रजनीकांत का प्रकाश सूर्य बनता गया


– ललित गर्ग-

करीब पांच दशकों से सिनेमा में सक्रिय एवं सुुविख्यात फिल्मी अभिनेता रजनीकांत को दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किये जाने की केंद्र सरकार की घोषणा को भले ही राजनीतिक रंग देने का प्रयत्न हो रहा है, भले ही इस अवार्ड की घोषणा को तमिलनाडू के विधानसभा चुनाव से जोड़ने की कोशिश हो, लेकिन इस घोषणा से पुरस्कार स्वयं पुरुस्कृत हुआ है। इस पुरुस्कार से कला, अभिनय एवं हिन्दी सिनेमा का सम्मान हुआ है। रजनीकांत ने हिन्दी सिनेमा में अपने विलक्षण अभिनय से कामयाबी का नया आसमान रचा है, उन्होंने अपनी फिल्मों में एक अलहदा पहचान बनायी, अपनी खास संवाद अदायगी, चमत्कारी एक्टिंग स्टाइल और गजब के अभिनय ने उन्हें बुलंदी तक पहुंचाया। तमिलों ने उन्हें अपने सिर पर बैठाया। न केवल देश बल्कि दुनिया में उनके प्रशंसकों का बहुत बड़ा समूह है, जो उनके स्टाइल जैसे सिगरेट को फ्लिप करने का अंदाज, सिक्का उछालने का तरीका और चश्मा पहनने का तरीका बहुत से लोग कॉपी करने की कोशिश करते हैं। देश ही नहीं विदेशों में भी रजनीकांत के स्टाइल की कॉपी की गई। रजनीकांत ने अपनी एक्टिंग के दम पर सिनेमा जगत और लोगों के दिल में अलग ही जगह बनाई है, दादा साहब फाल्के अवॉर्ड उनके विलक्षण अभिनय कौशल, अनूठी प्रतिभा एवं हिन्दी सिनेमा को दिये गये अविस्मरणीय योगदान का सम्मान है।  
रजनीकांत का फिल्मी सफर पांच दशकों की लंबी पगडंडी पर चलता एक प्रकाश, एक प्रेरणा है। अनेक कीर्तियां, अनेक पद, अनेक सम्मान-पुरस्कार प्राप्त करके भी जो व्यक्ति दबा नहीं, बदला नहीं, गर्वित नहीं हुआ अपितु हर बार जब ऐसे पुरस्कारों से भारी किया गया तब-तब वह ”रजनीकांत“ यानी कांतिमय बनता गया। वह हर बार कहता रहा कि, ”मैं कलाकार हूँ, कलाकार ही रहना चाहता हूँ।“ और बस वो प्रकाश सूर्य बनता गया। वह इसलिए महान् नहीं कि उसके नाम के आगे अनेक अलंकरण व यशकीर्ति के प्रतीक जुड़े हैं। उसके करोड़ों प्रशंसक हैं। बड़ी-बड़ी हस्तियां उससे जुड़ी हैं। उसकी झलक पाने के लिए देश-विदेश के कोने-कोने से आकर के प्रशंसक लोग कतार बांधे रहते हैं। बल्कि वह इसलिए महान् है कि उसके पास बैठकर कोई अपने को छोटा महसूस नहीं करता। उसका सान्निध्य पाकर सब एक संतोष, एक तृप्ति, एक विश्वास महसूस करते हैं। एक बड़े विचार, आदर्श समाज-निर्माण के संकल्प से जुड़ते हैं। कहते हैं कि वटवृक्ष के नीचे कुछ भी अन्य अंकुरित नहीं होता, लेकिन इसके मार्गदर्शन में सैंकड़ों व्यक्तित्व एवं हजारों शुभ-संकल्प पल्लवित हुए हैं, हो रहे हैं, संबल पाते हैं, जीवन को उन्नत दिशाओं में अग्रसर करते हैं। वह एक कलाकार ही नहीं, जीवन-निर्माण का संकल्प भी है। घड़ी का तीन-चैथाई वक्त जन-कल्याण के लिए देने वाला व्यक्ति निजी नहीं, जनिक होता है। जब किसी का जीवन जनिक हो जाता है तब निजत्व से उभरकर बहुजन हिताय हो जाता है। निजत्व गौण हो जाता है।
दक्षिण फिल्मों के सुपरस्टार रजनीकांत का असली नाम शिवाजी है। रजनीकांत का जन्म 12 दिसंबर 1950 को बेंगलुरू में एक मराठी परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी मेहनत और कड़े संघर्ष की बदौलत टॉलीवुड में ही नहीं बॉलीवुड में भी काफी नाम कमाया। साउथ में तो उनको थलाइवा और भगवान कहा जाता है। उन्होंने 25 साल की उम्र में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। उनकी पहली तमिल फिल्म ‘अपूर्वा रागनगाल’ थी। इस फिल्म में उनके साथ कमल हासन और श्रीविद्या भी थीं। 1975 से 1977 के बीच उन्होंने ज्यादातर फिल्मों में कमल हासन के साथ विलेन की भूमिका ही की। लीड रोल में उनकी पहली तमिल फिल्म 1978 में ‘भैरवी’ आई। ये फिल्म काफी हिट रही और रजनीकांत स्टार बन गए। रजनीकांत को 2014 में 6 तमिलनाड़ु स्टेट फिल्म अवॉर्ड्स से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें से 4 सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और 2 स्पेशल अवॉर्ड्स फॉर बेस्ट एक्टर के लिए दिए गए थे। उन्हें साल 2000 में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया था। 