लेखक परिचय

संजीव कुमार सिन्‍हा

संजीव कुमार सिन्‍हा

2 जनवरी, 1978 को पुपरी, बिहार में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कला और गुरू जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर की डिग्रियां हासिल कीं। दर्जन भर पुस्तकों का संपादन। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन। पेंटिंग का शौक। छात्र आंदोलन में एक दशक तक सक्रिय। जनांदोलनों में बराबर भागीदारी। मोबाइल न. 9868964804 संप्रति: संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

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  • गत 4 सितम्‍बर को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों को आरक्षण देने के प्रावधान वाले प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। 
  • प्रस्तावित विधेयक में संविधान के कम से कम चार अनुच्छेदों में संशोधन किया जाएगा ताकि सरकार एससी.एसटी को पदोन्नति में आरक्षण दे सके। 
  • उच्चतम न्यायालय ने गत 28 अप्रैल को उत्तर प्रदेश में पूर्ववर्ती मायावती सरकार के फैसले को रद्द कर दिया था जिसके बाद बसपा अध्यक्ष ने संसद में यह मुद्दा उठाया। इस मुद्दे को लेकर संसद के मौजूदा और पिछले सत्र में भी हंगामा देखा गया था।
  • समाजवादी पार्टी ने इस पर विरोध जताया है। मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत कई दलों के नेताओं ने सुझाव दिया कि सरकार को जल्दबाजी में फैसला नहीं लेना चाहिए और सभी पक्षों पर सावधानी से विचार करने के बाद ही संवैधानिक संशोधन विधेयक लाना चाहिए। जदयू अध्‍यक्ष शरद यादव ने कहा कि इस तरह का प्रस्ताव पहले ही उनके पार्टी की सरकार वाले बिहार में लाया जा चुका है और वह इसके समर्थक हैं। 
  • सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को आरक्षण देने संबंधी विधेयक को सरकार ने 5 सितम्‍बर को राज्यसभा में प्रस्‍तुत कर दिया। हालांकि इस विधेयक को सदन में पेश करने के दौरान जमकर हंगामा हुआ। इस विधेयक को प्रस्‍तुत करने के दौरान गतिरोध बढ़ने पर कार्यवाही को स्‍थगित कर दिया गया। सदन में हंगामे के दौरान आरक्षण बिल को लेकर सपा और बसपा सांसदों के बीच जमकर बहस हुई और दोनों दलों के नेताओं में हाथापाई भी हुई। 

आरक्षण के मसले पर भारत आजादी के बाद से ही सामाजिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है और अब पदोन्‍नति में आरक्षण का प्रावधान हो रहा है। आपको क्‍या लगता है कि इस प्रावधान से समाज सशक्‍त होगा या फिर सामाजिक सौहार्द टूटेगा? अपने विचार प्रस्‍तुत कर इस परिचर्चा को आगे बढ़ाएं।

12 Responses to “परिचर्चा : पदोन्नति में आरक्षण”

  1. amarjit kumar

    दोस्तो, मेरा मानना है कि आज भी दलित वर्ग मुख्य धारा से कटा हुआ है, सरकार लाख दाबे करे पर आज भी उसका बेटा भुखे सोने को मजबुर है,बदन पर कपडा नही, बीमार को द्वा नही, सर पर छत नही, आने जाने को सड्क नही, जिसके लिये बिजली सपना है, मै अपना अनुभब व्यान कर रहा हुन. जब हमारी पोस्टिंग अक छोटे से अंचल मे थी. इंडीया और भारत का अंतर मीलो का है इसलिये मै अनुभव करता हुन की पदोन्नति के साथ- साथ प्राइवेट सेक्टर मे भी अमेरीका के तर्ज पर रिजर्वेशन मिलना चाहिए. और तब तक मिलना चाहिये जब तक भारत और इंडिया मे कुछ इंच का फासला रहे.

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  2. अभिषेक पुरोहित

    abhishek purohit

    नहीं होना चाहिए |अभी हमारी भर्ती वरिष्ठता सूचि जारी कि गयी थी बहुत से जो मेरे आगे थे वो ओ बी सी जनरल गर्ल्स एस सी एस टी वाले पीछे हो गए क्या करें मेरिट मेरिट होती है |जब चयन हो गया है सब बराबर हो गए है फिर काहे का झगड़ा??हालाकि बराबर तो पहले भी थे जब एक साथ इंजीनियरिंग किये थे एक ही एक्जाम १२ वि दिए थे १० दिए थे पर वो क्या है न राजनीति तो राजनीति है |पहले कही भी सलेक्शन के लिए न कोई एक्जाम होते थे न ही कोई आयोग था जो राजा कि मर्जी आई वो चयनित तो वैसी व्यवस्था अब है नहीं अत रिजर्वेशन का कोई औचित्य भी नहीं है क्लास रम में पढने व् पढ़ाने पर कोई पाबन्दी नहीं है फिजिक्स पढ़ाने वाला ये कंडीशन नहीं लगाता है कि बामन ही फिजिक्स समझ सकता है |

