बटेश्वर का धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास

बटेश्वर की गुझिया, खोटिया, बताशा और शकरपाला प्रसिद्ध हैं। मेले के अवसर पर यहाँ बहुत चहल-पहल रहती है। पशुमेला तीन चरणों में पूरा होता है। पहले चरण में ऊँट, घोड़े और गधों की बिक्री होती है, दूसरे चरण में गाय आदि अन्य पशुओं की तथा अंतिम चरण में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। मेला शुरू होने के एक सप्ताह पहले से ही पशु व्यापारी अपने पशु लेकर यहां पहुँचने लगते हैं।

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डा.राधेश्याम द्विवेदी
उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद की बाह तहसील में आगरा से 44 मील( 70 किमी ) और शिकोहाबाद से 14 मील( 22 किमी ) दूर स्थित ग्राम बटेश्वर अपनी पौराणिकता और ऐतिहासिकता के लिए प्रसिद्ध है। यमुनातट पर बसे इस प्राचीन गाँव का पुराना नाम शौरिपुर है। बाह से दस किलोमीटर उत्तर मे यमुना नदी के किनारे बाबा भोले नाथ का प्रसिद्ध स्थान बटेश्वर धाम है। यहां पर हर साल कार्तिक शुक्ल पक्ष दूज से बहुत बडा मेला लगता है ।
इतिहास:- बटेश्वर एक प्राचीन व गौरवशाली तीर्थ है, जिसमें सतयुग, त्रेता, द्वापर युग का इतिहास छिपा हुआ है। यहां जैन तीर्थकर भगवान नेमिनाथ की जन्मस्थली भी है। इसका उल्लेख लिंग पुराण,मत्स्य पुराण,नारद पुराण तथा महाशिवपुराण में भी है। महाशिवपुराण के अंतर्गत कोटि रुद्र संहिता के अध्याय 2 में श्लोक 19 में इस तीर्थ की चर्चा है। बटेश्वर में भदौरिया राजाओं का राज था। उनका महल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में खड़ा आज भी अपनी भव्यता की कहानी कहता है। इस महल से एक सुरंग नीचे-ही-नीचे यमुना तट के जनाना घाट को गयी थी, जहाँ रानियाँ स्नान करने जाया करती थीं। छोटी लखौरी ईंटों से बना यह किला किसी समय बटेश्वर की शान था। अब तो यह किला झाड़-झंखाड़ और घास-पात से पटा है। वर्षा के दिनों में यहाँ कभी-कभी चाँदी के सिक्के मिल जाते हैं। बटेश्वर में किसी समय गोसाइयों, बैरागियों और ब्राह्मणों की बहुत सुंदर हवेलियाँ थीं। आज वह हवेलियाँ नष्ट हो गयी हैं। बड़े-बड़े टीलों पर बसा यह ऐतिहासिक गाँव धीरे-धीरे उजड़ता चला जा रहा है। यहाँ दो-दो मंजिल के अनेक भव्य मकान खाली पड़े हैं । बटेश्वर गाँव के घर टीलों पर बने हुए हैं। यहाँ के अधिकांश कुओं का पानी खारा है। यमुना तट पर एक प्रसिद्ध प्राचीन कुआँ है, जिसे ‘भूड़ा-कुआँ कहते हैं। इस कुएँ का पानी बहुत शीतल और मीठा है। किंवदन्ती के अनुसार यहाँ पर भगवान श्री कृष्ण के पितामह राजा शूरसेन की राजधानी थी। जरासंध ने जब मथुरा पर आक्रमण किया तो यह स्थान भी नष्ट-भ्रष्ट हो गया था।बटेश्वर-महात्म्य के अनुसार महाभारत युद्ध के समय बलभद्र विरक्त होकर इस स्थान पर तीर्थ यात्रा के लिए आए थे। यह भी लोकश्रुति है कि कंस का मृत शरीर बहते हुए बटेश्वर में आकर कंस किनारा नामक स्थान पर ठहर गया था। बटेश्वर को ब्रजभाषा का मूल उदगम और केन्द्र माना जाता है।जैनों के 22वें तीर्थकर स्वामी नेमिनाथ का जन्म स्थल शौरिपुर ही माना जाता है। जैनमुनि गर्भकल्याणक तथा जन्म-कल्याणक का इसी स्थान पर निर्वाण हुआ था, ऐसी जैन परम्परा भी यहाँ प्रचलित है।
