भारत मे शिक्षा बनाम आरक्षण की हकीकत

भारत में आरक्षण और दलित वर्ग वर्तमान में राजनीति का केंद्र बने हुए है अब भारत मे जो विषय राजनीति के केंद्र में होता है उसका लाभ जनता को मिलता है या स्वतः राजनीति को यह बात गौर करने वाली है । जिस आरक्षण के बूते कई राजनीतिक पार्टियां बनी सत्ता में आई और लंबे समय तक शासन भी किया यह वर्तमान में उसी परम्परा को आगे बढाया जा रहा उसने देश को क्या दिया ? आज शिक्षा के क्षेत्र में हम कहा खड़े है ? पहले यह जान लेना आवश्यक है फिर यह जान पाने में बहुत ही सरलता होगी कि वास्तव में आरक्षण का लाभ मिल किसे रहा ? शोषित,वंचित दलितों को अथवा इनके माध्यम से कृमि लेयर में बैठे मुठ्ठी भर लोगो को अथवा सम्पूर्ण राजनीतिक कुनबे को…..? भारत में शिक्षा की स्थिति की बात करे तो भारत ने 11वीं पंचवर्षीय योजना में सकल घरेलू उत्पाद का 1.22 प्रतिशत ही शिक्षा पर खर्च किया जबकि अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने सकल घरेलू उत्पाद का क्रमश: 3.1 प्रतिशत तथा 2.4 प्रतिशत खर्च किया। इस सन्दर्भ में आनंदकृष्णन समिति ने शिक्षा से जुड़े हर मंत्रालय का 2 प्रतिशत हिस्सा शोध कार्यों पर खर्च करने की सिफारिश की और नारायणमूर्ति समिति ने उद्योग जगत तथा सरकार के बीच संबंधों को मजबूत बनाने के लिए एक राष्ट्रीय परिषद् गठित करने की सिफारिश की। भारत मे स्कूल की पढ़ाई करने वाले 9 छात्रों में से एक ही कॉलेज पहुँच पाता है जिसमे सामान्य वर्ग के और ओबीसी वर्ग के 99% बच्चे होते है और 1% दलित वर्ग के जिनके लिए आरक्षण की समूची व्यवस्था की गई है जिसके पश्चात या जहां से आरक्षण की शुरुवात होती है तो भारत में उच्च शिक्षा के लिए पंजीकरण कराने वाले छात्रों का अनुपात विश्व में सबसे कम केवल 11 प्रतिशत है. अमेरिका में यह अनुपात 83 प्रतिशत है. इस अनुपात को 15 प्रतिशत तक ले जाने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत को 2,26,410 करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी जबकि 11वीं योजना में इसके लिए केवल 77,933 करोड़ रुपये का ही प्रावधान किया गया था. नैसकॉम और मैकिन्से के हालिया शोध के अनुसार मानविकी में 10 में से एक और इंजीनियरिंग में डिग्री ले चुके चार में से एक भारतीय छात्र ही नौकरी पाने के योग्य है. राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद का शोध बताता है कि भारत के 90 प्रतिशत कॉलेजों और 70 प्रतिशत विश्वविद्यालयों का स्तर बहुत कमजोर है. भारतीय विश्वविद्यालय औसतन हर पांचवें से दसवें वर्ष में अपना पाठ्यक्रम बदलते हैं, लेकिन तब भी ये मूल उद्देश्य को पूरा करने में विफल रहते हैं. भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए प्रति वर्ष सात अरब डॉलर खर्च करते हैं. भारत में उच्च शिक्षा में शिक्षकों की काफी कमी है। यहां औसतन 26 छात्रों पर एक शिक्षक है जबकि विश्व में यह औसत 16 छात्रों पर एक शिक्षक का है। देश में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) और भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) में 30 से 35 प्रतिशत शिक्षकों की कमी है जबकि राज्यों के विश्वविद्यालयों में 50 प्रतिशत शिक्षकों की कमी है। ऐसे सरकारी विद्यालय ढूंढने के लिए भागीरथी प्रयास करना होगा जिसके 80 प्रतिशत बच्चों के ज्ञान का स्तर उनकी कक्षा के अनुरूप हो और इन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे वही है जिनके लिए आरक्षण का समूचा स्वर्णिम स्वप्न है लेकिन भारत मे केवल 11% बच्चे जिसने सरकारी स्कूल और कान्वेंट स्कूलों में पढ़ने वाले सभी बच्चे शामिल है उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाते है बाकी भारत के कुल 89% बच्चे 12वी तक जाते-जाते पढाई छोड़ देते है बताने की आवश्यकता नही होनी चाहिए कि इन 89% बच्चों में किस वर्ग के बच्चे बहुतायत में है ? सवर्ण ? ओबीसी ? या दलित ?? ऐसे में आरक्षण की मांग, मार,पीट और भारत बंद, दलितों का शोषण आदि विषय पर उलझी राजनीति और लोगो पर तरस आता है । शोषित कोई विशेष जाति धर्म या लोग नही शोषित तो समूचे “हम भारत के लोग है ।” भारत के संविधान में लिखा गया पहला शब्द “हम” बड़ा महत्वपूर्ण और गौर करने योग्य है क्या “हम” की भावना आज भारतीय समाज मे बची भी है अथवा यह ही विलुप्त हो गई है ? विचार करें ।

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