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    मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना : भारतीय समाज पर मुगलों का नकारात्मक प्रभाव

    भारतीय समाज पर मुगलों का प्रभाव

    भारतीय समाज पर मुगल शासनकाल का यह है गम्भीर प्रभाव है। मुगल काल में आर्य परम्परा के सर्वथा विपरीत आचरण करने वाले लम्पट शासकों को देश का पूजनीय शासक बनाने का चाहे जितना प्रयास किया गया हो, परन्तु भारतीय आर्य परम्परा की श्रेष्ठता की निकृष्टतम श्रेणी में भी ये नहीं आते।


    मुगल शासकों या किसी भी मुस्लिम शासक या अंग्रेजों के बारे में यह समझ लेना चाहिए कि इन विदेशी आक्रमणकारियों का उद्देश्य न केवल भारत को बल्कि भारत से अलग के वे सभी देश जो उनके आधीन रहे ,पर अपना जबरन शासन थोपना था। इनका उद्देश्य किसी भी देश या जाति को नैतिकता का पाठ पढ़ाना या मानवतावादी बनाकर संसार के लिए स्वयं को और उपयोगी सिद्ध करना नहीं था।
    जबकि भारत का राजधर्म दूसरों पर अनैतिक और अवैधानिक ढंग से शासन करने को अनुचित और पूर्णतया वर्जित मानता है। वह अधीनता से मुक्त करने में विश्वास रखता है। किसी भी प्रकार के शोषण, दमन, दलन और अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए भारत के ऋषियों ने राज्य व्यवस्था को स्थापित किया था। जबकि मजहब के नाम पर मुस्लिम और ईसाई शासकों ने जब -जब और जहाँ – जहाँ अपनी सत्ता स्थापित की उन्होंने दूसरे लोगों के अधिकारों का हनन किया है और उन पर अपने शासन को जबरन थोपने का अनैतिक और अमानवीय कृत्य किया है। इतिहास को उनके इस प्रकार के कृत्यों को इसी प्रकार वर्णित करना चाहिए।

    पाशविकता के नग्न नृत्य से हिंदू आतंकित रहा,

    शासन की नीतियों को लेकर वह सशंकित रहा।

    सुरक्षार्थ निज सम्मान के तलवार लेकर चल पड़ा,

    बाजी प्राणों की लगा भयंकर हो शत्रु से लड़ा।।

    जब एक जाति अमानवीय अत्याचारों को करती है और दूसरी उन अमानवीय अत्याचारों को सहन करती है तो ऐसी परिस्थिति में साम्प्रदायिक दंगे भड़कते हैं, जिनसे मानवता का बहुत भारी अहित होता है। इसी से अत्याचार सहने वाले मानव समूहों में अत्याचार करने वाले वर्ग के विरुद्ध विद्रोह के भाव पनपते हैं। भारत में तुर्क , मुगल शासकों और उनके पश्चात अंग्रेजों के विरुद्ध यदि भारतीयों के भीतर रह- रह कर विद्रोह के भाव पनपते रहे तो उसका कारण केवल यही था कि इन सबका शासन भारत में अमानवीय आचरण का प्रतिबिम्ब बन चुका था।

    हिन्दुओं के प्रति जहाँगीर की नीति के उदाहरण

    जहाँगीर की हिन्दुओं के प्रति अनुदारता का एक उदाहरण यह भी है कि उसने जम्मू के राजौरी क्षेत्र के रहने वाले हिन्दुओं को इस बात के लिए कठोर दण्ड दिया था कि उन्होंने मुस्लिम लड़कियों से विवाह कर लिया था। जहाँगीर ने अपने जीवन काल में कांगड़ा के किले पर अपनी विजय पताका फहराने में जब सफलता प्राप्त की तो उसने हिन्दू राजा और उसकी हिन्दू प्रजा को अपमानित करने के दृष्टिकोण से वहाँ पर गाय कटवाकर अपना विजयोत्सव मनवाया था।
    इतना ही नहीं उसने वराह के मन्दिर के भीतर हिन्दू देवताओं के चित्रों को वहाँ से तुड़वा – फुड़वाकर पड़ोस के एक तालाब में फेंक दिया था।
    जब जहाँगीर ने पुर्तगालियों के विरुद्ध संघर्ष किया तो सभी ईसाई चर्चों को उसने बन्द करवा दिया था। इस प्रकार प्रत्येक गैर मुस्लिम के विरुद्ध उसने अपनी धार्मिक असहिष्णुता का परिचय दिया। इसी प्रकार सिक्खों के गुरु अर्जुन देव को इसलिए प्रताड़ित किया कि वह हिन्दुत्व की ध्वजा को लेकर चल रहे थे और हिन्दू जागरण का कार्य कर रहे थे। जहाँगीर नहीं चाहता था कि गुरुजी के नेतृत्व में सारा हिन्दू समुदाय उठ खड़ा हो और इस देश में राष्ट्रवाद की आंधी में मुगल सत्ता ही उखड़ जाए। यही कारण था कि उसने गुरुजी और उनके अनुयायियों पर अनगिनत अत्याचार किये। ऐसा नहीं है कि जहाँगीर ने केवल हिन्दुओं पर ही अत्याचार किए हों इनके अतिरिक्त दूसरे सम्प्रदायों पर भी उसकी क्रूरता निरन्तर चलती रही । भारत में सिख, जैन और बौद्ध हिन्दू वैदिक धर्म की ही एक शाखा माने जाते हैं । कानून के रूप में इन तीनों को एक ही पितृ पुरुष की सन्तान अंग्रेजों ने भी स्वीकार किया । जिससे यह तीनों हिन्दुत्व की चादर के नीचे आ जाते हैं। हिन्दू विरोध की अपनी इसी प्रकार की साम्प्रदायिक नीति का परिचय देते हुए जहाँगीर ने एक बार जैन धर्म के सभी अनुयायियों को गुजरात छोड़ने का आदेश दे दिया था।

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