राजनीतिक पार्टियां के चंदे का फंडा – अफरोज आलम ‘साहिल’

हमारे देश में जितनी भी राजनीतिक पार्टियां हैं, उन्हें अपना जनसेवा और राजनीति का कारोबार चलाने के लिए पैसा चाहिए। और पैसा भी खूब चाहिए। जलसा, सम्मेलन, चुनाव और प्रचार में उड़ते…

fistful-moneyहमारे देश में जितनी भी राजनीतिक पार्टियां हैं, उन्हें अपना जनसेवा और राजनीति का कारोबार चलाने के लिए पैसा चाहिए। और पैसा भी खूब चाहिए। जलसा, सम्मेलन, चुनाव और प्रचार में उड़ते विमान-हेलीकॉप्टर, धरना, प्रदर्शन, रैली हर चीज़ पैसे से ही चलती है। इसके लिए ये पैसा चाहे जहां से मिले, बस मिले। यह कहां से आता है। कौन देता है। इससे पार्टी को कोई मतलब नहीं। और वैसे भी पैसे की न कोई पार्टी होती है न विचारधारा। पैसे के मामले में किसी को किसी से कोई भेदभाव, परहेज़ नहीं। पार्टियां हाथ फैलाए खड़ी हैं और देने वाला खुशी-खुशी दिए जा रहा है।

आखिर ये देने वाला दानी कौन है। इस बात से जनता वाकिफ नहीं है। पर सूचना क्रांति के इस युग में वर्तमान भारत सरकार ने शायद गलती से ही सही जनता के हाथों में सूचना के अधिकार के रूप में एक ऐसा हथियार मुहैया करा दिया जो बही-खातों और फाइलों के बीच के घपलों को जनता के बीच लाकर इन तथाकथित जन-सेवकों की असलियत जनता के सामने रखने लगी है। इसने अब तथाकथित जनसेवकों के चेहरों का नकाब उतारना शुरू कर दिया है। सूचना के अधिकार के माध्यम से राजनीतिक पार्टियों का जो सच सामने आया है, वह चौंकाने वाला है।
भारत निर्वाचन आयोग के जानकारी के मुताबिक इस देश में 7 नेशनल पार्टी, 41 स्टेट पार्टी और 949 रजिस्टर्ड अन-रिकोगनाईज्ड पार्टियां हैं। जिनमें से सिर्फ 18 पार्टियों ने वर्ष 2007-08 में फॉर्म 24-ए भरा है। जबकि वर्ष 2004 से लेकर 2007 तक फॉर्म 24-ए भरने वालों की संख्या 16 रही है। फॉर्म 24-ए नहीं भरने वालों में रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल, रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, करुणानिधि के नेतृत्ववाली डीएमके, शिबू सोरेन का झारखंड मुक्ति मोर्चा, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, आरएसपी, तृणमूल कांग्रेस, पीडीपी, नेशनल कांफ़्रेंस और फ़ॉरवर्ड ब्लॉक जैसी पार्टियां शामिल हैं।

यही नहीं जिन पार्टियों ने फॉर्म 24-ए भरा है, उनके दानदाताओं की सूची भी काफी चौंकाने वाली है। कई माईनिंग कंपनियां, प्रापर्टी-रियल एस्टेट कंपनियां, ट्रस्ट, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशंस, निर्यातक व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ-साथ शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले प्राइवेट स्कूल व शैक्षणिक संस्थान भी दानदाताओं की सूची में शामिल हैं।

राजनीतिक पार्टियों के दानदाताओं की सूची न सिर्फ विचलित करने वाली है, बल्कि कई संवेदनशील सवाल भी खड़े करती हैं। इस सूची में देखा गया कि कई औद्योगिक घराने और व्यापारिक प्रतिष्ठान व समूह जैसे आदित्य बिड़ला समूह से संबंधित जनरल इलेक्टोरल ट्रस्ट, वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड, गोवा की डेम्पो इंडस्ट्रीज वीएस डेम्पो, डेम्पो माइनिंग, सेसा गोवा, वीएम सालगांवकर एंड ब्रदर्स आदि ने भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों को चंदा दिया है।