अकबर के समय में यहाँ भदौरिया राजपूत राज्य करते थे। कहा जाता है कि एक बार राजा बदनसिंह जो यहाँ के तत्कालीन शासक थे, अकबर से मिलने आए और उसे बटेश्वर आने का निमंत्रण देते समय भूल से यह कह गए कि आगरे से बटेश्वर पहुँचने में यमुना को नहीं पार करना पड़ता, जो वस्तु स्थिति के विपरीत था। घर लौटने पर उन्हें अपनी भूल मालूम हुई, क्योंकि आगरे से बिना यमुना पार किए बटेश्वर नहीं पहुँचा जा सकता था। राजा बदनसिंह बड़ी चिन्ता में पड़ गए और भय से कहीं सम्राट के सामने झुठा न बनना पड़े, उन्होंने यमुना की धारा को पूर्व से पश्चिम की ओर मुड़वा कर उसे बटेश्वर के दूसरी ओर कर दिया और इसलिए की नगर को यमुना की धारा से हानि न पहुँचे, एक मील लम्बे, अत्यन्त सुदृढ़ और पक्के घाटों का नदी तट पर निर्माण करवाया। बटेश्वर धाम के लिये एक कथा कही जाती है, कि राजा भदावर के और तत्कालीन राजा परमार के यहां उनकी रानियो ने गर्भ धारण किया, और दोनो राजा एक अच्छे मित्र थे, दोनो के बीच समझौता हुआ कि जिसके भी कन्या होगी, वह दूसरे के पुत्र से शादी करेगा, राजा परमार और राजा भदावर दोनो के ही कन्या पैदा हो गई, और राजा भदावर ने परमार को सूचित कर दिया कि उनके पुत्र पैदा हुआ है, उनकी झूठी बात का परमार राजा को पता नही था, वे अपनी कन्या को पालते रहे और राजा भदावर के पुत्र से अपनी कन्या का विवाह करने के लिये बाट जोहते रहे। जब राजा भदावर की कन्या को पता लगा कि उसके पिता ने झूठ बोलकर राजा परमार को उसकी लडकी से शादी का वचन दिया हुआ है, तो वह अपने पिता के वचन को पूरा करने के लिये भगवान शिव की आराधना यहीं बटेश्वर नामक स्थान पर करने लगी। जब राजा परमार की खबरें राजा भदावर के पास आने लगीं कि अब शादी जल्दी की जाये, उधर राजा भदावर की कन्या अपने पिता की लाज रखने के लिये तपस्या करने लगी, और उसकी विनती न सुनी जाने के कारण उसने अपने पिता की लाज को बचाने हेतु यमुना नदी मे आत्महत्या के लिये छलांग लगा दी। भगवान शिव की की गई आराधना का चम्त्कार हुआ, और वह कन्या पुरुष रूप मे इसी स्थान पर उत्पन हुई। राजा भदावर ने उसी कारण से इस स्थान पर एक सौ एक मन्दिरों का निर्माण करवाया, जो आज बटेश्वर नाम से प्रसिद्ध हैं। यहां पर यमुना नदी चार किलोमीटर तक उल्टी धारा के रूप मे बही हैं। यमुना की धारा को मोड़ देने के कारण 19 मील का चक्कर पड़ गया है। भदोरिया वंश के पतन के पश्चात बटेश्वर में 17वीं शती में मराठों का आधिपत्य स्थापित हुआ। इस काल में संस्कृत विद्या का यहाँ पर अधिक प्रचलन था। जिसके कारण बटेश्वर को छोटी काशी भी कहा जाता है। बटेश्वर के घाट इसी कारण प्रसिद्ध हैं कि उनकी लम्बी श्रेणी अविच्छिन्नरूप से दूर तक चली गई है। उनमें बनारस की भाँति बीच-बीच में रिक्त नहीं दिखलाई पड़ता। रात्रि मे जब पूजा-आरती होती है, तब घंटा, घड़ियाल और शंख आदि के स्वरों से वातावरण गुंजित हो उठता है। ‘जय शंकर’, आदि के पावन तुमुल गगनभेदी स्वरों से जनमानस को भक्तिभाव में लीन कर देनेवाले इस तीर्थ का माहत्म्य बहुत अधिक है। भदावर में लोकविश्वास है की सभी तीर्थो की यात्रा तब तक पूरी नहीं होती, जब तक की बटेश्वर में पूजा का जल न चढ़ाया जाए। आदि काल से ही बटेश्वर शिव तीर्थ रहा है ‘गर्गसहिंता’ में कहा गया है की श्रावण-शुक्ला और महाशिवरात्रि पर यमुना स्नान करने पर अक्षय पुण्य मिलता है। यह ब्रजमण्डल की चौरासी कोस की यात्रा के अंतर्गत आता है।
