लेखक परिचय

अम्बा चरण वशिष्ठ

अम्बा चरण वशिष्ठ

मूलत: हिमाचल प्रदेश से। जाने माने स्‍तंभकार। हिंदी और अंग्रेजी के अनेक समाचार-पत्रों में अग्रलेख प्रकाशित। व्‍यंग लेखन में विशेष रूचि।

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अम्‍बा चरण वशिष्‍ठ 

दैनिक भास्‍कर (अगस्‍त 10) में ”असम दंगों से जुड़े पूर्वाग्रह” शीर्षक से छपे श्री राजदीप सरदेसाई के लेख से तो उनके अपने ही पूर्वाग्रह की पोल खुलती है। यह ठीक है कि जब भी गुजरात दंगों की चर्चा उठती है तो विरोधी 1984 के सिख-विरोधी दंगों की याद दिला देते है। यह भी सच है कि सिख-विरोधी दंगों का कारण गुजरात के दंगे सही नहीं बन जाते। पर यह कहां का न्‍याय और तर्क है कि हम हर बार गुजरात दंगों पर तो अपनी छाती पीटते रहें पर सिख दंगों पर अपनी चुप्‍पी साधे रहें जिन से त्रस्‍त लोगों को आज तक न्‍याय नहीं मिल सका है? पर राजदीप सरदेसाई सरीखे ‘सैकुलर’ महानुभाव अपने इस रवैयये पर गर्व करते हैं। मैंने दो वर्ष पूर्व अपने ब्‍लाग में लिखे लेख में कहा था कि हमारे ‘सैकुलर’ महानुभावों को सिख दंगे ‘सैकुलर’ लगते हैं और गुजरात दंगे ‘साम्‍प्रदायिक’। इसीलिये गुजरात दंगों की याद आते ही उनके दिल से खून बहने लगता है और सिख दंगों पर उन्‍हें सकून मिलता हैा इसीलिये उन्‍होंने कभी नहीं कहा और लिखा कि सिख दंगों में संल्लिप्‍त अपराधियों को भी कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाये जैसे कि वह गुजरात के लिये जब भी समय मिलता है कहते हैं।

असल में गुजरात दंगों से जुड़ा एक सन्‍दर्भ उनकी दुखती रग भी बन चुका है। राजदीप देसाई तब एनडीटीवी में थे और उन्‍होंने गुजरात दंगों पर बड़ा बावेला खड़ा किया था। 2003 के विधान सभा चुनाव में जब नरेन्‍द्र मोदी विजयी रहे तो वह उनका सक्षात्‍कार लेने वालों में पहले व्‍यक्ति थे। मैंने वह साक्षात्‍कार स्‍वयं लाइव देखा था। उन्‍होंने मोदी से प्रशन किया कि जिन जिलों में तो दंगे हुये वहां आपको अधिक मत मिले और जो शान्‍त थे वहां कम। उत्‍तर में मोदी ने कहा कि इससे पहले कि मैं आपके प्रश्‍न का उत्‍तर दूं आप पहले जनता से क्षमा मांगिये क्‍योंकि जब मैं कहता था कि दंगे कुछ ही जि़लों में हुये और बाकी गुजरात शान्‍त था तो आप कहते थे कि नहीं पूरा गुजरात ही दंगों की आग में जल रहा है पर अब आप स्‍वयं मान रहें हैं कि सारे गुजरात में दंगे नहीं हुये। इस पर राजदीप को खिसियाना होना पड़ा था। तब से राजदीप का मोदी के प्रति रवैया और भी उग्र हो उठा है। गुजरात और सिख-विरोधी दंगों में बहुत सी समानताये हैं। दोनों ही उत्‍पादों में उकसाने-उभारने के समान कारण थे – गुजरात में गोधरा में 59 कारसेवकों को निर्मम जि़न्‍दा जला देना और 1984 में सिखों के विरूद्ध सिख अंगरक्षकों द्वारा ही तत्‍कालीन प्रधान मन्‍त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की निर्मम हत्‍या।

दोनों ही मामलों में उग्रता का शिकार हुये अल्‍पसंख्‍यक – गुजरात में अधिकतर मुस्लिम और सिख-विरोधी में केवल सिख ही और वह भी केवल दिल्‍ली और अन्‍य राज्‍यों में जहां कांग्रेस शासित सरकारें थी, बाकियों में कुछ नहीं।

