ऐसे लौटेगा भारत में राम राज्य..

-विनोद बंसल

    भारत के राष्ट्रीय पर्वों व त्योहारों में 15 अगस्त और 26 जनवरी का विशेष महत्व है। 15 अगस्त वह पावन दिवस है जब अंग्रेजी झण्डा साइमन जैक को लाल किले की प्राचीर से उतारकर तिरंगा फहराया गया था। यानी हमारा देश अंग्रेजी दासता से मुक्त हुआ था। वहीं 26 जनवरी एक ऐसा दिवस है जब हम स्वतंत्र हुए उन कानूनी बंधनों से जो अंग्रेजों ने हमारे ऊपर लादे हुए थे। हमने उस दिन अपना एक स्वतंत्र संविधान अंगीकार किया था। इसे बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर सहित संविधान सभा में उपस्थित अनेक वरिष्ठ और श्रेष्ठ जनों ने लगभग ढाई साल तक गहन अध्ययन-मनन व चिंतन तथा विभिन्न देशों के संविधानों का अध्ययन करने के बाद बनाया। भारतीय परिस्थितियों के अनुसार हम भारत वासियों के लिए क्या उचित और अनुचित, करणीय व अकरणीय कार्य, मूल अधिकार,  सहायक अधिकार और राज्य के नीति निदेशक तत्व हों, उन सब का संग्रह कर एक संवैधानिक रचना बनाई।

    बात आती है कि गणतंत्र है क्या? तो, गणतंत्र अर्थात गण का तंत्र यानी प्रजा-तंत्र अर्थात जनता द्वारा जनता के लिए जो तंत्र विकसित किया जाए वह गण तंत्र कहलाता है। गणतंत्र के तीन मूल घटक हैं। न्याय-पालिका, कार्य-पालिका व विधायिका। इन तीनों की ही स्वतंत्रता और निष्पक्ष व्यवस्था हमारे संविधान में दी गई है। ये तीनों अंग जितने सुगठित और प्रभावी होंगे, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। जिस प्रकार देशवासियों को न्याय दिलाने के लिए न्यायपालिका आवश्यक है वैसे ही विधायिका के द्वारा देश के लिए आवश्यक कानूनों का निर्माण तथा उनका पालन सुनिश्चित करना। न्यायालय के आदेशों व विधायिका के निर्देशों की अनुपालना कर उनको तोड़ने वालों को उचित दंड की व्यवस्था सुनिश्चित करने का दायित्व कार्य-पालिका का है।

    लोकतंत्र के इन तीनों आधार स्तम्भों के अतिरिक्त जिस जनता के लिए यह बनाये गए उसके द्वारा भी कुछ कर्तव्यों का पालन आवश्यक है। तभी तो गणतंत्र सार्थक होगा। जनता को चाहिए कि वह स्वयं, परिवार, समाज व राष्ट्र की उन्नति हेतु सतत सक्रिय रहे। राष्ट्रीयता की भावना, राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान, राष्ट्रीय गौरवशाली क्षणों, परम्पराओं व उनसे जुड़े इतिहास व महा-पुरुषों से सतत प्रेरणा लेते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती रहे। राष्ट्र को मजबूत करने वाली हर व्यवस्था, परम्परा व मान्यताओं का पालन किया जाता रहे। मेहनत, कर्मठता तथा राष्ट्र प्रेम में कभी कोई न्यूनता न आने पाए। इसके लिए एक सजग प्रहरी की तरह कार्य करे। राष्ट्रीय स्वाभिमान, उसके नैतिक व सांस्कृतिक मूल्यों, धरोहरों तथा मान्यताओं को सुदृढ व सुरक्षित रखने हेतु सदैव सक्रिय रहे।

