लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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Jammat-e-ulemaदेश से बढकर कोई चीज नहीं है, मां से बढकर कोई नहीं है, सच्चाई और ईमान की राह पर चलना चाहिए, इस तरह की बातें बचपन से सुनते सुनते कान पक गए हैं। केद्रीय गृह मंत्री पी.चिदम्बरम, केंद्रीय संचार मंत्री सचिन पायलट, चर्चित योग गुरू बाबा रामदेव, आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर, स्वामी अग्निवेश, शियाओं के धर्मगुरू डॉ.काल्बे सादिक आदि की उपस्थिति में देवबंद में जमीअत ए उलेमा ए हिन्द की 30वीं महासभा में देशप्रेम का जज्बा जगाने वाले गीत बंदेमातरम पर विवाद खडा किया जाना शर्मनाक ही कहा जाएगा।

आनंदमठ पुस्तक के बंकिमचंद चटोपाध्याय द्वारा 1876 में रचित ”वन्दे मातरम” को 1896 में पहली बार कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। यह गीत आरंभ से ही विवादित रहा है। इस गीत के पहले दो अंतरों को छोडकर शेष में धरती माता की तुलना मां दुर्गा से की गई है। संभवत: यही कारण है कि वंदेमातरम के बजाए ”जन गण मन” को राष्टगान बनाया गया था।

इस महासभा में इतनी बडी बडी हस्तियों के सामने वंदे मातरम के खिलाफ फतवा जारी किया जाना आश्चर्यजनक है। उससे भी आश्चर्यजनक इन तथाकथित बडी हस्तियों की चुप्पी है। देश के गृहमंत्री जैसे जिम्मेदार और महत्वपूर्ण पद पर आसीन पी.चिदम्बरम का यह कहना भी हास्यास्पद है कि उनके सम्मेलन में रहते इस तरह का कोई फतवा जारी नहीं किया गया है। सवाल तो यह है कि जब संचार माध्यमों से उन्हें इस बात की जानकारी मिल ही चुकी है, तब उनकी इस बारे में क्या प्रतिक्रिया है।

जमीयत उलेमा ए हिन्द के मौलाना मुइजुद्दीन का कहना है कि इस गीत की कुछ लाईने इस्लाम के खिलाफ हैं। इस्लाम मां के सामने नतमस्तक होने की इजाजत नहीं देता। मुसलमान संगठनों, नेताओं और मौलाना मौलवियों ने देवबंद के इस फतवे को सही ठहराया है। यक्ष प्रश्न तो यह है कि इस गीत की रचना के 133 एवं आजादी के बासठ सालों के बाद यह गीत गैर इस्लामी करार कैसे दिया जा सकता है।

इससे पूर्व जिन भी इस्लाम के अनुयायियों ने इसे गाया होगा क्या उन्हें काफिर करार दिया जाएगा। मध्य प्रदेश में तो भाजपा सरकार द्वारा इसे अनिवार्य कर दिया गया है। हर माह सरकारी कार्यालयों में वंदे मातरम गाया जाता है। देवबंद के इस फतवे के बाद इस प्रदेश में क्या हालात बनेंगे कहा नहीं जा सकता है।

केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी में हुए इस विवाद को भाजपा ने लपकने में देर नहीं की। भाजपा के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी ने तत्काल इस पर अपनी प्रतियिा देते हुए कहा कि चिदंबरम की मौजूदगी का मतलब यह है कि कांग्रेस ने यह फतवा स्वीकार कर लिया है। राजनैतिक तौर पर तो नकवी ने बयान दे दिया किन्तु फतवे के बारे में उन्होंने चुप्पी साध ली।

इस महासभा में अनेक हस्तियां मौजूद थीं किन्तु किसी ने भी इस फतवे के बारे में कुछ भी कहना मुनासिब नहीं समझा है। चर्चित स्वयंभू योग गुरू बाबा रामदेव ने तो बाजी ही मार ली है। इस महासभा के कवरेज में बाबा रामदेव छाए हुए हैं। इलेक्टनिक मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया में पहले पेज पर बडी बडी तस्वीरें छपीं हैं बाबा रामदेव की। लगता है बाबा रामदेव का मीडिया मेनेजमेंट बडा ही गजब का है।