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    • k c pippal

      आरक्षण प्रमोशन में हो या न हो यह एक पुरानी बात है लेकिन सवाल यह उठता है कि जिन्होंने इसका समर्थन किया है वे क्या राजनीतिक लोग हैं या विद्यार्थी हैं या नौकरी पेशा लोग हैं ?
      यदि राजनीतिक लोग बोलते है तो आलोचना के पात्र बन सकते हैं , यदि स्टूडेंट बोलता है तो वह सही बोलेगा।
      में यह बात ईमानदारी से कह सकता हूँ कि सामान और सर्व शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त किए विना आरक्षण की जरूरत पड़ती रहेगी। उदाहरण के लिए मुस्लिम शासन से पहले कायस्थ जाती का सामाजिक स्तर गिरा हुआ था उसके बाद शिक्षा के बल पर उन्होँने ब्राह्मणों को भी पछाड़ दिया था।
      आज बिना आरक्षण के उन्होँने समाज और सरकारों में अपनी अलग पहचान बनाई है इसका उदाहरण स्वामी विवेकानंद जी कि पुस्तक जाति संस्कृति और समाजवाद में देख सकते हैं।

      के. सी. पिप्पल
      पूर्व आई. ई. एस.

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  3. mahendra

    Promostion me aarachhan sabhi S.c. & O.B .C ko jarror milana chahiye kyo ki savan adhikari s.c. & o.b c candidate ka pramotion karte hi nahi hai isliye adhikari ke pado par 90%savarn hai .mandal aayog ne bhi promotion me aarachhan ki sifarish ki thi lekin savarno ki chalaki ke aage ye sifarish lago na ho saki .ye sabhi s.c & o.b.c ka durbhagya raha.

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    • mahesh bashishth

      kab tab apni vishesh pahichan bana kar rakhoge?kabhi socha hai, aarakshan lene ke liye khud sapath patra par jati ghoshit karna hoti hai,jo usi samajajik vyabastha ka samarthan hai, jisake virodh par aarakshan ka prawdhan hai.
      jinake poorvaj kabhi peechhe the ,kya unki santan bhi aaj tak barabari me aakar samanta ka star prapt nahi kar payee hai,aur yadi nahi to is ki kya sambhawna hai ki bhavishya me aisa ho jayega.
      jab tak aarakshan ka labh milta rahega ,jatigat pahichan samapt nahi ho sakti,is sthiti me hame sochana chahiye ki jati pratha samapt karna hai ya phir aarakshan ke lalach me purani kathari hi orhe rahna hai

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  4. H.R.SINGH

    Sir,mene uprokt sabhi comment read kiye. -adhiktar reservation virodhi hi rahe yahan tak pada ki goli maar di jayegi lekin hum in sajjanau se yah puchhana chahate hai ki Kya kabhi socha hai ki nam ke pichhe gotra lagane ke baad parishar ka mahol badal jata hai pramotion me reservation laagoo hone se matra yadi honestly service ki jaye to fainancialy position strong hoti hai, koi social status to vishesh badal nahi jaata hai, annaji jaise log bhi curuption ke virodh mai rojana delhi mai dharana dete hai; anna ji ne cast virodhi abhiyan kabhi nahi chalaya; suno jab bhartiya mahan purush ko videsh mai aswet hone ke karan chalati train se gorau ne utardiya tha tab samajh mai aaya tha ki social unch nich ka kya matlab hota hai; log kahte hai ki working dachhyata reservation lagoo hone se prabhavit hogi to bhai sahab central govt mai cabinet sachiv se laker niche tak sachiv jo bethe hai wo vina reservation wale hai phir bhi hamara administration every stage par niche ata jaraha hai; reservation tabhi khatm ho jab naam ke pichhe gotra bhi khatm ho;No cast No reservation; if cast than reservation at every stage;Haq keliye lade hai marate dam tak ladate rahenge samman aur swabhiman ki ladai hai baat paise ki nahi hai; evrybody soche ki yah social diffrence kyo Dhanyabad sadhuvad

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    • mahesh vashishth

      sikke ke do hi pahloo hai,jab tak aarakshan milta rahega,tab tak aoni jati sapath patra par ghoshit karne ki badhyata rahegi.
      yadi samaj me samanta ki sthiti lana hai to swayam aage aakar apna swabhiman pradarshit kar aarakshn thukarana aawashyak hai,kya aarakshan ka tukda phenk kar hamein dum hilane ke liye vivash nahi kiya jat .
      socho — aur swabhiman jagao.