पार्टियों को मिले चंदे पर नज़र डालें तो कुछ पार्टी तो करोड़ों रूपए लेकर काम करती नज़र आती हैं लेकिन कुछ दल ऐसे हैं जिनको मिले चंदे की ओर नज़र डालें और फिर उनके खर्चों पर तो लगता है कि मामला आमदनी अठन्नी, खर्चा रूपइया जैसा है।

मसलन, समाजवादी पार्टी को वर्ष 2007-08 के दौरान केवल 11 लाख रूपए मिले, इन्हें चंदा देने वाले केवल तीन लोग हैं जिनमें से दो संस्थाएं हैं। एआईएडीएमके को इस वित्तीय वर्ष में केवल 1.08 लाख रूपए चंदा मिला है। जनता दल (यूनाईटेड) भी सिर्फ एक ही व्यक्ति की कृपा पर चल रही है। इस वित्तीय वर्ष में पार्टी को सिर्फ 21 लाख रुपये मिले हैं और यह दान वसंतकुंज, नई दिल्ली के श्री रवेन्द्रण एम.नायर ने दिया है। शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी भी 3 लोगों के रहमो-करम पर चल रही है। वीडियोकॉन ने पार्टी को एक करोड़ दिया है, तो श्री गिरीष गांधी ने 2 लाख तथा शार्पमाइंड मार्केटिंग प्राईवेट लिमिटेड ने 25 हज़ार।

कांग्रेस, सीपीएम, भाजपा, सपा जैसे बड़े बड़े दलों को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों से नाममात्र चंदा मिला है जबकि कांग्रेस और भाजपा को गोवा जैसे छोटे से राज्य से पर्याप्त पैसा मिला है।
और तो और, गोवा के अधिकतर दानदाता ऐसे हैं जो दोनों ही दलों को मोटा चंदा देते रहे हैं। ये दानदाता बिल्डिंग, कंस्ट्रक्शन और खनन से जुड़ी हुई संस्थाएं हैं। शिवसेना को भी चंदा देने वाले अधिकतर लोग बिल्डर या बड़े व्यावसायिक उपक्रम चलाने वाले लोग हैं।

माया की मोह में किसी व्यक्ति का रमना और फंसना कोई नई बात नहीं है। लेकिन किसी विचारधारा की पार्टी का माया के जाल में गोता लगाना हमें विचलित जरूर करता है। भारतीय जनता पार्टी ‘पार्टी विथ द डिप्रफेंस’ का नारा देती रही है। लेकिन जब ‘सूचना के अधिकार अधिनियम-2005′ के माध्यम से राजनैतिक पार्टियों के दानदाताओं की सूची से राज खुला तो ‘पार्टी विथ द डिप्रफेंस’ की भी पोल खुल कर रह गई। विचारधारा, दृष्टिकोण और नीतियों की पार्टी अर्थात भारतीय जनता पार्टी कभी भोपाल गैस कांड के दोषी कम्पनी की घोर विरोधी थी, पर लगता है अब विरोध खत्म हो चुका है। इसलिए उसने यूनियन कार्बाइड के नए मालिक ‘डाओ केमिकल्स’ से भी वर्ष 2006-07 में एक लाख रुपया चंदा लेने में कोई परहेज नहीं किया।
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस दूध की धुली है। सच्चाई तो यह है कि ‘हमाम’ में सभी नंगे हैं, क्या कांग्रेस और क्या भाजपा?

