लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

विकास और आर्थिक सुधार के जिस नव उदारवादी पशिचमी दर्शन का महिमामंडन करने से हम अघाया नहीं करते थे, उसके दुष्परिणामों में दो चीजें साफ दिखार्इ दे रही हैं, एक अथव्यवस्था कि लाचारी और दूसरी लगातार बढ़ती मंहगार्इ। सरकार ने जो डीजल पर प्रति लीटर पांच रुपये और घरेलू गैस सैलेण्डरों की संख्या आम उपभोक्ता को एक साल में छह तक सीमित कर दी है उससे जाहिर होता है कि सरकार के पास अब जनता को राहत देने के कोर्इ उपाय शेष नहीं रह गये है। डीजल में मूल वृद्धि का असर राजनीति के साथ आर्थिक मामलों में भी दूरगामी साबित होंगे। रेल और सड़क यातायत से ढोये जाने वाले माल के किराये में भी वृद्धि होगी। इस कारण सप्ताह भर के भीतर ही उन सभी घरेलू सामानों के दाम बढ़ना लाजिमी है जिससे आम आदमी का रोजाना पाला पड़ता है। आने वाले दिनों में जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने है उन में भी यह बड़ी मंहगार्इ व्यापक असर का सबब बनेगी, जिसके दुष्परिणाम कांग्रेस को झेलने पड़ेंगे।

दरअसल सरकार अर्थव्यवस्था के सुधार के लिए जो टोटके अपनाने की पैरवी कर रही है, ये वही टोटके हैं, जिन्होंने भूमण्डलीय दर्शन से राक्षसी सुरसामुख धारण किया है। लिहाजा सरकार को आमआदमी की नहीं सिर्फ राजकोषीय घाटे से उभरने और कंपनियों को मुनाफा कमाने की छूट देने की चिंता है। इसलिए सरकार ने अब पेट्रोल की तरह डीजल और रसोर्इ गैस के दाम बढ़ा दिए है। डीजल पर जो मूल वृद्धि हुर्इ है उसमें से 3.50 रुपये तेल कंपनियों के खाते में और 1.50 रुपये सरकार के खाते में जाएंगें। सरकार आम उपभोक्ता को छह सिलेण्डर के बाद जो अन्य सिलेण्डर देगी उस पर सरकार और कंपनियों को 348 रुपये का अतिरिक्त लाभ होगा। देश की केवल 44 फीसदी आबादी छह सिलेझडर में गुजारा कर पाती है। बांकी 56 प्रतिशत आबादी बड़े मूल्य पर सिलेण्डर खरीदेगी। इससे सरकार को 5300 करोड़ अतिरिक्त आमदनी होगी।इसके बावजूद भी सरकार का कहना है कि तेल कंपनियों को 1,67000 करोड़ का नुकसान बना रहेगा। जबकि तेल कंपनीयों के त्रैमासिक लेखा जोखा से जाहिर होता है कि कंपनियों ने वैशिवक मंदी के संक्रमण दौर में भी अरबों का मुनाफा कमाया है। मुनाफे के ये तथ्य खुद पेट्रोलियम मंत्री द्वारा लोकसभा में दिए एक सवाल के जवाब में सामने आए हैं। जयपाल रेडडी ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के कर अदा करने के बाद के शुद्ध लाभ का जो ब्यौरा दिया है, उसके मुताबिक, 2010-11 में ओएनजीसी ने 18924 करोड़ रूपए का आर्इओसी ने 7445 करोड़ का, बीपीसीएल ने 1547 करोड़ का और एचपीसीएल ने 1539 करोड़ का शुद्ध लाभ कमाया है। कंपनियां अपने कर्मचारियों पर धन लुटाने के बावजूद अरबों कमा रहीं है। ऐसे में तेल कंपनियों के घाटे के तर्क बेमानी हैं। बावजूद कंपनियों ने मूल्य नियंत्रण मुकित का लाभ उठाकर एक साथ साढ़े पांच रूपए प्रति लीटर पेट्रोल के दाम भी बढ़ा दिए थे। सप्रंग-2 की यह विचित्र बिडंवना है कि तेल कंपनियों को तो दाम घटाने बढ़ाने की स्वायत्तता मिली हुर्इ है लेकिन मंहगार्इ का दोष मनमोहन सिंह सरकार को झेलना पड़ता है। भू-मण्डीलय आर्थिकी की यही लाचारी है।

