लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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मनोज ज्वाला
२६ जनवरी सन १९५० से हमारे गणतंत्र की आरम्भ हुई यात्रा विविध
राजनीतिक हालातों अवसरों चुनौतियों व प्रवृतियों से होती हुई आज एक ऐसे
मुकाम पर पहुंच गई है , जहां इसकी अब तक की उपलब्धियों पर गौर फरमाने की
जरुरत महसूस हो रही है तो वहीं दूसरी ओर इसके गंतब्य की दृष्टि से इसके
चाल-चलन और इसकी दशा-दिशा पर विमर्श करना भी आवश्यक प्रतीत हो रहा है ।
ऐसा इस कारण क्योंकि स्वतंत्रता आन्दोलन की कोख से उत्पन्न गणतंत्र की इस
संवैधानिक अवधारणा को अपनाने के साथ हमारे देश के नीति नियन्ताओं ने जो
लक्ष्य निर्धारित किये थे , मंजिलें तय की थी और इस यात्रा के जिन
परिणामों की कल्पना की थी वो आज भी हमें प्राप्त नहीं हो सके हैं ।
हालाकि हमारी यात्रा एक दिन भी कहीं रुकी नहीं है , हम चलते ही रहे हैं
लगातार , तरह-तरह के प्रयोग भी करते रहे हैं इस दरम्यान अनेक बार ।
ऐसा भी नहीं है कि हमारे स्वतंत्रता-आन्दोलन के गर्भ से
निकले संविधान की धुरी पर कायम लोकतंत्र नामक विमान को हांकने-चलाने वाले
हमारे चालक-दल के लोग प्रशिक्षित नहीं रहे हैं , बल्कि सच तो यह है कि वे
जरुरत से ज्यादा ही प्रशिक्षित और चालाक रहे हैं । उन्हें ब्रिटिश सरकार
की काऊन्सिलों से लेकर कांग्रेस के विभिन्न संगठनों-कार्यक्रमों तक में
प्रशिक्षण मिलते रहे थे और आज भी विविध रुपों में मिल रहे हैं । किन्तु
किस तरह के प्रशिक्षण मिले इसकी एक-दो बानगियों पर गौर करना यहां
प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है ।
सन १९३४ में कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व ने नीचे
की सभी कांग्रेस-ईकाइयों को निर्देश दिया कि वे सांगठनिक चुनाव करा कर
समितियों का पुनर्गठन कर लें । तब अनेक सक्षम व धन-सम्पन्न कांग्रेसी
नेताओं ने अपनी-अपनी जेबों से सदस्यता व खादी के पैसे खर्च कर फर्जी
सदस्य बना-बना कर उनकी बदौलत संगठन में बडे-बडे पद हथिया लिए और
निष्ठावान नेता-कार्यकर्ता मुंह देखते रह गए । देश के विभिन्न क्षेत्रों
से महात्मा गांधी के ऐसी शिकायतों से भरे पत्र पहुंचने शुरू हो गए ।
बम्बई से कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भी जब गांधी जी इस बावत पत्र लिखा
और इस भ्रष्टाचार से दुखी हो कर कांग्रेस छोड दी की इच्छा जतायी तब
महात्माजी को एक सप्ताह का प्रायश्चित उपवास करना पडा था । एक बानगी
स्वतंत्रता से पहले की है- बाबू लक्ष्मी नारायण उन दिनों उतर प्रदेश में
कांग्रेस के समर्पित नेता हुआ करते थे । उनकी राष्ट्र-भक्ति-निष्ठा से
प्रभावित होकर कांग्रेस ने उन्हें प्रान्तीय एसेम्बली में भेजने के लिए
मनोनीत कर लखनऊ भेज दिया । एसेम्बली की सदस्यता ग्रहण करने के बावत
शपथ-पत्र के साथ एक सरकारी अधिकारी उनके पास भेजा गया , जिसने उन्हें शपथ
