रामलला की अनन्य भक्त राजमाता विजयाराजे सिंधिया

आज जब अयोध्या में हिन्दू आस्था और स्वाभिमान के प्रतीक राममंदिर निर्माण की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है, देश भर में आम और खास सभी समानता से मर्यादा पुरषोत्तम के लिए श्रद्धापूर्वक समर्पण निधि अर्पण कर रहे हैं ऐसे में कई ऐसे नाम सहसा ही स्मृतिपटल पर आ जाते हैं जिन्होंने राममंदिर निर्माण को जीवन का संकल्प बना लिया था। विश्व हिन्दू परिषद के अशोक सिंघल जैसे रामभक्तों की तरह तत्कालीन भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजमाता विजयाराजे सिंधिया ऐसा ही संकल्प लिए हुए थीं। जब मंदिर आंदोलन के समय विवादित निर्माण की जगह रामलला विराजमान हो गए तब राजमाता का कथन था अब मैं अब बिना किसी ग्लानि के परलोक जा सकती हूं। मैंने अपने सपने को सच होते देख लिया है। रामजन्मभूमि आंदोलन के समय अयोध्या में कारसेवकों को नमन करते वाली प्रखर हिन्दूवादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी की आज पुण्यतिथि है।
राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के विचार को मन वचन और अपने सतत कर्म से जीने वालीं राजमाता को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में समूची भारतीय जनता पार्टी उन्हें नमन कर रही है। राष्ट्रवादी विचारधारा से लेकर जनसंघ से जन्मी और राजमाता द्वारा पाली पोसी गई भारतीय जनता पार्टी के लिए राजमाता विजयाराजे सिंधिया बहुत ही आदरणीय बुजुर्ग हैं। आज के कई शीर्षस्थ भाजपाई उनके गरिमामयी और वात्सल्य से भरे व्यक्तित्व के साक्षी रहे हैं। राजमाता को स्मरण करते हुए एक बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि वो ऐसी ममतामयी मां थीं कि वर्षों पूर्व हमारी यात्रा के समय शिवपुरी में वे आधी रात को इस बेटे की चिंता कर रहीं थीं। हम कार्यकर्ताओं के लिए आधी रात को हल्दीवाला दूध लेकर आयीं थीं। राजघराने में जन्म लेकर भी राजमाता राजसी आभामंडल से दूर थीं। वे छोटे छोटे कार्यकर्ताओं के लिए सहज उपलब्ध थीं। राजमाता के जन्मशताब्दी पर पीएम मोदी ने उन्हें गांवों, जंगलों, आदिवासियों और दूरदराज में बसने वाली जनता की सेवा करने वाली प्रतिबद्ध जननेता बताया था। मोदी ने कार्यकर्ताओं को अनुकरण की सलाह देते हुए कहा था कि वे दृढ़ और सौम्य राजनेता थीं तो प्रतिबद्ध और मेहनती थीं। हम सबको इन्हीं गुणों को राजमाता से आत्मसात करना चाहिए। राजमाता के समर्पित व्यक्तित्व के ऐसे संस्मरण पीएम मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में भी सुनाए थे।
राजमाता के नाम से देश भर में ख्यात विजयाराजे सिंधिया वीर छत्रसाल की बुंदेलखंडी माटी सागर से आकर ही ग्वालियर के सिंधिया राजपरिवार की बहू बनीं थीं।वे परंपराओं का जीवन जीने वाली महारानी नहीं थीं। विजयाराजे सिंधिया एक स्वतंत्र विचार वाली आत्मसम्मान पसंद महिला रहीं। वे तत्कालीन शासक जीवाजीराव सिंधिया के प्रोत्साहन एवं पंडित जवाहरलाल नेहरु के आमंत्रण पर चुनावी राजनीति में तो आईं मगर कांग्रेस के तौर तरीकों से उनका कांग्रेस से अलगाव कुछ सालों में ही हो गया। वे ग्वालियर चंबल संभाग से लेकर संपूर्ण मप्र में जनसंघ और राष्ट्रवादी विचार को मजबूत करने वाली राजनेता रहीं। उन्होंने आपातकाल का निडरता से खुलकर विरोध किया।
ग्वालियर चंबल के साथ समूचे देश में इंदिरा गांधी और कांग्रेस के वर्चस्व को राजमाता ने हमेशा चुनौती दी। आम चुनाव में उन्होंने कांग्रेस की सर्वोच्च नेता इंदिरा गांधी को रायबरेली में जाकर चुनौती दी हालांकि वे तब जीत न सकीं मगर इंदिरा गांधी के खिलाफ उनके चुनाव लड़ने ने राष्ट्रवादियों में भरपूर जोश भर दिया। राजमाता विजयाराजे सिंधिया राजनीति की कुशलता में सिद्ध हस्त थीं। मप्र में संविद सरकार गठन में उनकी भूमिका उनकी राजनैतिक कुशलता और चातुर्य को स्पष्ट करने में काफी है।राजमाता वात्सल्य की प्रतिमूर्ति होने के बाबजूद सिद्धांतों और स्वाभिमान के मामले मे कठोर रहीं।
1980 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने नानाजी देशमुख, पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और अग्रणी राष्ट्रवादियों के साथ भारतीय जनता पार्टी रुपी पौधा भारतीय राजनीति में रोपा एवं तन मन धन से उसे निरंतर सींचा भी।
वे अपने साथियों और सहयोगियों को अपने रक्तसंबंधियों से ज्यादा स्नेह करती रहीं। अपने राष्ट्रवादी साथियांे के साथ भाजपा को मप्र और देश भर में खड़ा करने निरंतर जुटी रहीं। राजमाता ने कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति के समापन और हिन्दु आत्मसम्मान के लिए तब आज के वयोवृद्ध भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी की रामजन्मभूमि रथयात्रा को भरपूर सहयोग किया। रामजन्मभूमि के लिए अयोध्या में कारसेवकों के आंदोलन का नेतृत्व करने वालों में विजयाराजे सिंधिया सबके साथ थीं। उन्हें इसके लिए मीडिया में हार्डलाइन लीडर कहा गया। 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा ढहाए जाने के जो मामले चले थे तब उन्हें भी भाजपा के दूसरे अग्रणी नेताओं की तरह आरोपी बनाया गया। वे बहुत धार्मिक प्रवृत्ति की राजनेता रहीं और राम मंदिर निर्माण की आग्रहपूर्वक पक्षधर थीं।
वे भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहीं मगर अपनी बढ़ती उम्र के कारण उन्होंने संगठन और संसदीय क्षेत्र से स्व इच्छा से अपनी भूमिका का संक्षेपण किया।
आज राजमाता की पुण्यतिथि पर आशा की जानी चाहिए कि भाजपा के सभी नेता और करोड़ों कार्यकर्ता उनके जीवन मूल्यों और विचारों को भी अंगीकार करेंगे एवं राजनीति से जनसेवा के लक्ष्य पर अपने कदम निरंतर आगे बढ़ाते रहेंगे।

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