देश की दुर्दशा, काले धन, बिगडी व्यवस्था पर जब तब बयानबाजी करके चर्चाओं में रहने वाले बाबा रामदेव जिन्होंने हाल ही में राजनीति में कूदने के संकेत दिए थे, ने भी इस मामले में चुप्पी साध रखी है। हर कोई जानता है कि मुसलमान इस देश में बहुत ही तगडा वोट बैंक है, इसलिए मुसलमानों से जुडे मामले में बोलने से राजनेता परहेज ही किया करते हैं।

देवबंद के कुछ फतवों को छोडकर शेष फतवे काफी अच्छे हैं। कुछ माह पूर्व कहा गया था कि गाय काटना इस्लाम के खिलाफ है, बावजूद इसके देश में गोकशी के अनगिनत प्रकरण सामने आ रहे हैं। शरियत को चाहिए कि पहले वह अपने फतवों का पालन सुनिश्चित करवाए, साथ ही साथ देशहित के खिलाफ बयानबाजी से बचना चाहिए।

भारत देश में हर किसी को अपना धर्म मानने की स्वतंत्रता है। हर कोई अपने तौर तरीके से रहने के लिए स्वतंत्र है, किन्तु इस सबके उपर भारत गणराज्य का संविधान है। संविधान की व्यवस्थाओं को मानना हम सबकी बाध्यता है। वंदेमातरम गीत किसी आम भारतीय फूहड चलचित्र का अश्लील गीत नहीं वरन देश प्रेम का जज्वा जगाने वाला शहादत का प्रतीक है।

भारत सरकार को चाहिए कि इस तरह के संवेदनशील मामले में तत्काल अपना रूख स्पष्ट करते हुए इस विवाद पर विराम लगाए वरना यह मामला एक चिंगारी के रूप में भडका है, राजनैतिक नफा नुकसान के चलते इसे शोला और आग का दरिया बनने में समय नहीं लगेगा, तब आग के दानावल में समूचा देश झुलस जाएगा और उसे बुझाना टेडी खीर ही साबित होगा।

35 Responses to “राष्टभक्ति पर विवाद! – लिमटी खरे”

  1. shivesh

    thakrey jee ke rastarabhakte dakhi hai na uske bad bhi bharat sarkar ka dhul mul ravaia gazab hai bhai

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  2. अहतशाम त्यागी

    वन्दे मातरम! ये गीत है या नगमा गजल है या ग्रन्थ जो भी है जैसा भी है
    मेने आज तक नहीं गया तो किरपा करके कोई साहब मुझे ये बता दे की में देशद्रोही हूँ या देशभक्त?
    मेरे ख्याल से इसे गाने से न तो कोई देशभक्त हो सकता है और न ही देशद्रोही
    वन्देमातरम गाने वाले कुछ महारथी (मालेगाव धमाको) में आतंकवादी घोषित हो चुके हैं ये पूरा हिंदुस्तान जनता है मने या न मने ये अलग बात है
    और न गाने वाले ऐसे अनगिनत हैं जिन्होंने अपने देश की रक्षा करने के लिए सीमा पर अपने प्राण गवा दिए लेकिन उनका कोई नामलेवा नहीं है ये अलग बात है
    और आपने ज़िक्र क्या है मुख़्तार अब्बास नकवी का जो बोल रहा था फतवे पर और निशाना बनाया कांग्रेस और कांग्रेस के मंत्री को
    ये ज़रूरी नहीं जिससे प्रेम क्या जाए उसकी पूजा भी!
    प्रेम तो सभी से करना चहिये हर चीज से प्रेम करना चहिये

    मेरे पड़ोस में एक साहब ने “कुत्ता” पाल रखा है और वो कहता है में “टौमी” ko अपनी जान से जियादा प्यार करता हूँ
    लेकिन अफ़सोस मैंने आज तक उन महाशय को उस कुत्ते की पूजा करते नहीं देखा अब मेरे मन में एक प्रश्न है की ये इसे झूठा प्यार करता है या सच्चा
    देवबंद वालो ने फतवा दिया’
    नेताओं ने शोर मचाना शुरू कर दिया
    और —————महाशीय लिमती जी आपको मौका मिल गया कलम घिसने का!

    जय हिंद ………जय भारत…..

