राष्ट्र घातक है देश विरोधियों को समर्थन

सुरेश हिंदुस्थानी
दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जिस प्रकार से राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को पनपते देखा जा रहा है, उससे ऐसा लगने लगा है कि भारत में ही पाकिस्तान के समर्थक पैदा होते जा रहे हैं। छात्रों ने पाकिस्तान और आतंकवादियों के समर्थन में जिस प्रकार की नारेबाजी की है, वह निश्चित रूप से भारत के लिए दुखदायी ही साबित होगा। छात्रों ने आतंकवादियों का समर्थन करते हुए कहा कि भारत के हर घर से अफजल निकलेगा, क्या इससे यह बात सामने नहीं आती कि हमारे देश में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का तानाबाना कितना गहरा है। यह बात हमारे देश के लिए और भी दुखदायी है कि दिल्ली के इस विश्वविद्यालय में जो राष्अ्र विरोधी गतिविधियां संचालित की जा रहीं हैं, उसमें पाकिस्तान में रह रहे दुर्दान्त आतंकी हाफिज सईद का हाथ है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा की गई यह स्वीकारोक्ति क्या इस बात को प्रमाणित करती है कि भारत में पाकिस्तान की पहुंच बहुत अंदर तक दिखाई देने लगी है।
हमारे संविधान की सबसे बड़ी विशेषता या खामी यह मानी जा सकती है कि संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी है, और इसी आजादी का फायदा उठाकर देश में राष्ट्रविरोधी वातावरण तैयार किया जा रहा है। सबसे खराब स्थिति हमारे राजनीतिक दलों की है, जिसमें किसी भी मुद्दे की वास्तविकता जाने बिना ही उस मुद्दे को राजनीतिक समर्थन तक मिलना प्रारंभ हो जाता है। कांगे्रस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस प्रकार से दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों की देशघातक नारेबाजी को समर्थन दिया है, उससे तो ऐसा ही लगता है कि वे किसी न किसी रूप से उन लोगों का समर्थन करते दिखाई दे रहे हैं जो किसी न किसी रूप से पाकिस्तान, हाफिज सईद और अफजल की कार्यवाहियों का समर्थन करते हैं। कांगे्रस सहित वामपंथी दलों ने छात्रों का समर्थन किया है, इतना ही नहीं उन्होंने तो सरकार के मंत्री से मिलकर इन छात्रों पर कार्यवाही नहीं किए जाने की वकालत की है।
अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के नाम पर भारत में कहीं न कहीं राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का संचालन किया जाने लगा है। यह बात सही है कि स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति मात्र रचनात्मक विरोध करने तक ही सीमित है, परंतु पाश्चात्य विचारों और हमेशा चर्चाओं में रहने के आदी हो चुके हमारे राजनेता यह भूल जाते हैं कि वे जाने अनजाने में देश में बहुत बड़े खतरे का आमंत्रण दे रहे हैं। वास्तव में स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के नाम पर हम अपने जायज अधिकारों का उपयोग करके इतना ही कर सकते हैं कि हमें जो बात पसंद नहीं आ रही है, उसका केवल रचनात्मक विरोध करें। अगर किसी व्यक्ति को भारतीय जनता पार्टी के कार्य पसंद नहीं हैं, तो वह उसका प्रतिकार या उसके विरोध में अपनी आवाज उठा सकता है। कांगे्रस, वामपंथियों की नीतियों से सरोकार नहीं है, तो वह उस पर अपना विरोध प्रकट कर सकता है, लेकिन राष्ट्र के विरोध में उठने वाली आवाज को स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति कतई नहीं माना चाहिए। ऐसी आवाज उठाने वालों के लिए समर्थन व्यक्त करना किसी न किसी रूप में राष्ट्रद्रोहिता ही है।