ऋषि दयानन्द का निर्माण स्वामी विरजानन्द की शिक्षा ने किया

मनमोहन कुमार आर्य

                ऋषि दयानन्द विश्वदिग्विजयी ऋषि हैं। उन्होंने सभी मतों के आचार्यों को शंका समाधान, वार्ता तथा शास्त्रार्थ का अवसर देकर एवं साथ ही सभी मतों के आचार्यों की शंकाओं का समाधान कर तथा 55 से अधिक शास्त्रार्थों में विजयी होकर वह विश्व गुरु दिग्विजयी विद्वान् बने हैं। उन्होंने सत्यार्थप्रकाश रूपी जो अनूठा धर्मग्रन्थ लिखा वह भी उन्हें विश्व गुरु सहित दिग्विजयी बनाता है। ऋषि दयानन्द ने अपने इस विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ में वैदिक सिद्धान्तों मान्यताओं पर तर्क युक्तियों सहित प्रकाश डाला है और प्रायः सभी विषयों पर उठने वाली शंकाओं का समाधान किया है। उन्होंने संसार के सभी मतों की समीक्षा कर उनमें अविद्या के अंश को भी सभी लोगों के सामने रखा है। उनकी समीक्षायें अकाट्य हैं जिनका समाधान विभिन्न मत-मतान्तरों के आचार्य नहीं कर पाये हैं। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के लेखन और वेद प्रचार कार्यों का उद्देश्य सत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों के आधार पर देश व संसार के लोगों को संगठित करना था जिससे सब मित्र-बन्धु-कुटुम्बियों की तरह संसार में रहते हुए एक दूसरे के दुःखों के निवारण तथा सुखों में वृद्धि करने में सहयोगी बन सकें। स्वामी दयानन्द जी को यदि समझना है तो उन्हें उनके सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, पत्र और विज्ञापन, वेदभाष्य, ऋषि जीवन चरित आदि ग्रन्थों के माध्यम से जाना जा सकता है। वह संसार में किसी मनुष्य या मत के विरोधी नहीं थे परन्तु सत्य के अवश्य ही साधक व प्रचारक थे। ईश्वर, जीव व प्रकृति का सत्यस्वरूप उन्होंने उपस्थित किया है। वह ईश्वर के सत्यस्वरूप की मनुष्यों द्वारा उपासना करने के प्रति दृण प्रतिज्ञ थे। उनका यह कार्य संसार के सभी कार्यों में सबसे महान प्रतीत होता है क्योंकि इससे मनुष्य का वर्तमान व शेष जीवन एवं मृत्यु के बाद का जीवन भी सुधरता व उन्नति को प्राप्त होता है।

                ऋषि दयानन्द को सद्ज्ञान से अलंकृत करने वाले उनके विद्यागुरु प्रज्ञाचक्षु दण्डी स्वामी विरजानन्द सरस्वती, मथुरा थे। स्वामी विरजानन्द जी ने दयानन्द जी को केवल विद्यादान दिया अपितु उन्हें देशोपकार तथा विश्व में सत्य मत के प्रचार द्वारा सुख शान्ति का विस्तार करने की प्रेरणा करने वाले भी वही थे। स्वामी विरजानन्द जी का जन्म सारस्वत ब्राह्मण कुल में पिता श्री नारायणदत्त शर्मा के घर पर अग्रेजी वर्ष 1778 ईसवी अथवा विक्रम सम्वत् 1835 के उत्तरार्ध में पौष मास में हुआ था। स्वामी विरजानन्द जी का जन्म स्थान जालन्धर नगर के करतारपुर कस्बे का गंगापुर ग्राम है। बचपन में ढाई से छः वर्ष की अवस्था के बीच आपको शीतला रोग हुआ था जिससे आपकी नेत्रज्योति समाप्त प्रायः हो गई थी। विरजानन्द जी को उर्दू-फारसी के लेखन-पठन का सम्यक् ज्ञान था। ऐसा अनुमान किया जाता है कि विरजानन्द जी की नेत्र-ज्योति उनकी 6 वर्ष की अवस्था के कुछ वर्ष बाद नष्ट हुई थी। विरजानन्द जी के पिता संस्कृत के विद्वान थे। इन्होंने अपने पिता से ही संस्कृत का आरम्भिक ज्ञान प्राप्त किया था। पिता के देहान्त से पूर्व आपने अमर-कोष कण्ठस्थ कर लिया था। सारस्वत व्याकरण को हलन्त पुल्लिंग तक साधनिका सहित आप पढ़ चुके थे। यह भी अनुमान किया जाता है कि विरजानन्द जी ने घर पर कुछ पंचतन्त्र एवं हितोपदेश भी पढ़ा था। उन्होंने जब घर छोड़ा था तो वह संस्कृत-भाषण कर लेते थे। इस समय से ही इन्होंने संस्कृत को अपने व्यवहार की भाषा बना लिया था।

