरे ने जिस प्रकार अपने एक लखिया प्रदर्शन को आठ दस कि.मी. पैदल चलाया और अनुशासन में भी रखा वह भी उनमें एक कुशल योजनाकार और मर्मज्ञ किन्तु सख्त राजनैतिक नेतृत्व की उपस्थिति का आभास कराता है. इस दिन किसी कि व्यक्तिगत और सरकारी सम्पति का नुक्सान न होना और इतने बड़े जनसमूह का इतनी लंबा पैदल मार्च कर लेना बताता है कि राज ठाकरे को न केवल कार्यकर्ता को एकत्रित करते आता है बल्कि उसे अभिमंत्रित करके अनुशासन में रखना भी आता है.

इस प्रदर्शन पर सवाल उठाने वालों यह समझना होगा कि आखिर हमारे सभ्य समाज, राजनीति,समाज और जागृत मीडिया को ये बात मुखरता से उठानी चाहिए थी कि ११ अगस्त के हमले का औचित्य क्या था? वह क्यों हुआ?? उसके हिंसात्मक रूप की चौतरफा आलोचना क्यों नहीं हुई??? राजनेताओं ने इस प्रदर्शन के बाद अब तक पुलिस कमिश्नर और महाराष्ट्र शासन को घेरा क्यों नहीं??? यदि ये काम किसी ने नहीं किया और राज ठाकरे ने कर लिया और निश्चयात्मक दृढ़ता के साथ साथ कुशलता और सफलतापूर्वक कर लिया तो उन्हें बधाई तो सभी राष्ट्रवादियों ने देनी ही चाहिए. हाँ राज ठाकरे ने यह कह कर अवश्य और घोर गलत किया कि वे इस प्रदर्शन के माध्यम से हिन्दुवादी राजनीति नहीं करना चाहते है और वे केवल मराठी राजनीति करना चाहते है. उन्हें अपने महाराष्ट्र प्रेम के साथ साथ उन वीर शिवाजी की गरिमा को जीवित रखना होगा जिन्होंने इस पूरे भारत राष्ट्र के हिंदुओं की रक्षा का बीड़ा उठाया था. आखिर राज ठाकरे जिजा माता के द्वारा शिवाजी को राष्ट्रवाद के सिखाये गए पाठ, पिलाए गए आत्माभिमानी दूध और पूरे देश को अपने आँचल में समेट लेने की भावना को कैसे भूल सकते है? शिवाजी की कथा को वे उत्तरभारतीयों सहित पूरे भारत को सगर्व सुनाएँ यही श्रेयस्कर होगा ;वे भी उनकी ओर आस भरी नजरें टिकटिकाएं है यह उन्हें समय की मांग के अनुरूप समझना होगा. आखिर जिस प्रकार का कार्य उन्होंने किया है उससे तो जय “महाराष्ट्र जय भारत” के सुन्दर स्वर ही निकल रहे है और ऐसा ही हम सुनना भी चाहते है.

One Response to “राज ठाकरे ने सामाजिक सर्जरी की है”

  1. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’/Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'-Jaipur

    लेखक की निम्न पंक्तियाँ केवल विचारणीय ही नहीं हैं, बल्कि हर “आम-ओ-खास” में गुस्से और चिंता का संचार करने वाली हैं :-

    “……….इस प्रदर्शन पर सवाल उठाने वालों (को) यह समझना होगा कि आखिर हमारे सभ्य समाज, राजनीति, समाज और जागृत मीडिया को ये बात मुखरता से उठानी चाहिए थी कि ११ अगस्त के हमले का औचित्य क्या था? वह क्यों हुआ?? उसके हिंसात्मक रूप की चौतरफा आलोचना क्यों नहीं हुई??? राजनेताओं ने इस प्रदर्शन के बाद अब तक पुलिस कमिश्नर और महाराष्ट्र शासन को घेरा क्यों नहीं??? …………”

    उक्त पंक्तियों के लिए लेखक को बहुत-बहुत साधुवाद!

    लेकिन लेखक की निम्न पंक्तियाँ अति आशावाद और असमंजस का प्रमाण हैं :-

    “………………आखिर राज ठाकरे जिजा माता के द्वारा शिवाजी को राष्ट्रवाद के सिखाये गए पाठ, पिलाए गए आत्माभिमानी दूध और पूरे देश को अपने आँचल में समेट लेने की भावना को कैसे भूल सकते है? शिवाजी की कथा को वे उत्तरभारतीयों सहित पूरे भारत को सगर्व सुनाएँ यही श्रेयस्कर होगा ;वे भी उनकी ओर आस भरी नजरें टिकटिकाएं है यह उन्हें समय की मांग के अनुरूप समझना होगा. आखिर जिस प्रकार का कार्य उन्होंने किया है उससे तो जय “महाराष्ट्र जय भारत” के सुन्दर स्वर ही निकल रहे है और ऐसा ही हम सुनना भी चाहते है……………..”

    ———>ये पंक्तियाँ लेख और लेखक की गंभीरता को हल्का करती हैं!

    ——–>या तो लेखक को सीधे-सीधे राज ठाकरे के साथ खड़ा नज़र आना चाहिए या फिर देश के साथ!

    ——–>राज ठाकरे के हर कार्य में देशद्रोह नज़र आता रहा है! ऐसा व्यक्ति राष्ट्रवादी है तो फिर इस देश के सच्चे देशभक्तों को देशद्रोही कहा जाना कोई आश्चर्य नहीं होगा?

    ——–>इस लेख को पढ़कर तो ये लगता है कि लेखक यदि मराठी मूल के होते तो (मुझे सच्चाई का ज्ञान नहीं है कि लेखक कहाँ से हैं) राज ठाकरे का खुलकर गुणगान करते!

    ——->मेरा अनुरोध है कि लेखक, जो एक उच्च कोटि के लेखक हैं, कृपया हम जैसों का सही मार्गदर्शन करें और राज ठाकरे जैसे देशद्रोहियों का, किसी कारण से खुलकर प्रतिकार नहीं कर सकें तो कम से कम समर्थन तो नहीं करें!

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