बटेश्वर नाथ मंदिर:-बटेश्वर नाथ मंदिर बहुत प्राचीन मंदिर है। यह भारत में महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और सांस्कृतिक केंद्र में से एक है। हिंदुओं के भगवान शिव के सम्मान में यमुना नदी तट पर स्थित बटेश्वर धाम की तीर्थयात्रा करते हैं। कुछ मंदिरों की दीवारों और छत में आज भी सुन्दर आकृतियां बनी हुई है। 22वें तीर्थंकर प्रभु नेमिनाथ शौरीपुर में पैदा हुआ थे। इस क्षेत्र के रूप में अच्छी तरह से जैन पर्यटकों को आकर्षित करती है। यमुना के तट पर एक पंक्ति में 101 मंदिर स्थित हैं जिनको राजा बदन सिंह भदौरिया द्वारा बनाया गया था। राजा बदन सिंह ने यमुना नदी के प्रवाह को जो कभी पश्चिम से पूर्व कि ओर था उसको बदल कर पूर्व से पश्चिम की ओर अर्थात् बटेश्वर की तरफ कर दिया गया था। इन मंदिरों को यमुना नदी के प्रवाह से बचाने के लिए एक बांध का निर्माण भी राजा बदन सिंह भदौरिया द्वारा किया गया था। बटेश्वर नाथ मंदिर का रामायण, महाभारत, और मत्स्य पुराण के पवित्र ग्रंथों में इसके उल्लेख मिलता है। पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) के पश्चात्त वीरगति पाने वाले मराठों को नारूशंकर नामक सरदार ने इसी स्थान पर श्रद्धांजलि दी थी और उनकी स्मृति में एक विशाल मन्दिर भी बनवाया था, जो कि आज भी विद्यमान है। शौरीपुर के सिद्धि क्षेत्र की खुदाई में अनेक वैष्णव और जैन मन्दिरों के ध्वंसावशेष तथा मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। यहाँ के वर्तमान शिव मन्दिर बड़े विशाल एवं भव्य हैं। एक मन्दिर में स्वर्णाभूषणों से अलंकृत पार्वती की 6 फुट ऊँची मूर्ति है, जिसकी गणना भारत की सुन्दरतम मूर्तियों में की जाती है।
एक शिलालेख के अनुसार 1212 अश्वनी शुक्ला पंचमी दिन रविवार को राजा परीमदिदेव ने एक भव्य मंदिर बनवाया था। अंग्रेजी इतिहासवेत्ता कनीघम ने अपनी पुस्तक ASI Report Vol.IV में लिखा है कि आगरा के ताजमहल से पहले बटेश्वर में सफेद पत्थर के दो मंदिर थे। खोज के दौरान कनीघम को मिला शिलालेख लखनऊ के म्यूजियम में अब भी सुरक्षित है। बटेश्वर गौरवशाली तीर्थ है, जिसमें सतयुग, त्रेता, द्वापर युग का इतिहास छिपा हुआ है। यहां जैन तीर्थकर भगवान नेमिनाथ की जन्मस्थली भी है। इस प्राचीन तीर्थस्थल का उल्लेख लिंग पुराण, मत्स्य पुराण, नारद पुराण तथा महाशिवपुराण में भी है। महाशिवपुराण के अंतर्गत कोटि रुद्र संहिता के अध्याय 2 में श्लोक 19 में इस तीर्थ की चर्चा है। राजा बदन सिंह भदौरिया ने आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व इस मंदिर का पुनरुद्धार कराया। आज भक्तों द्वारा कामना पूर्ति होने पर अर्पित किये गए छोटे, बड़े और विशाल घंटे इस मंदिर की विशेषता हैं, यहाँ दो किलो से लेकर अस्सी किलो तक के पीतल के घंटे जंजीरों से लटके है। गौरीशंकर मंदिर में भगवान शिव, पार्वती और गणेश की एक दुर्लभ जीवन आकार मूर्ति है साथ ही नंदी भी है, सामने दिवार पर मयूर-आसीन भगवन कार्तिकें और सात घोड़ों पर सवार सूर्य की प्रतिमाएँ है एक शिलालेख के अनुसार 1762 ई. में स्थापित शिव की एक मूर्ति में उन्हें मूछों और डरावनी अंडाकार आँखों के साथ चित्रित किया गया है। पातालेश्वर मंदिर का निर्माण,पानीपत