यह ठीक है कि किसी भी सांप्रदायिक दंगे को मरने वालों की संख्‍या के तराज़ू पर नहीं तोला जा सकता और न जाना ही चाहिये। पर संख्‍या को नज़रअन्‍दाज़ किया जाना कहां तक उचित है? केवल दिल्‍ली में ही 3,000 से अधिक सिख मारे गये थे जबकि पूरे देश में 5,000 से अधिक। गुजरात में मरने वाले 2000 से भी कम थे जिन में हिन्‍दू भी थे।

सिख दंगों के बारे लगभग छ: आयोगों और कमेटियां बनाने और उनकी रिपोरर्टें आ जाने के बाद भी किसी के विरूद्ध कार्यवाही नहीं हुई। इन रिपोटों के अनुसार तीन दिन तक दिल्‍ली में पुलिस ने कोई मामला दर्ज नहीं किया। सेना नहीं बुलाई गई। जिन कांग्रेसियों के विरूद्ध भीड़ को भड़काने के आरोप थे उन्‍हें लोक सभा चुनाव लड़ाने के बाद मन्‍त्री बना दिया गया।

गुजरात में ऐसा नहीं। अनेकों आपराधिक मामले अदालतों ने निपटा दिये हैं। अनेकों राजनेताओं को सज़ा मिल चुकी है। अनेकों अभी भी जेल की हवा खा रहे हैं। कई ऐसआईटी बनाई गई हैं और उन पर अदालतें मुकददमों की प्रगति पर नज़र रख रही हैं। पर सिख दंगों के मामले में ऐसा नहीं किया गया। उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। दोषियों को सज़ा न के बराबर मिली है। प्रभावित लोग 27-28 वर्ष बाद भी दर दर की ठोकरें खा रहे हैं।

राजदीप सरदेसाई सरीखे लोग गुजरात दंगों के लिये नरेन्‍द्र मोदी को तो ‘अपराधी’ व ‘सांप्रदायिक’ करार दे चुके हैं क्‍योंकि वह उस समय मुख्‍य मन्‍त्री थे। पर इसी आधार पर वह स्‍व0 राजीव गांधी को ‘अपराधी’ व ‘सांप्रदायिक’ कहने से शर्माते हैं हालांकि 1984 के दंगों के समय राजीव प्रधान मन्‍त्री थे और केवल उन्‍हीं राज्‍यों में यह दंगे हुये जहां कांग्रेस का शासन था। यही नहीं, राजीव गांधी ने तो सिख दंगों को यह कह कर सही ठहराया था कि जब कोई बड़ा वृक्ष गिरता है तो नीचे की ज़मीन हिलती ही है। दूसरी ओर, नरेन्‍द्र मोदी ने तो कभी गुजरात दंगों को जायज़ नहीं ठहराया। फिर भी राजदीप सरदेसाई जैसे ‘सैकुलर व उदारवादी’ महानुभावों के लिये नरेन्‍द्र मोदी तो ‘अपराधी’ व ‘सांप्रदायिक’ हैं जबकि राजीव गांधी ‘सैकुलर’ भी और भारत रत्‍न भी। तो यह सब ‘सैकुलर’ ढोंग नहीं तो और क्‍या है?

क्‍या राजदीप सरदेसाई इस मामले पर रौशनी डाल कर हम जैसे अज्ञानियों को रौशनी दिखायेंगे?

