मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना : अकबर का ‘फतहनामा’ : जो बताता है हिंदुओं के प्रति उसकी क्रूर नीति को

अकबर का ‘फतहनामा’

मध्यकालीन इतिहास में जब मुगल और उनसे पहले तुर्क भारतवर्ष में अपने अत्याचारों के माध्यम से हिन्दू उत्पीड़न के कार्यों में लगे हुए थे, उस समय एक प्रकार से ये लोग दंगाइयों के रूप में ही घूम रहे थे। हिन्दू अस्मिता से खिलवाड़ करना और हिन्दू विनाश करना इनका उद्देश्य था। अकबर ने अपने इस मजहबी कर्तव्य की पूर्ति के लिए चित्तौड़ की विजय के पश्चात जो ‘फतहनामा’ जारी करवाया था उसमें भी उसने अपने हिन्दू द्वेष को स्पष्ट रूप से प्रकट किया था। इस ‘फतहनामा’ में अकबर ने स्पष्ट रूप से लिखवाया था कि :-
”अल्लाह की ख्याति बढ़े इसके लिए हमारे कर्तव्य परायण मुजाहिदीनों ने अपवित्र काफिरों को अपनी बिजली की तरह चमकीली कड़कड़ाती तलवारों द्वारा वध कर दिया। ”हमने अपना बहुमूल्य समय और अपनी शक्ति घिज़ा (जिहाद) में ही लगा दिया है और अल्लाह के सहयोग से काफिरों के अधीन बस्तियों, किलों, शहरों को विजय कर अपने अधीन कर लिया है, कृपालु अल्लाह उन्हें त्याग दे और उन सभी का विनाश कर दे। हमने पूजा स्थलों उसकी मूर्तियों को और काफिरों के अन्य स्थानों का विध्वंस कर दिया है।”
(फतहनामा-ए-चित्तौड़, मार्च 1586,नई दिल्ली)

अकबर के एक दरबारी इमाम अब्दुल कादिर बदायूँनी ने अपने इतिहास अभिलेख, ‘मुन्तखाव-उत-तवारीख’ में लिखा था कि 1576 में जब शाही फौजें राणाप्रताप के खिलाफ युद्ध के लिए अग्रसर हो रहीं थीं तो मैनें ”युद्ध अभियान में शामिल होकर हिन्दुओं के रक्त से अपनी इस्लामी दाढ़ी को भिगोंकर शाहंशाह से भेंट की अनुमति के लिए प्रार्थना की।”
मेरे व्यक्तित्व और जिहाद के प्रति मेरी निष्ठा भावना से अकबर इतना प्रसन्न हुआ कि उन्होने प्रसन्न होकर मुझे मुठ्ठी भर सोने की मुहरें दे डालीं।” (मुन्तखाब-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदायूँनी, खण्ड II, पृष्ठ 383,अनुवाद वी. स्मिथ, अकबर दी ग्रेट मुगल, पृष्ठ 108)
इसी प्रकार के अन्य अनेकों उदाहरण ,तथ्य और साक्ष्य प्रमाण रूप में हमारे पास उपलब्ध हैं जो यह स्पष्ट करते हैं कि अकबर सहित कोई भी मुगल हिन्दुओं के प्रति उदारता का दृष्टिकोण या नीति अपनाने का समर्थक नहीं था। उनके लिए सबसे पहले मजहब था। साम्प्रदायिक सोच के आधार पर वह अपना शासन चलाना उचित मानते थे।
इसके उपरान्त भी यदि अकबर को भारत प्रेमी और हिन्दू प्रेमी करके दिखाया जाता है तो वह सारा का सारा दुष्प्रचार केवल हिन्दू समाज को कलंकित और अपमानित करने के लिए किया जाता है। देश की वर्तमान युवा पीढ़ी पर इसका दुष्प्रभाव यह पड़ रहा है कि धीरे-धीरे नई पीढ़ी पर जितनी अधिक अकबर की तथाकथित उदारता थोपी जाती है उतनी ही वह मानसिक रूप से नपुंसक होती जा रही है । उसे महाराणा प्रताप में दोष और अकबर की महानता में सर्वत्र पवित्रता दिखाई देती है।

वामपंथी इतिहासकारों की चाल

वास्तव में दृष्टिकोण में इस प्रकार का परिवर्तन कर देना ही वामपंथी और कांग्रेसी इतिहासकारों का एकमात्र उद्देश्य रहा है। कांग्रेस ने इस प्रकार का दुष्प्रचार अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया है। वह मुस्लिम तुष्टीकरण के माध्यम से देश पर शासन करते रहना अपना अधिकार मान चुकी है। कांग्रेस की देखा – देखी वामपंथी भी हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दुस्तान को कोसना अपना परम पवित्र उद्देश्य मान चुके हैं। ऐसा करके वह भी इस मान्यता के हैं कि एक दिन वह इस देश को ‘लाल झंडे’ के नीचे ले आएंगे।
जबकि वर्तमान मुस्लिम नेतृत्व अब इन दोनों की मूर्खता को समझकर और देश में बढ़ती अपनी जनसंख्या को देखकर अब स्वयं देश की सत्ता को हथियाने की योजना बनाने लगा है । इसके लिए उसका तर्क यही होता है कि हिन्दुस्तान पर हमने 800 वर्ष शासन किया है और हमने इस देश की आजादी के लिए सबसे अधिक बलिदान दिए थे, इसलिए आने वाले समय में हिन्दुस्तान पर हम ही शासन करेंगे ।

बलिदानों के बलिदान को इतिहास से ओझल किया, महानायक वे बने जिन्होंने देश से था छल किया। आज हम विचार कर लें इतिहास की यह साक्षी,
भारत हमारा महान था जिसे पूर्वजों ने बल दिया।।

कांग्रेसी और वामपंथी इतिहासकारों की देश विरोधी भावना का लाभ ऐसे मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्व यह कहकर उठाते हैं कि देश में लाल किला हो या ताजमहल यह सब हमारे बनवाए हुए हैं । हिन्दुओं का यहाँ पर कुछ नहीं है । अतः देश का यदि अतीत हमारा था तो भविष्य भी हमारा ही होगा । कहने को तो देश में लोकतन्त्र है, परन्तु मुस्लिमों द्वारा इस लोकतन्त्र को भी अपनी बढ़ती जनसंख्या के आधार पर अपना बंधक बनाने की योजना बनाई जा रही है । इन सारी योजनाओं के पीछे सारी साम्प्रदायिक सोच काम कर रही है, अर्थात भविष्य के भारत पर यदि चिन्तन किया जाए तो मजहबी सोच भारत के भविष्य को भी धुंधला करती दिखाई दे रही है।
निश्चय ही इस समय देश को गृह युद्ध से बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है। जिसके लिए वास्तविक शान्तिप्रिय हिन्दू और मुस्लिम नेतृत्व को साथ बैठना चाहिए। उन्हें देश में समान नागरिक संहिता व जनसंख्या नियंत्रण की मांग एक स्वर से करनी चाहिए । इन लोगों द्वारा सरकार पर इस बात के लिए दबाव बनाना चाहिए कि देश के सभी लोगों को समान अधिकार प्राप्त हों और सब मिलकर देश उत्थान के कार्य में लगे।

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