यह सही है कि अर्थव्यस्था की बदहाली ने सरकार की चिंता बढार्इ है। कारण, जीडीपी दरें घटकर 5.3 फीसदी रह गर्इ है। लिहाजा साफ है सरकार के अब तक के उपाय सटीक नहीं बैठे। निकट भविष्य में भी सरकार आर्थिक सुधार का कोर्इ भी पैमाना अपनाए, सिथति सुधरने वाली नहीं है। क्योंकि सरकार को कृषि क्षेत्र की चिंता नहीं है। कृषि पर निर्भरता को दरकिनार करके उसने केवल औधोगिक क्षेत्र पर निर्भरता केंदि्र्रत की हुर्इ है। उधोगों को करोड़ो अरबों रूपये की कर माफी दी गर्इ, उधोग स्थापना में भूमि, बिजली, पानी व स्थानीय करों में भी छूटें दी जाती है, जिससे औधोगिक उत्पादनों में वृद्धी दिखार्इ देती रहे। बीते तीन साल में कारपोरेट सेक्टर को दो लाख करोड़ से ज्यादा की छूटें दी गयी थी। उत्पाद षुल्क में 4 लाख 23 हजार 294 करोड़ और सीमा शुल्क में 6 लाख 21 हजार 890 करोड़ रुपये की छूटें दी गयी हैं। यदि सरकार इनमें से किसी एक कर की वसूली उधोग सेक्टर से करने में कड़ार्इ बरतती तो आम आदमी को इस बढ़ी मंहगार्इ से जूझने की जरुरत नहीं पड़ती।

पेट्रोलियम पदार्थों का आयात जरूरी है, क्योंकि हम अपनी जरूरत का केवल 25-30 प्रतिशत तेल ही देश की तलहाटी से निकाल पाते हैं, लेकिन बीते कुछ सालों में बड़ी तदाद में खाध तेलों का भी आयात किया गया, जबकि जिन किसानों ने सोयाबीन, सरसों, अलसी, तिली और मूंगफली जैसी तिलहन फसलों का उत्पादन किया, उन्हें वाजिब दाम न मिलने के कारण न केवल नुकसान हुआ, बलिक कर्इ किसान आत्महत्या करने को भी मजबूर हुए। नतीजतन कृषि विकास दर भी गिरकर 1.7 फीसदी रह गर्इ। व्यापार घाटे को बढ़ावा देने वाली ये नीतियां आखिर किनके हित साधने के लिए अमल में लार्इ गर्इ ?

अब देशी-विदेशी पूंजीपतियों को लूट की खुली छूट नहीं मिल रही है तो इन व्यापारियों ने नया पूंजी निवेश तो रोका ही भारत में लगी पूंजी निकालना भी शुरू कर दी। जो पूंजी निकाली उसे डालर और सोना खरीदने में लगा दिया। लिहाजा डालर की तुलना में रूपये में गिरावट जारी है और सोना के भाव उछाल भर रहे है। यदि बाजार का अध्ययन करने वाली कंपनी नोमूरा द्वारा किए सर्वें को सही मानें तो भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी की देश से पिछले तीन सालों में तीन गुना से अधिक तेजी से निकासी हुर्इ है। साल 2009 में महज 3.1 अरब डालर की निकासी हुर्इ। वहीं 2010 में बढ़कर यह दोगुनी से अधिक 7.2 अरब डालर पर पहुंची और 2011 में यह राशि बढ़कर 10.7 अरब डालर पर पहुंच गर्इ। एफडीआर्इ निकालने का यह सिलसिला अभी भी जारी है। यह उदारवादी अर्थव्यवस्था की लाचारी है कि जब उसे लूट का अनुकूल वातावरण नही मिलता तो वह अपना कारोबार समटने लग जाते हैं।

घोटाले दर घोटालों का खुलासा होने के कारण अब भारत में नया विदेशी पूंजी निवेश भी नही हो रहा हैं। साल 2009-10 मे 24.1 अरब डालर का निवेश हुआ था। इसके बाद यह लगातार घट रहा है। 2011 में यह घटकर 18.32 अरब डालर रह गया था। मसलन निवेश में 32.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गर्इ थी। यही नहीं सरकार जिन-जिन क्षेत्रों में एफडीआर्इ की छुट दे चुकी है, उनमें भी नया निवेश नहीं हुआ। सरकार ने बीमा क्षेत्र में एफडीआर्इ की सीमा बढ़ाने का फैसला लिया हुआ है, लेकिन सिथति जस की तस है। खुदरा में बहु ब्रांड में निवेश का फैसला सरकार ले चुकी है लेकिन कोर्इ नया निवेश हो नहीं रहा। सरकार को पास्को में निवेश की बड़ी उम्मीद थी, लेकिन बीते पांच साल में पास्को में कोर्इ नया निवेश दर्ज नहीं हुआ। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला और अब कोयला एवं इस्पात घोटालों के उजागर होने के बाद नए निवेश की बात तो दूर रहीं कंपनीयां ही देश छोड़ कर भागने लगीं।