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  3. VIKAS

    MUJHE YE BAAT SAMAJH NAHI AATI KI HAM LOG KYO IN DHARMANDH LOGONKI BATOPAR DHYAN DE ADHINK SOCH WALE MUSLIM LOG INPAR KATAI VISHAWAS NAHI KARATE HAI ! DHARMKE VICHAR ACHHE HAI LEKIN INSAN UTANEHI BURE HAI HAI ! HAME KUCHH SAAL KI JINDAGI MILI HAI USME BHI ANGINAT DHARM JAT HAI MUSLIMME BHI KAI DARJAN GUTH HAI SIKH DHARM,HINDU DHARM SABHI GUTHOSE BAHRE PADE HAI ! AGAR BHAGVAN HOTA TO SUNAMI JAISI AUR BHUKAMP JAISEI TABAHI NAHI AATI JAB KOI BACHTA HAI TO KAHATE HAI BHAGWAN NE BACHAYA LEKIN FIR SAWAL YE AATA HAI KI MUSIBATME DALA KISNE ??? SABHI LOGNKI SOCH HAI PARLOK KA KOI ASTITV NAHI HAI NA KOI RUH YA ATMA KA ASTITV HAI ! JAB MARNEKE BAAD SHARIR HI NASHTH HO JAYEGA TO ATMA BINA DIMAG BINA ANKH KE KYA KAREGI?????

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  4. MANAV

    ये दुनिया बनकर लाखो साल हुए है और इस धरतीमाता ने हमें और सभी जिव-जंतु को पला पोसा है ! इसलिए
    हमारी धरती माँ का दर्जा सबसे ऊपर है और हम सभी जीव उनके जिंदगीभर अहसान नहीं चूका सकते ! लाखो वर्ष के इतिहास के
    हिसाबसे धर्म का जन्म तो कुछ ही मिनिट पहले हुवा है और यही धर्म [मै सभी धर्मकी बात कर रहा हूँ ] हमें शिखायेगा की
    किसे सबसे ऊपर मानना है ! मुझे लगता है जबसे धर्म पैदा हुवा तब से ही मानवका पतन शुरू हुवा है ! लोग एक दुसरेके
    दुश्मन बन गए है ! तालिबानी धर्मांध हो गए है और धर्मके बेबुनियादी कायदे कानून लागु करने के लिए अपनेही भाई को मौत के
    घाट उतार रहे है ! जो इस्लाम नहीं मानता वो उनका दुश्मन है ! सोचो कभी पाकिस्तानके परमाणु हथियार उनके हाथ लग जाते है
    तो पहला शिकार हमही होंगे ! सिर्फ अमेरिका ही उन आतंकवादी लोगोंका खत्म कर रहा है ! और हम सिर्फ चुप बैठे है !
    और धर्मके ठेकेदार रोज नये -नए फतवे जारी करके हंसी के पात्र बन रहे है ! कभी फतवा निकलते है की यूरोप अमेरीकामे
    उनका खाना नहीं खाना ,पानी नहीं पीना वे लोग काफर है ! कभी औरत प्यांट नहीं पहन सकती , मैकउप नहीं लगा सकती !
    बुरखा पहनना जरुरी है ! पराये मर्द को मुहं दिखाना मना है ! औरतोंका स्कूल जाना मना ,नौकरी करना मना ! लगता है ,ये
    लोग हजारो साल पहले के युग में जी रहे है ! वो दिन दूर नहीं साइंस इतनी तरक्की कर रहा है की कुछ सालमे इन्सान
    मौतपर विजय प्राप्त करेगा और फिर धर्मके सभी ढोल बजना बंद होंगे ! परलोक ,स्वर्ग-नरक धर्म -जात-पात सब इतिहास में
    दफ़न हो जायेगा !

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  5. Jeet Bhargava

    इस्लामी संस्थाए दाउद इब्राहिम, हाजी मस्तान और लादेन, अफजल-अजमल के खिलाफ कोइ फतवा क्यों नहीं निकालती? जबकि ये स्मगलिंग से लेकर मासूमो के कत्ल जैसे कुफ्र करतूते अंजाम देते है? रह रहकर ये नसबंदी, वन्देमातरम, पोलियो जैसे राष्ट्रहित के मुद्दों के खिलाफ ही फतवे क्यों जारी करते हैं…??