का मजमुन दिखाते हुए कहा- इसे पढ कर बेअटक बोलने का अभ्यास कर लीजिए , कल
सदस्यता-समारोह में इसे दोहराना होगा । शपथ के मजमुन की पहली पंक्ति- “
मैं ब्रिटिश ताज के प्रति सच्ची निष्ठा के साथ वफादारी की प्रतिज्ञा
करता हूं……………….” को देखते ही लक्ष्मी बाबू भडक उठे- ऐसी शपथ मैं नहीं ले
सकता , क्योंकि मैं तो ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ ही स्वतंत्रता की लडाई
लड रहा हूं , इस कारण मैं अपने देश के प्रति निष्ठावान हूं , एसेम्बली का
सदस्य बनने के लिए मैं अपनी निष्ठा नहीं बदल सकता । उनकी नाराजगी
कांग्रेस के बडे नेता गोविन्द बल्लभ पंत के पास पहुंची । पंत जी ने
उन्हें समझाया- यह शपथ महज औपचारिकता मात्र है , इसकी पंक्तियां शब्द-जाल
के सिवाय और कुछ नहीं हैं , आपको शपथ ले लेनी चाहिए , जो भी लोग काऊंसिल
की सदस्यता ग्रहण करते हैं , वे यह शपथ लेते ही हैं । बावजूद इसके
लक्ष्मी बाबू नहीं माने और दो टूक शब्दों में इंकार कर दिए- मैं अपने
राष्ट्र के प्रति निष्ठा का त्याग नहीं कर सकता । इस बानगी से दो बातें
बिल्कुल साफ हैं । पहली यह कि सन १८५७ के विद्रोह के बाद अपने औपनिवेशिक
साम्राज्य की रक्षा के लिए शासन में भारतीय जनता की भागीदारी के नाम पर
कायम किए गए काऊंसिल ऐक्ट के तहत जो भी लोग निर्वाचित या मनोनीत होकर
काऊंसिलों-एसेम्बलियों में जाते थे उन्हें ब्रिटिश हुक्मरान अपने
साम्राज्य के प्रति निष्ठावान बनाने का प्रशिक्षण दिया करते थे । दूसरी
बात यह कि कांग्रेस के नेताओं को इस चुनावी राजनीति के तहत पद-प्रतिष्ठा
के लिए सिद्धांतों-आदर्शों से समझौता करते रहने अर्थात जनता को ठगने के
विविध आडम्बरों-पाखण्डों का अभ्यास कराया जाता था । अब आजादी के बाद की
एक दूसरी बानगी देखिए- संविधान को लागू करने से पूर्व सर्वसम्मति से
राष्ट्रपति के चुनाव का जब मौका आया तब डा० राजेन्द्र प्रसाद के प्रति
अघोषित सर्वानुमति पूर्व से ही कायम थी ; किन्तु प्रधानमंत्री जवाहर लाल
नेहरू प्रसाद के बजाय राजगोपालाचारी को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे । ऐसा
इस कारण क्योंकि राजेन्द्र प्रसाद का व्यक्तित्व खालिस देशज प्रकृति का
और हिन्दी के प्रति हिमायती प्रवृति का था , जो कदाचित नेहरू की अंग्रेजी
मनोवृति के अनुकूल नहीं था ; जबकि राजगोपालाचारी नेहरू की ही तरह न केवल
अंग्रेजीदां होने के कारण उनके पसंदीदा थे , बल्कि ब्रिटिश क्राऊन के
प्रतिनिधि- लार्ड माऊण्ट बैटन के उतराधिकारी के तौर पर तत्कलीन गवर्नर
जनरल होने की वजह से भी उन्हें ज्यादा सहज प्रतीत हो रहे थे । तब अपनी इस
अलग-थलग इच्छा को समूचे भारत के गण्तंत्र पर थोपने के लिए उन्होंने
राजेन्द्र बाबू को सूचित कर दिया कि सरदार पटेल से इस बावत उनकी बात
पक्की हो गई है कि राजगोपालाचारी ही राष्ट्रपति होंगे इसलिए आप अपनी