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुए इस घटनाक्रम में कांगे्रस और वामपंथी नेताओं की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कांगे्रस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी और वामपंथी नेताओं ने इस मामले में जिस प्रकार की सक्रियता दिखाई है, उससे अप्रत्यक्ष तौर पर दुर्दान्त आतंकी हाफिज सईद को ही समर्थन मिला है। वर्तमान में कांगे्रस को इस बात का गंभीर रूप से चिन्तन करना चाहिए कि उनका यह कदम देश के लिए किस प्रकार की स्थितियों का निर्माण कर सकता है। आतंकी अफजल की फांसी का समर्थन करने वाले लोगों के साथ कांगे्रस का खड़ा होना निश्चित रूप से कांगे्रस की पूर्व की केन्द्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है। आज कांगे्रस जिस मुद्दे का समर्थन कर रही है, वह मुद्दा उसका स्वयं का बनाया हुआ है। हम जानते हैं कि मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व में सरकार ने अफजल की फांसी के लिए न्यायालय से अनुरोध किया था। और अफजल को इसके बाद ही फांसी दी गई। राहुल गांधी की वर्तमान कार्यशैली अपनी ही सरकार के निर्णय का विरोध करती दिखाई दे रही है। इसमें सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि वास्तव में अफजल आतंकी था या नहीं? अगर वह आतंकी था तो कांगे्रस अफजल या हाफिज के समर्थन में खड़े लोगों का समर्थन क्यों कर रही है। अगर वह आतंकी नहीं था तो उसे कांगे्रसी सरकार के समय बचाने का प्रयास क्यों नहीं किया गया। इस सबसे यह बात प्रमाणित होती है कि कांगे्रस आज जो भी कुछ कर रही है, वह केवल चर्चाओं में बने रहने की राजनीति का ही हिस्सा ही है। इसके अलावा कुछ भी नहीं।
हम जानते हैं कि भारत में अंग्रेजों का शासन तभी सफल हो सका था, जब उन्होंने भारतीय समाज में फूट पैदा की थी। आज का वातावरण भी कमोवेश उसी प्रकार का दिखाई दे रहा है। कांगे्रस और वामपंथी दल समाज में फूट पैदा करके फिर से सत्ता प्राप्त करने का मंसूबा पाल रहे हैं। इसी फूट के कारण ही भारत कमजोर हो रहा है, और इसी के कारण ही भारत में आतंकी घटनाओं को पर्याप्त समर्थन हासिल हो जाता है। हमें जानते हैं कि दिल्ली विश्वविद्यालय में किए गए इस घटनाक्रम से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को समर्थन मिलता है। आतंकवादी अपनी कार्यवाहियों के संचालन के लिए संभवत: इसी प्रकार के लोगों का सहारा लेते रहे होंगे। वर्तमान में पाकिस्तान में रह रहे आतंकवादी भारत को हमेशा ऐसे धमकी देते हैं जैसे वे भारत में ही रह रहे हों, संभव है कि उनके समर्थन में नारे लगाने वाले ऐसे ही लोग उनको देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए सहयोग करते होंगे।
हम जानते हैं कि पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित किए जा रहे आतंकवाद का दंश भारत लंबे समय से भोग रहा है, भारत में जब भी आतंकियों के विरोध में कठोर कदम उठाने की कवायद की जाती तब इसी देश में उनके समर्थक खड़े दिखाई देते हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत में आतंकवादियों का नेटवर्क काम कर रहा है, यदि नहीं तो आतंक फैलाने वालों को इतने व्यापक स्तर पर समर्थन कैसे हासिल हो जाता है। यह सही है कि आतंक का समर्थन करना देश के लिए आत्मघाती कदम है, कहीं न कहीं हम स्वयं ही देश के साथ ऐसा खिलवाड़ कर रहे हैं जो देश को समाप्त करने की राह पर ले जाने वाला कदम है। ऐसी सोच रखने वाले लोगों से आज सावधान रहने की जरूरत है। अब सवाल तो यह भी आता है कि देश में उठ रहे इस समर्थन के स्वरों को हवा कहाँ से मिल रही है, कहीं इसके पीछे पाकिस्तान तो नहीं। अगर पाकिस्तान है तो हमें अपने स्तर पर यह विचार अवश्य ही करना चाहिए कि हम ऐसा कार्य करके क्या साबित करना चाह रहे हैं।
वैश्विक षड्यंत्र के झांसे में आकर देश में जिस प्रकार का जहर फैलाया जा रहा है, उसकी गिरफ्त में आज पूरा भारत देश दिखाई दे रहा है, आज आवश्यकता इस बात की है कि देश के नागरिक इस बारे में चिंतन करें कि हमारा देश किस प्रकार से प्रगति की राह पर अग्रसर हो। वर्तमान में हमारे देश में जिस प्रकार की राजनीति की जा रही है, वैसा विश्व में किसी भी देश में दिखाई नहीं देता, क्योंकि वहाँ का नागरिक अपने देश के प्रति कर्तव्यों को अच्छी प्रकार से समझता है, और सुरक्षा के मामले में में तो सारे राजनीतिक दल और जनता एक स्वर में केवल वही भाषा निकालते हैं, जो देश हित में, लेकिन हमारे देश में क्या हो रहा है, कम से कम देश की सुरक्षा के नाम पर तो किसी प्रकार की राजनीति नहीं होना चाहिए।

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