राम तथाकथित दलित बहुजन समाज विरोधी नहीं थे

—विनय कुमार विनायक
इन दिनों दलितों की राजनीति करनेवाले राजनेता दलित वोटों की तलाश में राम का चरित्र हनन और रावण का महिमा मंडन की ओछी राजनीति कर रहे हैं। जिसके लिए उन्हें पेरियार के सच्चा रामायण से प्रेरणामिल रही है। हालांकि इसके लिए उन्होंने राम कथा सेसम्बन्धित विभिन्न साहित्यिक सामग्री को पढ़ना मुनासिब नहीं समझा। ऐसे भी राजनेताओं को पढ़ने की जरूरत ही क्या है। अगर वे पढ़ने ही लगे तो फिर नेता क्यों होते? मगर एक स्थापित सत्य यह है कि आप किसी धर्म मजहब के आस्था पुरुष पर ओछी टिप्पणी या अनर्गल बयानबाजी नहीं कर सकते हैं। लेकिन आए दिन देखा जा रहा है कि हिन्दू धर्म के अवतारों, महापुरुषों और हिन्दू आस्था के गौरवशाली प्रतीकों पर जानबूझकर चोट पहुंचाई जा रही है और ऐसी घिनौनी हरकत हिन्दू समाज के लोगों के द्वारा ही की जा रही है। उद्देश्य है समाज के निचले तबके और नारी का वोट हासिल करना। इस प्रयत्न में वे इतना गिर जाते हैं कि नारी जाति के आदर्श प्रतिमान मां दुर्गा, सीता आदि पर आपत्तिजनक बातें करने लगते। उन्हें इतना भी पता नहीं है कि हर समाज के नारियों के लिए युगों-युगों से आदर्श बन चुकी इन नारी शक्तियों को अपमानित करके किसी समाज की महिलाओं का वोट हासिल नहीं किया जा सकता है। सच पूछा जाए तो किसी लेखक की सोद्देश्य लिखी गई प्रतिक्रियावादी रचनाओं के आधार पर हम किसी महानायक नायिका के विरुद्ध आक्षेप नहीं लगा सकते हैं। क्योंकि जनास्था की मान्यताएं एक बड़ी बात होती है। लिखित साक्ष्य के अतिरिक्त जनास्था में राम की मान्यता एक बहुआयामी आदर्श महापुरुष और भगवान के रूप में है। जबकि रावण एक रुलाने वाला खलनायक है।

सच्चा रामायण के लेखक पेरियार ने अपने रुग्ण मानसिकता और क्षेत्रीय सोच के तहत रावण का महिमा मंडन इसलिए किया है कि उनकी जानकारी में रावण एक दक्षिण भारतीय मूल के निवासी तमिल थे जबकि उनके अनुसार राम तथाकथित बाहरी आर्य आक्रांताओं के वंशज थे। उनकी सोच एकतरफा और विघटनकारी है। क्योंकि सच्चाई यह है कि रावण पितृ पक्ष से तथाकथित विदेशी आर्य आक्रांता ऋषि विश्रवा के पुत्र और ब्राह्मण ऋषि पुलस्त्य के पौत्र थे। मातृ पक्ष से भी वे भारत के मूल निवासी तमिल नहीं बल्कि आस्ट्रेलिया के आस्ट्रिक मूल के आक्रांता ही थे। जिन्होंने अपने नाना सुमाली माल्यवान आदि दैत्यों की मदद से विभिन्न देशों को जय करते हुए अपने भाई कुबेर की लंका को हड़प लिया था। चूंकि मौलिक रुप से मनुष्य की पहचान उसके पितृ वंश से होती है। ऐसे में रावण कोई दलित आदिवासी नहीं बल्कि आर्य ब्राह्मण थे। आज के संदर्भ में वे तथाकथित मूल निवासी बहुजन तो कदापि नहीं थे। उनका महिमा मंडन एक विद्वान ब्राह्मण और उदारवादी चरित्र के रूप में किया जाना मिथ्या है। वे एक आक्रांता, नारी अपहर्ता, वनवासी आदिवासियों को हक वंचित करने वाले दुरात्मा राक्षस थे। अगर ऐसी बात नहीं होती तो तत्कालीन वनवासी वानर आदिवासी समाज राम के समर्थन में रावण से युद्ध नहीं करते।