बात अगर कांग्रेस की करें तो पार्टी से जुड़े लोग दिल खोल कर चंदा देते हैं और खूब देते हैं। खुद सोनिया गांधी ने दो वर्षो में 67467 रुपये और डा. मनमोहन सिंह ने 50 हजार रुपये चंदा दिए हैं। इसके अलावा पिछले वर्ष इनके दानदाताओं में पब्लिक स्कूलों की भी अच्छी खासी तादाद है। वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज लिमिटेड द्वारा वर्ष 2007-08 में 2 करोड़ और पिछले वर्ष एक ही दिन 50-50 लाख के 6 अलग-अलग चेक देना, आदित्य बिड़ला समूह का वर्ष 2007-08 में 25 लाख एवं पिछले वर्ष 10 करोड़ तथा वीडियोकॉन द्वारा वर्ष 2007-08 में भारतीय जनता पार्टी को 2 करोड़ 50 लाख का चंदा दिया जाना कुछ सवाल तो खड़े करता ही है।

उद्योगपति, व्यवसायी व बिल्डर माफिया तो इन राजनैतिक पार्टियों को परंपरा के मुताबिक हमेशा से चंदा देते आए हैं, पर अब अकीक एजुकेशन सेन्टर का सच हमारे सामने है, जहां न कोई शिक्षा है और न ही शिक्षा देने वाला कोई शिक्षक और न ही उसकी हालत चंदा देने लायक है। ये तो एक साधारण सा घर है। पर इसने भाजपा को एक ही बार में नौ चेकों की मदद से 75 लाख रुपये दे डाले। इसके पिछले वर्ष भी यह 66 लाख रुपये चंदा भाजपा को दे चुकी है।

दिलचस्प बात यह है कि भाजपा के नियमित दानदाता बहुत कम हैं। अर्थात जो एक बार दे दिया दुबारा देना मुनासिब नहीं समझता। पार्टी के अपने लोग भी चंदा देने में पीछे ही हैं। पार्टी ज्यादातर अपना चंदा देश भर के बिल्डर और उससे जुड़े उद्योगों, व्यापारियों और एजुकेशन सेन्टर से ही प्राप्त करती है। यदि कभी सच सामने आ सके तो यह जानना दिलचस्प होगा कि जिस-जिस साल में जो बड़ा व्यापारी चंदा देता है, वह उस साल क्या फायदा हासिल करता है..?

ये ऐसे सवाल है। जिनका जवाब शायद अभी न मिले, लेकिन जनता के बीच यह आंकड़े पहुंचा देना ही सूचना के अधिकार की सबसे बड़ी जीत है। बात यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि इनके अलावा भी अंदरूनी तौर पर न जाने कितने चंदे हासिल किए जाते होंगे, जिसका अंदाजा लगाना हमारे व आपके बस की बात नहीं।

फॉर्म 24-ए क्या है?
रिप्रेज़ेंटेशन ऑफ़ पीपुल्स एक्ट (1951) में वर्ष 2003 में एक संशोधन के तहत यह नियम बनाया गया था कि सभी राजनीतिक दलों को धारा 29 (सी) की उपधारा-(1) के तहत फ़ार्म 24(ए) के माध्यम से चुनाव आयोग को यह जानकारी देनी होगी कि उन्हें हर वित्तीय वर्ष के दौरान किन-किन व्यक्तियों और संस्थानों से कुल कितना चंदा मिला.
हालांकि राजनीतिक दलों को इस नियम के तहत 20 हज़ार से ऊपर के चंदों की ही जानकारी देनी होती है.

वर्तमान लोकसभा में पहुँचनेवाले उन दलों की सूची जिन्होंने अभी तक चुनाव आयोग को अपने चंदों का ब्यौरा नहीं सौंपा है:-
राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, बीजू जनता दल, शिरोमणि अकाली दल, पक्कलि मक्कल काटची, झारखंड मुक्ति मोर्चा, डीएमके, लोक जनशक्ति पार्टी, ऑल इंडिया फ़ॉरवर्ड ब्लॉक, जनता दल (सेक्यूलर), राष्ट्रीय लोकदल, आरएसपी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ़्रेंस, केरल कांग्रेस, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन, तृणमूल कांग्रेस, भारतीय नवशक्ति पार्टी, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, मिज़ो नेशनल फ़्रंट, मुस्लिम लीग केरल स्टेट कमेटी, नगालैंड पीपुल्स फ़्रंट, नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया, सिक्किम डेमोक्रेटिक पार्टी.