के तीसरे युद्ध 1761 ई. में वीरगति को प्राप्त हुए हजारों मराठों की स्मृति में, मराठा सरदार नारू शंकर ने कराया था। शिव को समर्पित इस विशाल मंदिर की दीवारों पर ऊँची गुंबददार छत है तथा इसका गर्भगृह रंगीन चित्रों से सुसज्जित है। गर्भगृह के सामने कलात्मकता से चित्रित एक मंडप है इस मंदिर में एक हजार मिट्टी के दीपकों का स्तंभ है जिसे सहस्र दीपक स्तंभ कहा जाता है। मणिदेव मंदिर में आल्हा-उदल के देव मणीखे की मनहोर प्रतिमाएँ है ये प्रतिमाएँ कसौटी पत्थर की है जो पास से साधारण लगती है पर जैसे-जैसे दूर हटते जाते है तो इस में शिवलिंग व मणि दमकती जाती है। शौरीपुर के सिद्धि क्षेत्र की खुदाई में अनेक वैष्णव और जैन मन्दिरों के ध्वंसावशेष तथा मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। यहाँ के वर्तमान शिव मन्दिर बड़े विशाल एवं भव्य हैं। एक मन्दिर में स्वर्णाभूषणों से अलंकृत पार्वती की छह फुट ऊँची मूर्ति है, जिसकी गणना भारत की सुन्दरतम मूर्तियों में की जाती है। शिव के मंदिर-आज उपलब्ध मंदिरों में चार पाँच मंदिर सबसे अच्छी अवस्था में हैं।
पशुमेला-:- यहां हर साल एक बड़ा पशु मेला कार्तिक मास (अक्टूबर- नवंबर के महीने में) आयोजित किया जाता है। शिव का एक नाम पशुपति भी है, बटेश्वर का पशुमेला इसे सार्थक करता है। बटेश्वर का पशुओं का मेला पूरे भारत में प्रसिद्ध है। शरद ऋतु में दो सप्ताह तक चलने वाले इस मेले में करोड़ों रुपये की बिक्री होती है। किसी समय इस मेले में वर्मा के हाथी, पेशावर के ऊँट और काबुल के घोड़े बिकने आते थे। किंतु अब मेले ने दूसरा रूप ले लिया है, फिर भी उत्तर भारत का यह पशुओं का सबसे बड़ा मेला है। बटेश्वर की गुझिया, खोटिया, बताशा और शकरपाला प्रसिद्ध हैं। मेले के अवसर पर यहाँ बहुत चहल-पहल रहती है। पशुमेला तीन चरणों में पूरा होता है। पहले चरण में ऊँट, घोड़े और गधों की बिक्री होती है, दूसरे चरण में गाय आदि अन्य पशुओं की तथा अंतिम चरण में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। मेला शुरू होने के एक सप्ताह पहले से ही पशु व्यापारी अपने पशु लेकर यहां पहुँचने लगते हैं। मेले में पशुओं की विभिन्न प्रकार की दौड़ों का आयोजन भी किया जाता है।
यमुना की धारा- यहाँ के घाटों का जल निर्मल और बहाव तेज है। चाँदनी रात में, विशेषकर वर्षा ऋतु में यमुना की तीव्र धारा का चमकीला, बिलकुल चाँदी-जैसा दृश्य देखने अन्य स्थानों के लोग भी आते हैं। ऐसा लगता है मानो चाँदी का जल बह रहा है। सन-सन करती रात में जल-प्रवाह की ध्वनि एक विचित्र भाव उत्पन्न करती है। बटेश्वर के मंदिर सुबह के सूरज की रौशनी में यमुना में पड़ते अपने प्रतिबिम्ब से एक मोहक चित्रमाला प्रस्तुत करते है ऐसा आइना तो पास ही स्थित विश्व आश्चर्य ताजमहल के पास भी नहीं है पूरा परिदृश्य बेहद सुन्दर और शांतिपूर्ण है। बटेश्वर में यमुना नदी लगभग बारह-तेरह किलोमीटर में अंग्रेजी के S अक्षर के आकार में बहती है। उन दिनों आज की जैसी इंजीनियरिग नहीं थी, किंतु लोगों के साहस ने एक पौरुषपूर्ण ऐतिहासिक कार्य किया था। आज यमुना-तट पर पत्थर के सुंदर घाट बने हैं, जिनमें सैकड़ों लोग स्नान करते रहते हैं। यहाँ की विशेषता यह है कि यमुना ने आज भी यहाँ के घाटों को नहीं छोड़ा।