राम का चरित्र एक उदारमना महात्मा महामानव का है। जिन्होंने मां की इच्छा और पितृ आदेश पर स्वेच्छा से वनवास स्वीकार किया था। उन्हें किसी सैन्य शक्ति से देश-निकाला नहीं दिया गया था। बल्कि उन्होंने अपने छोटे भाई के हित में राजगद्दी त्याग दी थी। राम पर ये भी आक्षेप लगाया जाता है कि उन्होंने महत्वाकांक्षी सुग्रीव के लिए उनके बड़े भाई आदिवासी वनवासी समाज के वानरराज महात्मा बाली का वध किया था। किन्तु वानरराज बाली महात्मा नहीं बल्कि अपने अनुज वधू का अपहरण कर्ता भोक्ता था। राम पर शिद्दत से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि राम ब्राह्मण हित रक्षक और शूद्र दलित विरोधी थे। लेकिन इसके लिए यही कहा जा सकता है कि राम अगर ब्राह्मण के अंध समर्थक होते तो फिर रावण को क्यों मारते क्योंकि रावण तो तथाकथित वेदज्ञ ब्राह्मण थे। इससे जुड़ा दूसरा आक्षेप राम के शूद्र दलित विरोधी होने के समर्थन में एकमात्र उदाहरण शूद्र शम्बूक की हत्या को पेश किया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि शम्बूक शूद्र दलित नहीं बल्कि क्रूरकर्मा ब्राह्मण रावण का भांजा और ब्राह्मणी शूर्पनखा का पुत्र था जो तपस्वी ऋषि नहीं बल्कि तत्कालीन रीति-रिवाज के अनुसार अस्त्र शस्त्र प्राप्ति हेतु दैत्य दानवों की तरह तप कर रहा था। उसका उद्देश्य था अपने पिता के हत्यारा मामा रावण के समान पराक्रमी होना, रावण का चन्द्रहास खड्ग और आयुध प्राप्त करके रावण को पराजित करना तथा रावण का स्थान ग्रहण करना। ऐसे सपोले को शूद्र कहकर दलितों की भावना को भड़काना कहां तक जायज है। सच तो यह है कि उस युग से आज तक राम से बड़ा दलित हित रक्षक कोई नहीं हुआ है। राजकुमार राम ने वन प्रस्थान के समय नदी पार करने के क्रम में मल्लाह निषादराज को गले लगाया था, वनवासी भीलनी शबरी से श्रद्धावश आश्रम जाकर हालचाल पूछकर उनके जूठे हाथ से जूठा ही सही मीठा बेर खाया था। और तो और अयोध्या का राजा बनने पर एक दलित धोबी के आक्षेप और इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी प्राण प्रिया सीता का भारी मन से परित्याग कर दिया था। जबकि उसी राम ने युगों-युगों से लांक्षित अहल्या को फिर से पति संग ससम्मान जीवन यापन का अधिकार दिलाया था। सच्चाई तो यह है कि राम महान मर्यादावादी चरित्र नायक थे। उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में मर्यादा स्थापित की थी।

उन्होंने वनवासी से लेकर वर्णाश्रमी ब्राह्मण समाज में मर्यादा स्थापित किया था। वे अमर्यादित ब्राह्मण रावण का वध करके भी विप्र रक्षी कहलाए। उन्होंने अमर्यादित वानर बाली का वधकर वनवासियों को अनुज बधू भगिनी सुत नारी की मर्यादा का पाठ ढ़ाया। राम ने उस युग में एक पत्नी व्रत का पालन किया जब राजा महाराजा राजनीतिक शत्रुता टालने और मैत्री कायम करने के लिए एक से अधिक विवाह करते थे। रावण ने अपने से शक्तिशाली वानरराज बाली की बहन से विवाह करके खुद को सुरक्षित कर लिया था। इतना ही नहीं रावण ने अपनी श्रेष्ठता कायम करने के लिए अपनी बहन शूर्पनखा तक को विधवा बना दिया था। जो पूरी जिंदगी वन-वन प्रणय निवेदन के लिए भटकती रही और अंततः राम लक्ष्मण से अवैध प्रेम स्थापित करने के प्रयास में नाक न कटा बैठी।

सच तो यह है कि अपने भातृ कुबेर पुत्र नल कूबर की पत्नी से अवैध संबंध बनाने वाले रावण के चरित्र को समझे बिना पेरियार रामायण वादी तथाकथित मूलवासी बहुजन समाजवादी राम के चरित्र को आर्य आक्रांता कहकर हिन्दू समाज के बीच विद्वेष फैलाना चाहते हैं। हजारों हजार वर्षों से बृहदतर भारत में रहने वाले आर्य को बाहरी आक्रांता और दक्षिण के द्रविड़ को भारत का अकेला मूल निवासी समझना अपने आप में भ्रामक अवधारणा है। सच तो यह भी है कि भारत में मूल रूप से आर्य, आस्ट्रिक और मंगोल नस्ल की मिश्रित जातियां रहती है। उत्तर भारत के लोग खुद को आर्य और दक्षिण भारत के लोग खुद को द्रविड़ कहलाना पसन्द करते हैं। किन्तु सबके सब मिश्रित है। यह रक्त मिश्रण आज नहीं राम रावण काल में ही हो गया था। रावण भी ऐसे आर्य आस्ट्रिक रक्त मिश्रण की उपज थे। राम और कृष्ण हिन्दू समाज के ऐसे सुधारकर्ता महापुरुष रहे हैं जिन्होंने वर्ण और जाति देखकर कोई कार्य नहीं किया था। वर्ण और जाति देखकर दुराग्रह पालना आज के राजनेताओं का काम है। ना ही राम ने जाति वर्ण देखकर रावण का वध किया और न कृष्ण ने ही ऐसा किया। बल्कि उन्होंने दुराचारियों का नाश किया चाहे किसी जाति वर्ण वंश का हो। कृष्ण ने अपने ही दुराचारी मामा कंस और फुफेरा भाई शिशुपाल का वध किया था। किन्तु आज अगर जाति एक हो तो राम और रावण या कृष्ण और कंस एक हो जाते हैं। ऐसे ही जातिवादी घिनौने लोग महापुरुषों देवी देवताओं के चरित्र हनन करने में लगे हुए हैं।
—विनय कुमार विनायक

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