अबतक ब्यौरा सौंपने वाले दल:
• भारतीय जनता पार्टी
• भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
• मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी
• इंडियन नेशनल कांग्रेस
• नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी
• एडीएमके
• समाजवादी पार्टी
• जनता दल (युनाइटेड)
• तेलगू देशम
• एमडीएमके
• शिवसेना
• असम युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट
• मातृभक्त पार्टी
• राष्ट्रीय विकास पार्टी
• भारतीय विकास पार्टी
• मानव जागृति मंच
• भारतीय महाशक्ति मोर्चा
• समाजवादी युवा दल
• सत्य विजय पार्टी
• थर्ड व्यु पार्टी
• जनमंगल पक्ष
• लोकसत्ता पार्टी

फॉर्म 24-ए भरने वाले पार्टियों का विवरण:-

क्र.सं.

राजनीतिक दल

2004-05

2005-06

2006-07

2007-08

1.

भारतीय जनता पार्टी

34,15,46,289

3,61,56,111

2,95,70,672

24,96,23,653

2.

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया

6,30,000

40,33,690

12,69,000

41,25,800

3.

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (Marxist)

8,96,355

5,50,000

11,24,719

72,26,116

4.

इंडियन नेशनल कांग्रेस

32,05,55,643

5,96,63,692

12,07,73,413

7,89,74,701

5.

ए.आई.ए.डी.एम.के.

6,25,000

5,50,000

10,00,000

1,08,000

6.

समाजवादी पार्टी

1,12,94,044

3,01,001

6,57,000

11,00,000

7.

जनता दल (यूनाईटेड)

31,70,890

4,70,000

50,000

21,00,000

8.

तेलगू देसम

1,53,47,692

6,75,005

18,25,004

61,89,121

9.

एम.डी.एम.के.

4,10,000

———-

4,25,000

———-

10.

शिव सेना

4,09,40,000

5,95,000

2,07,000

43,35,000

11.

असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट

———-

1,05,000

60,000

21,73,000

12.

मात्र भक्ता पार्टी

45,50,000

1,10,99,000

3,01,000

———-

13.

राष्ट्रीय विकास पार्टी

3,89,60,602

2,10,85,502

———-

3,00,000

14.

भारतीय विकास पार्टी

1,07,000

———-

———-

———-

15.

मानव जागृति मंच

1,70,000

———-

———-

———-

16.

भारतीय महाशक्ति मोर्चा

14,520

30,120

28,340

———-

17.

समाजवादी युवा दल

60,000

2,76,000

———-

———-

18.

सत्य विजय पार्टी

———-

33,24,000

53,58,355

50,55,500

19.

थर्ड व्यू पार्टी

———-

1,00,000

———-

3,00,000

20.

जनमंगल पक्ष

———-

———-

9,95,965

———-

21.

लोक सत्ता पार्टी

———-

———-

80,40,001

3,42,56,000

22.

नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी

———-

———-

———-

1,02,25,000

23.

जागो पार्टी

———-

———-

———-

23,20,000

24.

ए.डी.एस.एम.के.

———-

———-

———-

1,16,300

25.

हरियाणा स्वतंत्र पार्टी

———-

———-

———-

42,000

 – अफरोज आलम ‘साहिल’

4 thoughts on “राजनीतिक पार्टियां के चंदे का फंडा – अफरोज आलम ‘साहिल’

  1. साहिल भाई…. राजनीतिक पार्टियों को यह बात बताईए कि उन्होनें कहां-कहां से चंदा लिया है। इस अभियान को और तेज़ किजीए। मैं सदा आपके साथ हूं।

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