समान नागरिक संहिता, गौ रक्षा, समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता, प्रत्येक व्यक्ति को काम व शिक्षा जैसे अनेक प्रावधान संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में वर्णित हैं। किन्तु, इस संबंध में सार्थक पहल चिर-प्रतीक्षित है। इनके अभाव में देश में साम्प्रदायिक उन्माद, कट्टरता व देश विरोधी गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलता रहा है। कुछ राजनीतिक दल अपने थोक के वोटों के लालच में मुस्लिम व ईसाई तुष्टिकरण कर देश के बहुसंख्यक समुदाय तथा राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करते रहे हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में, राष्ट्रीय स्वाभिमान के जागरण हेतु, वर्तमान सरकारें द्रुत गति से आगे बढ़ी हैं। तीन तलाक व धारा ३७० का हटाया जाना, सदियों के संघर्ष के बाद श्री राम मंदिर का पुनर्निर्माण, नागरिकता संशोधन अधिनियम का बनना इत्यादि अनेक चिरपेक्षित किन्तु असंभव से लगने वाले कार्यों को वर्तमान केंद्र सरकार ने बड़ी सूझबूझ से कर दिखाया है। तथापि, निम्नांकित बिन्दु इस गणतंत्र को और सार्थक बनाएंगे:

१- मनुस्मृति व भारतीय संविधान में वर्णित न्याय के शाश्वत सिद्धांतों का पालन स्वयं करें तथा लोकतंत्र के विभिन्न घटकों से कराएं।

२- सरकार व शैक्षणिक संस्थान वैदिक शिक्षा तथा राष्ट्रीय मूल्यों के विकास हेतु विद्यालयों व विश्व विद्यालयों में पाठ्यक्रम बनाएं। ध्यान रहे कि वेद किसी मत-पंथ-सम्प्रदाय विशेष से सम्बंधित न होकर सम्पूर्ण मानव जाति के लिए हैं।

३- सीमा पर तैनात सुरक्षा बलों के जवानों को दिये जाने वाले प्रशिक्षण का कुछ भाग प्रत्येक नागरिक को भी दिया जाए। इससे राष्ट्रीयता का भाव तथा सैनिकों के प्रति सम्मान जागेगा।

४- राष्ट्र और उसका आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विकास सर्वोपरि है। यह शिक्षा बाल्यकाल से ही दी जाए।

५- प्रत्येक देशवासी को उसके नागरिक अधिकारों के साथ एक अच्छे नागरिक के रूप में कर्तव्यों के पालन हेतु बचपन से ही प्रेरणा दी जाए।

६- मतदान की प्रक्रिया को इतना सरल व पारदर्शी बनाया जाए कि जिससे शत-प्रतिशत सही मतदान सुनिश्चित हो सके। जैसे- ऑन लाइन वोटिंग।

७- वोट डालने के अधिकार के साथ उसे अपना धार्मिक कर्तव्य भी समझकर एक सुदृढ व सशक्त विधायिका बनाने हेतु आगे आएं।

८- जान-बूझ कर वोट न डालने वालों के विरुद्ध भी उचित कार्यवाही का प्रावधान हो जिससे मतदाताओं की उदासीनता के कारण संसद व विधान सभाओं में अनपेक्षित लोगों के पहुंचने पर अंकुश लगे।

९- जन प्रतिनिधियों के लिए भी आयु, शैक्षणिक योग्यता, निरपराधी वृत्ति तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी आहर्ताऐं सुनिश्चित हों।

१०- जन प्रतिनिधियों के काम का वार्षिक मूल्यांकन आर्थिक व सामाजिक दोनों आधारों पर अवश्य हो। साथ ही उसे सार्वजनिक भी किया जाए।

११- भौतिक व आर्थिक विकास के साथ-साथ देश के सामाजिक सांस्कृतिक व राष्ट्रीय मूल्यों का भी समुचित विकास व उनका वार्षिक अंकेक्षण हो।

१२- जाति-मत-पंथ-सम्प्रदाय, भाषा व क्षेत्रवाद पर देश को बांटने वालों तथा उस आधार पर राजनीति करने वालों पर पूर्ण अंकुश लगे।

    यदि उपरोक्त बातों पर गंभीरता से विचार किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब भारत में ना सिर्फ रामराज्य लौटेगा अपितु, भारत विश्व गुरु भी कहलाएगा।

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