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  6. sadhak ummed singh baid

    अच्छा लेख है. लेकिन आज विश्व एक कालोनी जैसा हो गया है. पर्यावरणीय संकट पूरी धरती के मानवों को एक होने पर बाध्य कर रहा है. राष्ट्रवाद कैसे चलेगा, कितने दिन टिकेगा?

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  7. mubark miyan

    इस तरह के फतवे नाहे जरे होने चाहेये

    Reply
  8. suresh thakur, burhanpur m.p.

    राजनीत और फतवे का तालमेल समज्ह से परे हे hai

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  9. Dr Mandhata Singh

    भाई यह सब राजनीति का खेल है। मजहब, भाषा या धर्म को हथियार बनाकर सत्ता हथियाने के ये हथकंडे देश को रसातल में पहुंचा देंगे।

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  10. manisha upadyaya

    vande matram kii sahi jankari tatha jan gan man ke bare mein jankari
    dene ke liye mein aapki tahe dil se shukragujar hu , aasha hi nahi
    apitu purana vishvas hai kii aap bhavishya mein aisi jankari denge ,
    mein ek international vidyalaya mein shikshika hu aur is prakar kii
    jankari pana chAhti hu taki bharat ka sunhara paksh apne chatro ko
    dikha saku ,punah :VANDE MATARAM ‘ SMT.MANISHA RAMESHKUMAR UPADHYAY ,

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  11. sachin

    Also several pioneers of Tehreek-e Reshmi Rumal(Reshmi rumaal movement) were also against it.
    In a letter to Netaji(in 1937), Ravindra Nath Tagore noted that he can’t expect this song to be sung by muslims/christians or people of any other faith.
    He also noted that the song is a disgrace to unity in diversity principle followed by the then freedom fighters.
    Later on Netaji also agreed to this point of view, and opposed the song.

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  12. sachin

    @sarika
    correction:vande mataram was opposed by maulana muhammad ali shaukat and maulana muhammad ali jauhar in of congress in 1935/37