उम्मीदवारी वापस ले लें । एक खुफिया अधिकारी आरएनपी सिंह ने अपनी किताब
‘नेहरू : ए ट्रबल्ड लीगेसी’ में दावा किया है कि “नेहरू ने राजेंद्र
प्रसाद को देश का पहला राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए झूठ बोला था” ।
राजेन्द्र बाबू को नेहरू क ऐसा छल-छद्म थोडा अटपटा सा लगा, क्योंकि
राष्ट्रपति पद के लिए उनके नाम पर सहज-स्वाभाविक सर्वानुमति बहुत पहले से
ही कायम थी , यद्यपि वे इसके लिए स्वयं प्रयत्नशील नहीं थे , तथापि
सच्चाई जांचने के लिए उन्होंने पटेल से दूरभाष पर पूछा तो उनका उतर सुन
कर वे हतप्रभ रह गए । पटेल ने उन्हें बताया कि इस मुद्दे पर नेहरू से
उनकी कभी कोई बात ही नहीं हुई है । वे चूंकि अंग्रेजीदां राजगोपालाचारी
को राष्ट्रपति बनाना चाह रहे हैं, इस कारण मेरे नाम (पटेल) का बेजा
इस्तेमाल कर रहे हैं ।
इन तीनों बानगियों से स्पष्ट है कि सत्ता-तंत्र से बाहर रहने
वाले लोग राष्ट्रीयता के सिद्धांतों, आदर्शों और जनाकांक्षाओं के प्रति
निष्ठावान रहे हैं , आज भी हैं ; किन्तु सत्ता का स्वाद चख चुके माननीय
‘गणों’ का हाजमा इस कदर बिगडता और बढता जाता रहा है कि वे राष्ट्रीयता,
सिद्धांतशीलता , आदर्शवादिता , वचनबद्धता व राष्ट्रीय निष्ठा जैसे वांछित
सदगुणों को तो आत्मसात करने से कतराते रहे , जबकि राष्ट्रीय हितों और
जनाकांक्षाओं को बडे आसानी से डकार कर हजम कर जाने और इस हेतु छल-छद्म ,
झूठ-फरेब और धन-बल का इस कदर इस्तेमाल करते रहे कि ऐसी तमाम
अवांछनीयतायें ही भारतीय राजनीति की संस्कृति बन गईं । इस राजनीतिक
‘(अप)संस्कृति’ की मार से अपना गण्तंत्र भी इस कदर आहत होता रहा कि तंत्र
के तमाम कल-पुर्जों में लोभ-लालच-स्वार्थ-प्रपंच-लिप्सा-लोलुपता के
लार-मवाद रिसने-बिजबिजाने लगे । फलतः सत्ता-लिप्सा की इस बिजबिजाहट से
उत्पन्न राजनीतिक दल-दल में जन-हित और देश-हित के मुद्दे ऐसे उलझ गए कि
कभी किसी ईमानदार नेतृत्व ने उन्हें सुलझाने का प्रयत्न भी किया , तो वे
और उलझते ही गए । पश्चिमोत्तर में कश्मीरी अलगाववाद का मामला हो या
दक्षिण में हिन्दी विरोध का भाषाई मसला, समान नागरिक संहिता की आवश्यकता
हो या जातीय आरक्षण का बढता सिलसिला, इन सब को राजनेताओं की सत्ता-लिप्सा
ने ऐसे उलझा दिया है कि हमारे राष्ट्र-जीवन में जहर घुलता आ रहा है और
हमारे गणतंत्र की धार कुंद होती जा रही है । इतना ही नहीं , अब तो
राजनीति में शुचिता, सिद्धांतशीलता व आदर्शवादिता जैसी धारणायें दुर्लभ
होती जा रही और उनके स्थान पर झूठे प्रचार , आडम्बर , पाखण्ड , दल-बदली
, काली कमाई , रोश्वतखोरी , दलाली जैसी अवांछनीयतायें स्थापित हो चली हैं
। इन सब राजनीतिक दुष्प्रवृतियों के प्रदूषण की वजह से हमारा गणतंत्र
कमजोर हो रहा है । इस पर गर्व तो दूर , संतोष कर लेने का भी कोई कारण
दिखाई नहीं पडता ।
मनोज ज्वाला

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