2014 में 45वें इंटरनेश्नल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया में रजनीकांत को सेंटेनरी अवॉर्ड फॉर इंडियन फिल्म पर्सनैलिटी ऑफ द ईयर से भी सम्मानित किया गया था। अब उन्हें दादा साहब फाल्के अवॉर्ड प्रदत्त करने का निर्णय सिलेक्शन ज्यूरी ने किया है। इस ज्यूरी में आशा भोंसले, मोहनलाल, विश्वजीत चटर्जी, शंकर महादेवन और सुभाष घई जैसे कलाकार शामिल हैं। निश्चित ही यह सही कलाकार का सही चयन है। साल 2018 में यह पुरस्कार सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और साल 2017 में भूतपूर्व बीजेपी नेता और अभिनेता विनोद खन्ना को दिया गया था।
पिछले लम्बे दौर में यह चर्चा काफी तेजी थी कि रजनीकांत तमिलनाडु की चुनावी राजनीति में भी कदम रखने वाले हैं, लेकिन बीते साल दिसंबर में उन्होंने ऐलान किया कि वे स्वास्थ्य कारणों से चुनावी राजनीति से बाहर ही रहेंगे। पिछले 25 वर्षों से रजनीकांत के सक्रिय राजनीति में आने कयास लगाये जाते रहे थे, लेकिन अब रजनीकांत ने – ‘अच्छा करो, अच्छा बोलो तो अच्छा ही होगा’ इस एक वाक्य से जाहिर कर दिया कि फिल्मी संवाद सिर्फ रुपहले बड़े पर्दे पर ही धमाल नहीं करते, बल्कि आम जनजीवन में भी वे नायकत्व को साकार होते हुए दिखा सकते हैं। रजनीकांत भले ही सक्रिय राजनीति में आकर एक नये अध्याय की शुरुआत नहीं कर पाये हो, लेकिन वे सार्वजनिक जीवन में सेवा एवं समाज निर्माण के कार्यों में सक्रिय बने रहेंगे। तमिलनाडु भारत का ऐसा राज्य है, जहां की राजनीति में फिल्मी सितारों का हमेशा दबदबा रहता है।
रजनीकांत के राजनीति में आने की महत्वाकांक्षाओं का बड़ा कारण रहा कि सरकार में बहुत भ्रष्टाचार है और इस तरह की भ्रष्ट सरकारों को सत्ता में नहीं होना चाहिए। राजनीति में भ्रष्टाचार एवं आर्थिक अपराधों का वे समय-समय पर विरोध करते रहे हैं। रजनीकांत ने सिनेमा जगत में ही अद्भुत नहीं रचा बल्कि राष्ट्रीय एवं सामाजिक परिवेश में जो नैतिकता एवं संवेदनाओं की लकीरें खींची हैं, वह कोई देख नहीं रहा है, किसी के पास कुछ सुझाने के लिए भी नहीं है। इसलिए तो रजनीकांत भिन्न है। इसलिए तो उनसे मार्गदर्शन मिलता है। इसलिए वे राष्ट्र एवं समाज की आशा और अपेक्षा के केन्द्र हैं। ऐसे रोशनी देने वाले चरित्रों को राजनीति रंग देना दुर्भाग्यपूर्ण है, ऐसे पुरस्कार की पात्रता पर भी सवाल उठाना विडम्बनापूर्ण है।
रजनीकांत ने हिन्दी एवं तमिल सिनेमा में एक लम्बी यात्रा तय की है। इस यात्रा के अनेक पड़ाव रहे हैं। सिनेमा के दुनिया के सबसे बड़े अवार्ड से नवाजे जाने के अवसर पर इन पड़ावों को मुड़कर देखना एक रोचक एवं प्रेरक अनुभव है। कहा जा सकता है कि उनका सिनेमाई जीवन के समानान्तर एक और जीवन समाज-निर्माता का जीवन है। वह मूल्यों का एवं संवेदनाओं का जीवन है। स्वयं का भी विकास और समाज का भी विकास, यही समष्टिवाद है और यही धर्म है और यही रजनीकांत के जीवन का सार है। केवल अपना उपकार ही नहीं परोपकार भी करना है। अपने लिए नहीं दूसरों के लिए भी जीना है। यह हमारा दायित्व भी है और ऋण भी, जो हमें अपने समाज और अपनी मातृभूमि को चुकाना है और यही रजनीकांत  की प्राथमिकता में शुमार है। उन्होंने समय की आवाज को सुना, देश के लिये कुछ करने का भाव उनमें जगा, उन्होंने सच को पाने की ठानी है, यह नये भारत को निर्मित करने की दिशा में एक शुभ संकल्प हैं। उनको दादा साहब फाल्के अवॉर्ड देने की घोषणा से उनके संकल्पों को बल मिलेगा, वे राजनीति को भले ही सक्रिय रूप में जीवन-लक्ष्य न बनाये पर राजनीतिक परिवेश में उनकी अप्रत्यक्ष भूमिका से भी भ्रष्टाचार एवं अपराधमुक्त करने की दिशा में कोई सार्थक पहल बनेगी, ऐसा होने से ही राजनीति में सिद्धान्तों एवं मूल्यों की स्थापना को बल मिल सकेगा।

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