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  13. sarika

    भारत शायद भूमण्डल का एक अकेला राष्ट्र होगा जिसके दो दो राष्ट्रीय गीत हैं।
    “जन गण मन” अधिकारिक या Official तौर पर एवं “बन्दे मातरम्” सम्मानित तौर पर। इस
    विडम्बना के पीछे एक लम्बा एवं विवादित इतिहास है।
    “जन गण मन” स्व: रवीन्द्र नाथ ठाकुर द्वारा रचित है।यह गीत 1911 में सर्वप्रथम कांग्रेस के अधिवेशन में सम्राट जार्ज पंचम की उपस्थिति में गाया गया था। गुरुदेव के कथनानुसार उन्होंने इस गीत के माध्यम से दैवी शक्ति का आह्वान किया था एवं सम्राट जार्ज
    इस गीत के अधिनायक नहीं थे। इस समारोह के पश्चात इस गीत का कभी भी कोई राष्ट्रीय महत्व नहीं रहा। बन्दे मातरम सन् 1870 में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने ग्राम प्रवास के दौरान लिखा था।बाद में सन् 1882 में आनन्द मठ नामक उपन्यास में इसे गूंथ कर छापा गया। सन् 1923 तक बन्दे मातरम् भारतीय आकांक्षाओं एवं अस्मिता का प्रतीक चिन्ह रहा।प्रायः सभी राजनैतिक पार्टियों की सभाओं में यह गीत गाया जाता था। सन् 1905 के बंग भंग के खिलाफ छिड़ा आन्दोलन सम्भवतः ब्रिटिश भारत में पहला जन आन्दोलन था। इस आन्दोलन में हिन्दु व मुस्लिम दोनों वर्गों ने पूरे जोश के साथ हिस्सा लिया था। इस आन्दोलन का प्रेरणा गीत दोनो वर्गों के लिये “बन्दे मातरम्” ही था। सन् 1923 में पहली बार काकीनाड़ा में हो रहे कांग्रेस सम्मेलन में मौलाना अहमद अली
    ने इस गीत का विरोध किया। मूल विरोध का विषय था कि इस्लाम खुदा के अलावा किसी की वन्दना करने की इजाजत नहीं देता और इस गीत में मातृभुमि की वन्दना की गयी थी। बाद में क्षेपक के और पर में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनन्द मठ की पृष्ठभुमि (मुस्लिम जमींदारों के खिलाफ) के कारण इस गीत को इस्लाम विरोधी करार देकर मुद्दा बनाया गया। ये दोनों मुद्दे तथ्यों से परे सिर्फ अलगाव वादी राजनीति से प्रेरित थे।खिलाफत आन्दोलन,जो कि समग्र रूप से इस्लाम परक था, सारी बैठकें “बन्देमातरम्” गीत से ही शुरु होती थी। तत्कालीन सारे मुस्लिम नेता यथा अली बन्धु,जिन्ना इस गीत के सम्मान में खड़े होते थे।
    “बन्देमातरम्” गीत के ऐतिहासिक महत्व के सन्दर्भ में आनन्द मठ उपन्यास के पृष्ठभुमि की भुमिका अर्थहीन थी। इबादत या वन्दना का मुद्दा हास्यास्पद था। इस विषय में
    मौलाना अहमद रजा का 1944 में प्रकाशित लेख उल्लेखनीय है। उन्होंने लिखा था “”“हमारे कुछ मुस्लिम भाई जिन्दगी के कुछ साधारण तथ्य(जन्मभूमि का मातृभूमि रुप) को इबादत या बुत परस्ती का नाम देकर,नकारने का प्रयास कर रहें हैं।माता पिता के चरण स्पर्श,नेताओं के दीवार पर चित्र टांगना आदरसूचक हैं,
    इसे बुतपरस्ती की संज्ञा देना गलत है।मेरा निवेदन है कि इस गीत को एक पावन गीत
    के रुप
    में ग्रहण करें न कि बुतपरस्ती के रुप में।””
    वाममार्गी इतिहासकार मजुमदार ने भी स्वीकार करते हुये कहा था कि “ सन् 1905 से
    1947 तक बन्देमातरम् भारतीय राष्ट्रभक्तों का प्रेरणा गीत एवं हार्दिक
    अभिव्यक्ति थी अंग्रेज पुलिसकर्मी की लाठी खाते हुये या फांसी के तख्ते पर यही गीत उनके
    होंठों पर
    था।” Government of India act 1935 के तहत 1937 में जब चुनाव हुये 11 राज्यों में कांग्रेस
    की सरकार गथित हुयी। मुस्लिम्स लीग ने एक बार फिर बन्देमातरम् के विवाद को
    उठाया।इस बार कांग्रेस ने गुत्थी सुलझाने हेतु तीन व्यक्तियों,यथा नेहरू जी,सुभाष बोस एवं जिन्ना,
    की एक समिति गठित की। इस समिति ने तुष्टीकरण स्वरुप इस गीत को खण्डित कर प्रथम दो पदों
    को ग्रहण किया। अगले वर्ष पहली बार 1938 के
    कांग्रेसी अधिवेशन में सिर्फ पहले दो पदों को ही गाया गया। अब मुस्लिम लीग ने और भी कड़ा रुख अपनाते हुये मांग की कि “बन्देमातरम् गीत को
    सम्पूर्ण रुप से कांग्रेस पार्टी त्यागे,आनन्दमठ से इस गीत का निष्कासन करे एवं
    उर्दू को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा आदि।” अब यह मुद्दा अलगाव वादी राजनीति का अंग बनचुका
    था। फिर भी जमीनी हकीकत यह थी कि बन्देमातरम् ही सभी स्वतन्त्रता सेनानियों का
    प्रेरणा
    गीत था। स्वाधीनता के पश्चात भारत के सभी शीर्षस्थ नेता बन्देमातरम् को ही राष्ट्रीय
    गीत के रुप में देखना चाहते थे।
    गांधी जी ने नेता 28अगस्त 1947 को कहा था कि बन्देमातरम् को लयबद्ध कर राष्ट्रीय
    गीत का दर्जा दिया जाये। गान्धी जी ने “जन गण मन” के सन्दर्भ में कहा था कि यह एक धार्मिक गीत है। महर्षि अरविन्द: बन्देमातरम् राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति है अतएव इसे स्वतः ही राष्ट्रगीत
    > की संज्ञा प्राप्त होती है।
    >
    > नेहरू जी की अकेले की मुस्लिम तुष्टी करण की भावना ने बन्देमातरम् को दोयम
    > स्थान
    > दिला ““जन गण मन”” को राष्ट्रीय गीत का स्थान दिलवाया
    >
    > बन्देमातरम् को मात्र एक गीत कह नकारना भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास
    > को अनदेखा करना है।यह गीत
    > हमारी भारत वर्ष की राष्ट्रीय धरोहर है। इसके खिलाफ फतवा जारी करना एक भीषण
    > अलगाव वादी
    > प्रक्रिया की परिचायक
    > है।पुनश्च: बन्देमातरम् ,वन्देमातरम् की तुलना में अधिक सही है। क्योंकि यह गीत
    > बंग्ला में लिखा गया था व बंग्ला लिपि में “व” अक्षर है ही नहीं।

