लेखक परिचय

विजय सोनी

विजय सोनी

DOB 31-08-1959-EDUCATION B.COME.LL.B-DOING TAX CONSULTANT AT DURG CHHATTISGARH

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विजय सोनी

धर्म की परिभाषा या व्याख्या करने का अधिकार या कर्तव्य केवल ऋषि मुनियों का ही है, मैं ये दुस्साहस बिलकुल भी नहीं कर सकता केवल एक सामान्य व्यक्ति की सामान्य सोच से ,मैं तो केवल याद दिलाऊंगा की-इस सत्य को तो विज्ञान भी मानता है की आज हम जिस धरती पर जी रहे हैं ,वो सूर्य जो आग का एक गोला था का ही एक भाग है,लेकिन समय ने अपना धर्म निभाया धीरे धीरे ये आग का गोला पानी-हवा के”धर्म”से ही शांत हुवा,फिर धीरे धीरे पेड पौधे -व जीव जंतुओं ने जनम की प्रक्रिया को प्राकृत रूप से सामान्य धर्म को ग्राह्य कर जन्म दिया ,आदम-हौवा की संतान प्रजनन की प्रक्रिया भी “प्रजनन धर्म-संसार रचना धर्म” को मान कर प्रारंभ हुवी और यहीं से आहिस्ता आहिस्ता हमने ये समझा की ब्रह्माण्ड,सम्पूर्ण सौर्यमंडल,पृथ्वी,आकाश और जीव जंतु सहित फल फूल और जीव जंतुओं तक का कुदरत ने धर्म तय किया है फिर मानुष इससे कैसे वंचित रह सकता है या यों कहें की सबका अपना अपना धर्म होता है, तो गलत नहीं होगा,सितारे अपना धर्म ,पृथ्वी अपना धर्म,जीव जंतु सभी अपना अपना धर्म पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाते हैं तभी ये संसार कायम है ,अन्यथा ज्ञान- विज्ञान सब धरा का धरा रह जाएगा मनुष्य उस विनाश की कल्पना तक नहीं कर सकता की स्थिति कितनी विकट होगी,समझना उसके बस का भी नहीं है किन्तु मानव स्वाभाव के वशीभूत होकर हम कई कार्य केवल अपने अंधे स्वार्थ और लालच के लिए अनावश्यक करतें हैं,अपनी इसी आदत के वशीभूत होकर हम अनेक प्रकार की व्याख्या करतें हैं उसी में एक शब्द जिसे अंग्रेजी में”सेकुलेर”जिसका अर्थ होता है”संसारी धर्म से सम्बन्ध ना रखने वाला”और इसी को”इज्म”जोड़ कर”सेकुलरिजम”अर्थात “धर्म निरपेक्षता ” कहा जाने लगा भारत में सरकारें धर्म को लेकर घबराने लगीं कहीं कहीं तो ऐसा लगने लगा है की ये लोग धर्म निरपेक्षता की आड़ लेकर अधार्मिक और अप्राकृतिक हो गए हैं ,हम भूल गए हैं की ,भारतवर्ष तो एक ऐसा देश है जिसने सारी दुनिया में अपने धार्मिक-संस्कारिक मान्यताओं के बल पर अपना लोहा मनवाया है ,पता नहीं ७ पीढी तक के मुग़ल शाशन और २०० वर्षों की अंगरेजी गुलामी की चाही अनचाही छाप से हम कब मुक्त होंगें ,चाँद सितारों के धर्म की ना सोचते हुवे भी यदि हम देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है की दुनिया में कोई भी देश बिना धार्मिक मान्यताओं के नहीं चल रहा है ,पश्चिमीदेशों सहित पृथ्वी का उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्ध का बड़ा भाग जहाँ ईसाई धर्म के अनुयाई हैं तो खाड़ी सहित विश्व एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम धर्म का पालक है,अन्य धर्मावलम्बी लोगों के साथ वहां किस प्रकार का आचरण व् व्यवहार होता है ये भी हम जानते और समझतें हैं -धर्म निरपेक्षता शब्द का हो हल्ला केवल है तो केवल भारतवर्ष में होता है जहाँ “धर्मनिरपेक्षता ” शब्द की दुहाई दे दे कांग्रेसी सरकार अपनी राजनितिक रोटियां सेक कर हिन्दुओं को कट्टरवादी -आतंकवादी और ना जाने क्या क्या कह कर की “हिन्दू आतंकवादी ” हैं,हिन्दुओं की तुलना सिम्मी जैसे उग्र मानव विरोधी गुटों तक से कर इसे बदनाम करने की कोशिश सत्ता लोलुप लोगों द्वारा केवल”फूट डालो राज करो”के सिधान्त को सर्वोपरी मान कर की जा रही है किन्तु देर है अंधेर नहीं समय का पहिया घूम कर फिर अपने यथा स्थान ज़रूर पहुंचता है इसके लिए किसी सहारे की ज़रूरत नहीं है कुदरत के नियम बदलना इंसान चाहे जितना भी दंभ भर-चाहे जितनी ताक़त लगा ले उसके बस का नहीं है ,यदि धर्म नहीं तो कुछ भी नहीं इसे हमें देर सवेर सब को मानना और अपनाना ही होगा तभी विश्व में शान्ति समृद्धि और एकता कायम होगी।