इस सब के बावजूद भारतीय अर्थव्यस्था सुरक्षित है तो उसकी पृष्ठभूमि में वे आर्थिक नीतियां नहीं हैं जिनका गुणगान मनमोहन-मण्डली करती रही है। बलिक आम भारतीय के वे पारंपरिक मूल्य और संस्कार हैं जो बचत और मितव्यता को संकट का साहरा मानने को बाध्य करते हैं। किंतु राष्ट्र के शिरोमणी बचत के इन पारंपरिक मूल्यों को ठेंगा दिखाते हुए शाह खर्च में लगे हैं। राष्ट्रपाति प्रतिभा देवी पाटिल ने अपने कार्यकाल में जहां 12 बार विदेश यात्राओं पर 205 करोड़ रूपये खर्च किए, वहीं मीरा कुमार ने तीन साल के भीतर 29 विदेशी यात्राओं पर 10 करोड़ खर्च किये। योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेकसिंह अहलूवालिया ने विदेश यात्राओें पर 2.34 करोड़ रूपए खर्च किए। यह वही अहलूवालिया हैं जो 29 रूपए से ज्यादा खर्च करने वाले शहरी गरीब और 23 रूपए से ज्यादा खर्च करने वाले ग्रामीण को गरीब नहीं मानते। यही लोग योजना आयोग के दफ्तर में मात्र 2 शौचालयों का आधुनिकीकरण करने में 35 लाख रूपए और इन्हें स्मार्ट कार्ड से जुड़ी सुरक्षा प्रणाली से जोड़ने पर 5.19 लाख रूपए खर्च आसानी से कर देते हैं। क्रिकेट की जो आर्इपीएल टीमें अनैतिकता और अय्याशी का पर्याय बनी हुर्इ हैं, उन्हें सरकार मनोरंजन कर में छूट दे रही है। जबकि इन टीमों के मालिक मुकेश अंबानी और विजय माल्या जैसे कारोबारी है। अर्थशास्त्री अर्मत्य सेन ने अपने एक लेख में लिखा है कि सरकार हीरा और सोने पर सीमा शुल्क में सालाना 50 हजार करोड़ रूपए की छूट दे रही है, जबकि जो प्रस्तावित खाध सुरक्षा विधेयक है यदि उस पर अमल किया जाता है तो महज 27 हजार करोड़ रूपए सालाना खर्च बैठेगा। सरकार जिस राजकोषिय घाटे का रोना रो रही है, वह 521980 करोड़ रूपए का है। मसलन सकल घरेलू उत्पाद का 5.9 फीसदी। लेकिन सरकार ने इसी बजट सत्र में जो दस्तावेज पेश किए हैं उन्हें सही माने तो इसी साल सरकार द्वारा उधोगपतियों का बकाया कर राजस्व 529432 करोड़ रूपए माफ किया है। यानी राजकोषिय घाटे से भी करीब 8000 करोड़ रूपए से भी ज्यादा। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की यही वे आर्थिक विषंगतियां हैं जिनके चलते अर्थव्यवस्था लाचारी की गिरफत में आर्इ।

आर्थिक मंदी के संकट से जूझ रही सरकार क्यों नहीं सांसदो और नौकरशाहों के वेतन भत्तों में कटौती का कड़ा निर्णय लेती। क्यों नहीं सरकार जिन उधोगपतियों पर बैंको का हजारों करोड़ रूपये कर्ज और हजारों करोड़ रूपये करों के बकाया हैं, उन्हें वसूलने में अपनी सख्ती दिखाती ? दरअसल इनका सीधा सरकार में दखल हैं। लिहाजा पूंजीपतियों के आगे नतमस्तक सरकार डीजल, कैरोसिन और रसोर्इ गैस पर सबिसडी खत्म करके गरीब के पेट पर लात मारने की हिम्मत जुटाने का दम भर पा पा रही है।

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