    Reply
  14. shrish

    लाख फ़तवे जारी हो जाएँ वन्दे मातरम् हिन्दुस्तानियोँ के दिल में हमेशा रहेगा।

    Reply
  15. Satyendra Kumar

    I am surprised how is it possible in the presense of those great people. First it is the responsibility of muslim community of india as whole to show their disagreement about it.

    Reply
  16. DR.VINEETA, MUMBAI

    RASTRA BHAKTI KE GANE PAR VIVAD KAISA, DR. MAN MOHAN SINGH PLEASE SALVE THE DISSPUTE, PLLLLLLLLLLLLLLLZZZZZZZZZZZZZZZZZZ…..

    Reply
  17. कामिनी, ग्वालियर मध्य प्रदेश

    सरकार की खामोशी से तरह तरह की भ्रांतियां पैदा हो रही हैं, सही लिखा है आपने सरकार अपना रूख जल्द स्पष्ट करे

    Reply
  18. विजयराज चौहान

    मज़हब नही सिखाता आपस मे बेर रखाना …

    मेरा सवाल उन लोगो से हे जो देवबन्द उलेमाओ द्वारा दिये गये फतवे (निदेश)
    की मुखालेफत कर रहे हे, खासकर उन लोगों से जो देश व किसी भी समाज मे होने
    वाली गतीविधि को लेकर बवाल खडा करते है?

    दिया गया फतवा केवल उस धर्म विशेष के अनुयायियो के लिए हे न कि सब के
    लिये फिर ये बवाल क्यो?

    क़्या इस लिये हमारा देश एक Democratic देश हे, क्या एक देश के प्रति
    समर्पण कि भावना केवल एक गीत को गाकर ही बताई जा सकती है क्या अब इस देश
    मे संविधान की यही हैसियत यही रह गयी है, जबकि उच्चतम न्ययालय ने भी कहा
    हे कि वन्दे मातरम गाना आवश्यक नही है.

    क़्या हम अपनी आज़ादी को इस तरह खत्म कर देंगे?

    क्या कोई भी मज़हब या देश का कानून इसकी इज़ाज़त देता है.

    मज़हब नही सिखाता आपस मे बेर रखना,
    हिन्दी है हम वतन है हिन्दुस्ता हमारा |

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  19. kuldip gupta

    But why no Muslims raise their voice against such Fatwas by Ulemas.Historically muslims had no reservations against Bande Matram. In the first freedom struggle that ensued Post Bengal Division Bande Matram was sung by all rebellions/freedom fighters irrespective of their faith. To term Bande Matram as any other song is Negating its historical importance.Bande Matram is not just a song,It is the National Song of India and was icon of our freedom struggle. To trivialize National Flag may be called a piece of Cloth etc.,
    Mr Siddiqui have you even bothered to read about Bande Matram and its historical significance.But for Nehru, Bande Matram would had been selected as National Anthem. It has the same importance as Jan Gan Man as per our constitution. To call it a mere song is blasphemy.
    NOT THE MAJAHAB BUT THESE ULEMAS THE MAJAHAB HEAD MEN ARE TEACHING APAS ME BAIR RAKHANA

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  20. raj kumar

    sabko vande matram gane ka aadikar hai, is tarah ke fatve jare karne se bachna chaheye