7 Responses to “धर्म बनाम धर्मनिरपेक्षता”

  1. सुशान्त सिंहल

    सुशान्त सिंहल

    हमारे संविधान के हिन्दी संस्करण में धर्म निरपेक्षता शब्द नहीं है बल्कि पंथ निरपेक्षता शब्द प्रयुक्त हुआ है जो सही भी है। किसी पंथ या संप्रदाय के प्रति सरकार का कोई विशेष झुकाव नहीं होगा – यहां तक तो सहमति हो सकती है परन्तु धर्म निरपेक्षता तो सरासर एक आत्मघाती आत्म-प्रवंचना है इससे अधिक कुछ भी नहीं । हिन्दू किसी रिलीजन या मज़हब का नाम नहीं है, वास्तव में यह एक जीवन- दर्शन है। हिन्दू जीवन दर्शन में अनेकानेक पंथ व संप्रदाय हैं, अनेकानेक पूजा पद्धतियां हैं । जो भगवान को मानता है, वह भी हिन्दू, जो अनीश्वरवादी है वह भी हिन्दू ! जो मूर्ति पूजा करता है, वह भी हिन्दू और जो इसे एक ढकोसला मानता है, वह भी हिन्दू । ऐसे में हिन्दू समाज की सही परिभाषा यही की गई है कि जो इस देश को अपनी जन्मभूमि, पितृ-भूमि व पुण्यभूमि मानता है, वह हिन्दू है। जन्म लेने मात्र से जन्म भूमि निर्धारित हो जाती है किन्तु पितृ-भूमि का अर्थ है मेरे पुरखे भी इसी देश के थे। पुण्य-भूमि का अर्थ है कि मेरे इष्ट देव, आराध्यदेव भी इसी देश में पैदा हुए थे, कहीं किसी अन्य देश में नहीं । इन तीन शर्तों को पूरा करते ही आप हिन्दू हो जाते हैं।

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  2. Raj

    सर आप ने बिलकुल ठीक कहा है धर्म है तो सब कुछ है धरम नहीं तो कुछ नहीं ईसाई और इस्लाम अपने धर्म को बदने के लिए क्या कुछ नहीं कर रहे है और हम कपोल काल्पनिक धर्मनिरपेक्षता का तुन्तुना बजा रहे हम मतलब आप हम नहीं , गाँधीवादी और कांग्रेसी क्योकि उनकी राजनितिक रोटियां इसी से हो तो पकती है , रही बात पश्चिमी देशों की तो ईसाई भी कट्टर होते है चाहे उनके देश मैं मंदिर हो अथवा गुरुद्वारा पर वो देश धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्या को मनमानी करने की छुट नहीं देते याद है न हाली मैं फ्रांस सरकार ने बुर्के पर पाबन्दी लगा दी धर्म्निर्पेखता सिर्फ दकोसला है नशे की दवा है जिससे सम्पूर्ण हिंदुयों को अचेतन बना रखा hai

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  3. Er. Ghanshyam Soni

    हिंदुस्तान की धर्मनिरपेक्षता विश्व में एक मिशाल हे.इसका सही मतलब समजना चाहिए.सारे विश्व को धर्मनिरपेक्षता अपनानी चाहिए, तभी इसका सारे विश्व को फायदा होगा .
    घनश्याम सोनी (रोड़ा), अध्यक्ष सोनी समाज, जोधपुर

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  4. KAILASH

    मेरेमत में दुनिया में सबसे ज्यादा कट्टर ईसाई धर्म के अनुयायी होतें हैं ,हिन्दू की प्रकृति ही अत्यंत साफ्ट होती है ,इस प्रकार का आरोप हिन्दुओं पर लगाना गलत और अन्याय पूर्ण है

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  5. himawant

    अमेरिका भी एक धर्म-निरपेक्ष देश है. लेकिन वहां की न्याय व्यव्स्था, विदेश नीति एवम अन्य राष्ट्रिय एवम अंतराष्ट्रिय महत्व की सभी नीतियो पर चर्च का अपरोक्ष नियंत्रण रहता है. अमेरिकी सरकार का गुरु वाक्य एवम निर्देशक सिद्धांत यह है की IN GOD WE ट्रस्ट. फिर हम क्या कर रहे है.

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  6. आर. सिंह

    R.Singh

    मुस्लिम देशों की बात तो मैं नहीं करता,पर तथाकथित इसाई देशों में तो मैंने धर्म के नाम पर कटुता नहीं देखी है.उन देशों में इसाई मतावलम्बी ज्यादा हैं तो गिरिजाघरों की संख्या भी अधिक है,पर उन देशों में मंदिर,मस्जिद और गुरुद्वारे भी हैं.कनाडा के एक भाग में तो ऐसा लगता है की वहां सिक्ख मतावलम्बियों की धाक ईसाईयों से भी ज्यादा है.अतः आप ये नहीं कह सकते हैं की केवल भारत में ऐसा होता है वैसा होता है.पर धर्म निरपेक्षता के मामले में मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ की धर्म निरपेक्षता का मतलब सर्व धर्म सम्मान होना चाहिए न की अधार्मिकता?इस मामले मैं महात्मा गाँधी के विचारों को मैं सर्वोपरि मानता हूँ.आवश्यकता है चरित्र विकास और सच्चरित्रता की .वह चाहे जिस तरीके से आये मान्यता केवल उसी तरीके या पद्धति को मिलनी चाहिए.

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  7. RAMESH KESHARWANI

    बधाई वकील साहब आपने धर्म बनाम धर्मनिरपेक्षता को बहुत ही सुंदर ढंग से स्पष्ट किया है वास्तव में बिना धर्म के पालन किये धर्मनिरपेक्षता का कोई मतलब नहीं है ,विश्व शान्ति के लिए धर्म की जय हो -अधर्म का नाश हो -प्राणियों में सद्भाव हो -गो माता की जय हो -रमेश चंद केशरवानी भिलाई

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