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  5. deepa

    भाई आप लोग चाहे कुछ भी कहे लेकिन मुझे तो पता है मेरा जातिगत वोट बैंक बडा है इसलिए मुझे आरक्षण मिलना चाहिए और बार बार मिलना चाहिए । नही तो सरकार बदलते देन नही लगेगी । यही वो शब्द है जिनके कारण आरक्षण को बढावा मिल रहा है । योग्यता को नही क्योकि इस देख की सरकार योग्यता से निर्धारित कहा होती है

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  6. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    Dr. Purushottam 'Nirankush'

    मेरा ऐसा विनम्र मत है कि किसी भी विषय पर परिचर्चा करवाने के लिए उस विषय के सभी पहलुओं को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना संपादक का नैतिक दायित्व है! इस परिचर्चा के लिए प्रस्तुत विवरण में मुझे इस तथ्य की कमी प्रतीत हो रही है! ऐसे में सार्थक और निष्पक्ष चर्चा कैसे संभव है? इसलिए इस परिचर्चा में इससे अधिक टिप्पणी करने का कोई औचित्य नहीं है!

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  7. महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

    पहले बन पद के अधिकारी फिर तुम उन्नति की बात करो

    पहले बन पद के अधिकारी फिर तुम उन्नति की बात करो
    जो बैसाखी ले कर चलते उससे ही क्यों आघात करो

    माना कि समय वो भी था जब अधिकार तुम्हारे छीने थे
    लेकिन अब वक्त नया आया क्यों हर दम वर्ण और जात करो

    पद एक मिला आरक्षण से तो फिर आरक्षण क्योंकर हो
    कर्तव्य-निष्ठा से कर्मठ कर्मों की तुम सौगात करो

    जनता की भाषा को समझो मत रोज़ करो ये आंदोलन
    तुम नेताओं के बहकावे में आ कर मत उत्पात करो

    संवैधानिक संशोधन को मत समझो एक खिलौना तुम
    स्याह को मत ख़लिश सफ़ेद करो, दिन को मत तुम यूँ रात करो.

    Dr. M C Gupta (Former Professor and Dean)
    MD (Medicine), LLM
    Advocate (Delhi Bar Council)

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    • shyamnandan sharma

      Respected Dr. gupta,
      today reservation policy has been made tool for fulfill interests of small pocket. it has been diverted. large section of needy people is still unaware about it. there is need for total change in the process that how should eligible group come under this provision. we all should think over it.

      shyamnanda sharma
      patna

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  8. विवेक रंजन श्रीवास्तव

    खण्ड खण्ड मत करो इसे घर तो यह मेरा है !