3 Responses to “गुजरात और असम दंगों पर राजदीप सरदेसाई का पूर्वाग्रह”

  1. Anil Gupta

    गुजरात के दंगों का जिक्र करते समय केवल गोधरा कांड के बाद भड़की हिंसा का उल्लेख इस रूप में किया जाता है मनो की वहां केवल हिन्दुओं ने ही मरकत की और मुस्लमान बेचारे व निरीह बने हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहे. जबकि वास्तविकता ये है की जितनी तत्परता से मोदीजी ने गुजरात में मिलिटरी को बुलवाया और सेना की तैनाती की उतनी शायद ही किसी और दंगों में हुई हो.गुजरात में दंगों की शुरुआत सत्रहवीं शताब्दी के बाद से ही शुरू हो गयी थी और गुजरात में हिन्दू मुस्लिम दंगों की एक लम्बी श्रंखला है. २००२ के बाद से ये श्रंखला एकदम से थम गयी है. इस बारे में समाजशास्त्रिय शोध की आवश्यकता है की दंगे न होने की क्या वजह रही हैं ताकि अन्य स्थानों पर भी उन कारणों का अध्ययन हो सके. गुजरात में संभवतः सबसे भयंकर दंगे महात्मा गाँधी जन्म शताब्दी वर्ष १९६९ में हुए थे. जब कांग्रेस की सर्कार थी. खान अब्दुल गफ्फार खान उस समय पोरबंदर में गांधीजी के जन्म स्थान पर श्रद्धांजलि देने गए थे.लेकिन वो वहां दंगों में फंस गए थे और इंदिरा गाँधी जी को उन्हें सुरक्षित वापस दिल्ली लाने के लिए दिल्ली से रेस्क्यू टीम भेजनी पड़ी थी. इन दंगों में १५००० लोगों के मारे जाने की चर्चाएँ थीं. जबकि मोदी जी के शाशन में २००२ में केवल ग्यारह सौ लोग मारे गए थे.उनमे भी लगभग एक तिहाई हिन्दू थे. देश में आज़ादी के बाद से, बेहतर हो पिछले एक शताब्दी के, दंगों के बारे में विस्तृत विवरण उपलब्ध कराया जाये जिसमे ये जानकारी हो की १.कहाँ कहाँ कब दंगे हुए,२.वहां उस समय किसकी सर्कार थी,३.कितने लोग मारे गए थे,४.मरने वालों में किस किस समुदायके कितने कितने लोग थे,५.दंगों का क्या कारन था,६.क्या कोई जांच की गयी थी,७.जांच रिपोर्ट पर क्या कार्यवाही हुई,८. कितने लोगों को सजा मिली,९.उस समय की सर्कार के विरुद्ध क्या कोई कार्य वाही हुई,१०.वो दंगे गुजरात के दंगों से किस प्रकार भिन्न थे, ११. उन में से कितने दंगों के बारे में सर्वोच्च न्यायलय की निगरानी में जांच हुई,१२.२००२ के दंगों के बारे में विशेष सक्रियता क्यों दिखाई गयी,१३.मीडिया ने उन दंगों के बारे में कितना समय व स्पेस दिया,१४.२००२ के दंगों के बाद सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति के विरुद्ध उच्च न्यायालय के एक पूर्व जज द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्या न्यायाधीश महोदय को क्या पत्र लिखा है?इन प्रश्नों का उत्तर आने के बाद संभवतः सारी स्थिति साफ़ हो जाएगी.

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  2. SANDEEP panwar

    क्‍या राजदीप सरदेसाई इस मामले पर रौशनी डाल कर हम जैसे अज्ञानियों को रौशनी दिखायेंगे?

    नहीं कभी नहीं हो सकता नहीं तो इसकी हालत फ़िर से वैसी हो जायेगी जैसी नरेन्द्र मोदी का जवाब सुनकर हो गयी थी, फ़िर यह क्या करेंगा? कही कुछ ऐसा ना कर दे, जैसे खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचने लगती है।

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  3. mahendra gupta

    अब थोड़े ही दिनों बाद वे असम के लिए गोगोई की भी पीठ थपथापयेंगे,ये तो कर्णाटक के बाद अन्य राज्यों से भी उत्तर पूर्व के छात्रों का पलायन शुरू हो गया,जो कांग्रेस शासित भी हैं इसलिए कांग्रेस चुप है और अन्य दलों से सहायता की छह रखती है, अन्यथा शुरू में तो उसने कटाक्ष करने शुरू कर ही दिए थे.अब आज असम में मुस्लिम हत्यायों पर उसे कोई बुराई नहीं दिखती,यह सब गुजरात में होता तो मोदी अब तक सत्ता से बाहर होते.कांग्रेस क्र राज में यह सब सेकुलर है चाहे वह असम हो या राजस्थान ,महारास्त्र हो या आंध्र.राजदीप जैसे लोगों से निष्पक्ष पत्रकारिता की आशा की जरूर जा सकती है,पर सरकारी सहायता पर आंच कैसे आने दी जाये? उनका यह अंदाज पहले भी कई मुद्दों पर देखा सुना पढ़ा जा चूका है.सो ये कोई नई बात नहीं.

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