टीले कगारें- बटेश्वर के ऊँचे-ऊँचे टीले, कगारें और पौराणिक स्थल यहाँ की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं। ‘कंस कगार’ को देखकर यहाँ की पौराणिकता आज भी स्पस्ट झलकती है। ऐसा कहा जाता है कि कंस के पिता उग्रसेन ने अपने पुत्र को अशुभ नक्षत्र में जन्म लेने के कारण एक काठ के संदूक में रखकर सैनिकों को आदेश दिया कि इसे यमुना में बहा दो। सैनिकों ने नवजात शिशु कंस को नदी में बहा दिया। वह संदूक बहते-बहते बटेश्वर के इस टीले के पास आ लगा। वहाँ पर स्नान करने वाले लोगों ने उस संदूक को बाहर निकालकर देखा तो उसमें एक नवजात शिशु को किलकारी भरते पाया। एक व्यक्ति ने उस शिशु को ले लिया और पुत्रवत पालन-पोषण करने लगा। कुछ समय बाद राजा उग्रसेन बटेश्वर आये। उन्होंने उस सुंदर शिशु को जब देखा, तब उनके अंदर उसके प्रति ममत्व उत्पन्न हुआ। लोगों ने जब उन्हें पूरा किस्सा सुनाया तो उन्होंने शिशु को चूमकर गोद में ले लिया और अपने साथ मथुरा ले गये। इसी कारण इस टीले का नाम कंस टीला पड़ गया।
धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक धरोहर:- बटेश्वर ग्राम अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के संस्कृत के विद्वानों और आचार्यों की अच्छी ख्याति थी। श्रीमद्भागवत के प्रकांड पंडित आचार्यवर श्याम लालजी यहीं के निवासी थे। भदोरिया वंश के पतन के पश्चात बटेश्वर में 17वीं शती में मराठों का आधिपत्य स्थापित हुआ। इस काल में संस्कृत विद्या का यहाँ पर अधिक प्रचलन था। जिसके कारण बटेश्वर को छोटी काशी भी कहा जाता है। बटेश्वर में ही प्रसिद्ध वाजपेय यज्ञ हुआ था। यहाँ के वाजपेयी ऊँची मर्यादा के माने जाते हैं। यज्ञ-स्थल को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह पुण्यभूमि निश्चय ही प्राचीन है। वाजपेयी कुल की एक मठिया जिसे ‘गुज्जी बाबा’ की मठिया कहते हैं, यमुना के किनारे बनी है। शुभ कार्यों के समय इस कुल के लोग यहाँ दर्शन-पूजन के लिए आते हैं। दूर-दूर से लोग यहाँ शंकरजी का जलाभिषेक करने, विल्वपत्र चढ़ाने और वंदर-अर्चन करने आते हैं। वैसे प्रतिदिन प्रातः और सायं यहाँ भक्त जनों की भीड़ रहती है, किंतु सावन के सभी सोमवारों को तथा महाशिवरात्रि को तो लोगों का रेला आता है। यमुना-जल लोटे में लेकर विल्वपत्र उसमें रखकर अनेक यात्री गीले कपड़े पहने ही दर्शन करने जाते हैं। बटेश्वर में ब्रजभाषा के कई श्रेष्ठ कवि हुए हैं। यहाँ के सत्तासी वर्षीय कवि पं. अवध बिहारी ‘अवधेश’ ने अपने छंद में यहाँ का वर्णन इस प्रकार किया है:-
सेत सारी रेत की, किनारी यमुना की कारी, चंद्राकार मंदिरों की छवि अति न्यारी है।
कल-कल कालिंदी रव किंकिणी सों बाजत, विहगन के बोल मानो नुपूर धुनि प्यारी है।
पावन पुनीत यज्ञ भूमि लिए आंचल में, भूली-सी, भ्रमी-से ठाढ़ी कौन-सी विचारी है।
ग्राम है बटेश्वर कि बनबाला अलबेली किधौ ’अवधेश‘ ये नवेली ब्रजनारी है।

1 thought on “बटेश्वर का धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास

  1. Thanks a lot regarding this bateshwar as we bhadoria are the only left are belongs to this place after reading this i would like to visit this place must . thanks a lot dr radheshyam dwedi ji .

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