    माननीय सुप्रिम कोर्ट ने उ. प्र. में बिना वास्तविक सर्वे के ही , राजनैतिक हितो के लिये आदिम जनजाति तथा अनुसूचित जनजाति के सरकारी कर्मचारियो को विभागीय पदोन्नति में निरंतर आरक्षण का लाभ देने के सरकारी फैसले को गलत निरूपित किया है . माननीय न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिये संसद में कानून लाने की राजनैतिक चर्चा सरगर्मी पर है .देश की यह स्थिति बहुत खेदजनक है . जब संविधान बनाया गया था तब क्या इसी तरह के आरक्षण की कल्पना की गई थी ? क्या स्वयं बाबा साहब अंबेडकर यह नही चाहते थे कि दलित वर्ग के भारतीय नागरिक भी बराबरी से देश की मूल धारा में शामिल हों ?
    क्या ६५ सालो से लगातार आरक्षण के मुद्दे का राजनैतिक उपयोग नही हो रहा है ? क्या जातिगत आरक्षण के आधार पर आवश्यकता से अधिक ऊपर उठे हुये दलित वर्ग को आज समाज में बेवजह हीन भावना का शिकार नही बनना पड़ता ! क्या इस तरह के एक्सलेरेटेड प्रमोशन के चलते सारे सरकारी विभागो के शीर्ष पदो पर कम दक्ष लोगो का बोलबाला नही हो गया है ? जिसके चलते सही निर्णयो की जगह राजनैतिक , व्यक्तिगत हितो वाले निर्णय नहीं हो रहे हैं ? इस सारी प्रक्रिया से देश क्या सवर्णो के प्रतिभावान व्यक्तियो को कुंठित नही कर रहा है ? क्या हम इस व्यवस्था से एक नये वर्ग संघर्ष को जन्म नही दे रहे हैं ? ऐसे ढ़ेर से सवाल हर बुद्धिजीवी के मन में कौंध रहे हैं . पर ये सारे प्रश्न , अनुत्तरित हैं !
    किसी नेता में यह साहस नही है कि वह सत्य को सही तरीके से प्रस्तुत कर जनता को विश्वास में लेकर देश को घुटन से बचावे . जो संगठन आरक्षण के विरोध में सामने आ रहे हैं वे केवल प्रतिक्रिया में उपजते हैं , उनके भी अपने निहित स्वार्थ मात्र हैं . किसी को उस आदर्श की रत्ती भर भी चिंता नही है जो संविधान की मूल भावना है . संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को जाति , धर्म , वर्ग , क्षेत्रीयता से हटकर बराबरी का दर्जा देता है , पर जिस तरह का शासन देश में चल रहा है , क्या उसके चलते आज से सौ बरस बाद भी ऐसी आदर्श बराबरी की कल्पना हम आप कर सकते हैं ?
    क्षुद्र स्वार्थो के चलते राज्य विखण्डित किये जा रहे हैं , सरकारी तंत्र में नये नये विभाग , निगम , मण्डल और कंपनियां बनाकर अपने लोग बैठाये जा रहे हैं ! उपर से तुर्रा यह है कि राजनेता ऐसी हर विखण्डन की कार्यवाही को विकास से जोड़कर जनहित में बताते हैं , और हम सब मौन सुनने को बाध्य हैं . लोकतंत्र के नाम पर सरकारें बनाने , सरकारें चलाने के लिये छोटे छोटे दल राजनैतिक सौदेबाजी , निगोशियेशन , पैकेज डील को सही निरूपित कर रहे हैं . खुले आम बहुमत जुटाने के लिये विधायको सांसदो की खरीद फरोक्त हो रही है ! राष्ट्रपति जैसे पद तक के लिये सरेआम उम्मीदवार का चयन सार्वजनिक रूप से जाति के आधार पर किया जाना बहुत दुखद है , कम से कम हर उस भारतीय के लिये जो प्रत्येक भारतवासी को समान मानता हो . यदि कोई बाबा रामदेव या केजरीवाल की तरह संसद में बैठे लोगो के विरुद्ध कोई अंगुली भी उठाता है तो ये ही लोकतंत्र के पुजारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को तिलांजली देकर उसके विरुद्ध हर संभव जांच प्ररंभ करने को भी सही सिद्ध करने से बाज नही आते .
    मैं केवल एक तटस्थ शुद्ध भारतीय नागरिक की हैसियत से सोचने की अपील करना चाहता हूं , जब आप यह भूलकर कि आप किस जाति , संप्रदाय या पार्टी के हैं , विशाल हृदय और सार्वभौमिक दृष्टि से सोचकर नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत पर मनन करेंगे तो आप भी वही निर्णय लेंगे जिसकी झलक सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले में ध्वनित होती है . यह सही है कि न्यायालयीन फैसला संवैधानिक नियमो की धाराओ , उपधाराओ में बंधा हो सकता है , पर एक कानून न जानने वाला मेरे जैसा साधारण देश प्रेमी नागरिक जो केवल इंसान हो यही कहेगा कि आरक्षण से खण्ड खण्ड मत करो इसे , घर तो यह मेरा है !

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  9. mahendra gupta

    यह सौहार्द तो अब टूटना ही है,समझ नहीं आता कि जब आरक्षण से नियुक्ति हो गयी तब पदोन्नति क्रम वार मिलती ही है,अर्थात अब नियुक्ति के बाद सब सामान हो गए,फिर आरक्षण कि जरूरत कहाँ और कैसे रह गयी.
    सिद्धांत कि बात तो यह है कि समानता लेन के लिए एक वयक्ति को केवल एक बार आरक्षण मिले पर यहाँ तो बार बार मिल कर भी संतुष्टि नहीं.स्कूल में प्रवेश में आरक्षण,छात्रवार्ति में आरक्षण ,किसी professional शिक्षा में बैठने,पास होने और सरकारी सेवा में नियुक्ति मदें आरक्षण,और अब पदोन्नति में आरक्षण, आश्चर्य है ऐसे लोगों पर जो इस प्रकार के कानून बना कर देश का बंटाधार करने पर तुले हैं.समाज को बाँटने का परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा,समाज में असंतोष जब उठेगा तो लोग इन नेताओं को गोली मारनेमें भी नहीं हिचकेंगे, आज के युवा वर्ग में उठ रहे आक्रोश को सरकार और सडिअल नेताओं ने समझा नहीं है,और हिंसा की भाषा से जब युवा समझाएगा तब ही कोई अक्ल आएगी.

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