    Reply
  21. Saurabh Tripathi

    Actually India ke log iske liya pure jimamedar hain sabse pahale main ye puchana chahata hoon ki akhi aisi sarkar ko lane se kaya phayada jo mahangai pe rok na laga saki na hi desh ki vidas niti aur aab pura pura desh ko apmanit kar dene vala vakya aya hain
    Vende Matram aik geet nahi hai balki apne desh ke prti aik shrdha hai jo ye kahate hain muslman keval allaha ke samne sar jukata hai aur kisi ke samne nahi yahi karan hai ki jahan jahan islam hain vahan vahan koi sukh santi nahi hai iske liye islam doshi nahi hai dosi hai to aisi mansikta aur jarbuddhi

    Reply
  22. sachin

    Also one more thing:
    Sikh regiment revolted after operation Blue star.They used to sing vande mataram.Still they were not patriotic enough(though i believe what Indira did,and after her death Rajiv did, should make this act patriotic).
    Also all of you brand each politician as unpatriotic(though i believe that they are the mirror of our own society, but people use them as scapegoats for every crime),still they sing vande mataram.
    So by singing one can not prove that he is patriotic.

    Reply
  23. sachin

    How is singing a song( be it national song/anthem) shows ones patriotism?
    The religion point of muslims is hollow.They can not issue a fatwa against not singing a song, it shall be one’s choice.
    Similarly one shall not be forced to sing it.
    I mean how does it proves patriotism?If a person is a mute?will you say he is not patriotic?
    Also i watched a survey once on 15th aug on national television.More then half of the so called educated indians in metro cities did not know national anthem( let alone full vande mataram, which is highly sanskritized and thus very tough to remember for a large populas),so were all of them unpatriotic?
    more then 50 crore people live below poverty line,do they have to sing it to show patriotism?
    more than 50 crore are illiterate( govt. 64% is bullshit, they consider a person who can write his name as literate) and most of them doesn’t even know what our national anthem/song is.Are they all unpatriotic?
    Many of the arya samajis and Ravindranath Tagore also condemned this national song.will you daresay they were unpatriotic?
    Anyways i don’t like both our national anthem and national songs, because both were written to glorify the british(about vande mataram, the feeling will be clear if you read anand matth).
    If one sings ,saare jahan se achcha(or my personal favorite, aao bachcho tumhe dikhaayen) but refuse to sing ‘vande mataram'(for any no. of reasons) are they unpatriotic?
    do these songs not convey patriotism?
    And if you give me the reason that as it is now our national song, it shall be sang,here is a question.
    If i become P.M(with absolute majority and like minded followers) and make Beef the national food , will you still say that one has to eat beef to prove patriotism?

    P.S:The question here should be, how can an unconstitutional body(same as V.H.P fatwas) pass such an unconstitutional fatwa(or any fatwa)?
    The protest by the muslims in ahmedabad,in support of vande mataram,condemning this fatwa shall teach such religion fanatics(be it hindu or muslim or any religious ones) that such things shall be left for personal choice.let a person decide what is good for him(or how he conveys patriotism).Why do you want to impose the supposedly good ideas(all of them being worst ,with humanity view) onto someone.Keep them to yourself.

    Reply
  24. Jitendra Dave

    आप ने मुद्दे कॊ सही तरीके से रखा है. वन्देमतरम जैसे प्रेरनास्पद गीत साम्प्रदायिकता के हत्थे चढ‌ जाना दुखद् है. इससे भी ज्यादा दुखद है चिदम्बरम् जैसे नेताऒ की चुप्पी.

    Reply
  25. rajnish parihar

    जब् तक् हमारे नेता इन् बातॊ पर् सही राय् नहिन् देगे तब् तक् कुछ् नहि हॊगा..

    Reply
  26. mehta........jag hindu jag hindu ki awaz

    क्या एसे फतवॊ से देश दॊ धरॊ मे बटा नही दिखाई देता है
    कया एसे फतवे देश के सम्मान् कॊ ठेस नही पहुचाते है
    कया ये मॊल्वी अपने आप् कॊ देश् के कानुन से भि उपर् समझने लगे है
    व‌न्दे मात‌र‌म् गीत‌ से किसी ऒर् स‌मुदाय् कॊ कॊई स‌म‌स्या न‌ही है
    फिर् ये मॊल्वी हि देश् के स‌म्मान् मे क्यॊ शॊर् म‌चा र‌हे है

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