                विरजानन्द जी के पिता के देहान्त के स्वल्प काल बाद माताजी का भी देहावसान हो गया था। आयु के बारहवें वर्ष में वह अपने भाई भावज के आश्रित हो गये थे। भाईभावज को इनके प्रति कर्तव्यों का निर्वाह करने में किसी प्रकार का उत्साह नहीं था। स्वामी विरजानन्द जी के जीवनीकार पं0 भीमसेन शास्त्री लिखते हैं  कि भाईभावज के दुव्र्यवहार की मात्रा बढ़ती गई। विरजानन्द जी बचपन से ही तेजस्वी, आत्मगौरव के भाव से पूर्ण और उग्र प्रकृति के थे। भाईभावज के व्यवहार से कुपित दुःखी होकर विरजानन्द जी ने अपने ग्राम गंगापुर का त्याग कर दिया था और वह ऋषिकेश पहुंच गये थे। ऋषिकेश में आपने गंगा नदी में खड़े होकर लम्बी अवधि तक गायत्री मन्त्र का जप किया। तीन वर्ष ऋषिकेश में रहते हुए आपने गंगा नदी में खड़े होकर गायत्री जप आदि कार्य किये। एक दिन आपने रात्रि में स्वप्न देखा। स्वप्न में ‘आपने सुना कि कोई कह रहा है कि तुम्हारा जो होना था हो चुका। अब तुम यहां से चले जाओ।’ इसके बाद निद्रा भंग हो गई। आपने स्वप्न पर विचार किया और ऋषिकेश से हरिद्वार आ गये।

                हरिद्वार में आपने स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती जी से संन्यास आश्रम की दीक्षा ली और साधक युवक ब्रजलाल से स्वामी विरजानन्द बन गये। स्वामी विरजानन्द जी ने संवत् 1856 से 1868 तक 12 वर्ष काशी में निवास किया। काशी से आप धर्मनगरीगयापहुंचे और वहां संवत् 1868 से 1871 तक तीन वर्ष रहे। इसके बाद आप कोलकत्ता जाते हैं और यहां सम्वत् 1872 से 1878 तक लगभग 6 वर्ष तक रहते हैं। काशी आदि स्थानों पर आपने अपने अध्ययन का विस्तार किया। कोलकत्ता से आप हरिद्वार पहुंचे थे और वहां से सोरों आकर यहां ठहरे। हरिद्वार में आप अपने संन्यास गुरु स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से भी मिले थे। ऐसा अनुमान किया जाता है कि पूर्णानन्द जी अपने शिष्य विरजानन्द जी की विद्या की उन्नति की बातें जानकर प्रसन्न एवं सन्तुष्ट हुए होंगे। स्वामी विरजानन्द जी सोरों से अलवर पहुंचे और वहां से पुनः सोरों आये। कुछ समय सोरों रुककर आप मथुरा आ गये जहां आपने सन् 1845 ईसवी में वह संस्कृत पाठशाला खोली जहां सन् 1860 में आकर स्वामी दयानन्द ने तीन वर्ष आपसे आर्ष व्याकरण एवं शास्त्रीय ग्रन्थों का अध्ययन किया था। मथुरा आने का कारण यह था कि यहां संस्कृत की अनेक पाठशालायें थी। 800 से 1200 बच्चे संस्कृत का अध्ययन करते थे। यहां अन्य स्थानों से अधिक योग्य विद्यार्थी उपलब्ध हो सकते थे। दानी महानुभाव भी यहां संस्कृत अध्यापन में सहायता देते थे। वह बालकों की पठन पाठन सहित भोजन के प्रबन्ध द्वारा सहायता करते थे। स्वामी विरजानन्द जी का लक्ष्य एक योग्य शिष्य प्राप्त करना व उसे अपनी समस्त ज्ञान-सम्पदा प्रदान करना भी था। यह सम्भावना उन्हें मथुरा में ही दिखाई दी थी। यहां आपके विद्याध्ययन काल के दो सहपाठी भी निवास करते थे जिनका आमंत्रण आपको प्राप्त होता रहता था। यही सब कारण मथुरा आकर पाठशाला खोलने व अध्यापन कराने की भूमिका बने थे।

                स्वामी दयानन्द जी योग्यतम गुरु स्वामी विरजानन्द जी के योग्य अपूर्व शिष्य थे। स्वामी दयानन्द जी के विरजानन्द जी के पास मथुरा पहुंचने की कथा का वर्णन हम पं0 भीमसेन शास्त्री के शब्दों में कर रहे हैं। इसमें स्वामी दयानन्द अपने परिवारजनों का वर्णन भी सम्मिलित है। स्वामी दयानन्द जी का जन्म टंकारा, मोरवी राज्य के वैभटदार श्री कर्षनजी तिवारी के घर फाल्गुन बदि 10 शनिवार, मूल नक्षत्र में (12-2-1825 को) हुआ था। इनका नाम मूलशंकर रखा गया था। मूलशंकर के पश्चात् इनसे दो वर्ष छोटी बहिन थी, उसकी विशूचिका से मृत्यु हो गई। मृत्यु का भयंकर दृश्य प्रथम बार देख, इनका मन सांसारिक जीवन से हट गया। भगिनी की मृत्यु के 3 वर्ष पश्चात् इनके सुहृद चाचा की मृत्यु ने इनके वैराग्य को अति दृढ़ कर दिया। इनका विवाह होने को था कि इससे कुछ दिन पूर्व सं0 1903 के प्रारम्भ में गृहस्थ-बन्धन से बचने के लिये यह घर से चले गये और योगियों को ढूंढते फिरे। सायला में नैष्ठिक ब्रह्मचारी बन ‘शुद्ध चैतन्य’ नाम पाया। कार्तिक स्नान के अवसर पर मूलशंकर सिद्धपुर पहुंचे। वहां इनके पिता ने इन्हें जा पकडा़ पर ये चौथी रात को फिर भाग गए। अनेक स्थानों पर विद्याग्रहण व राजयोग सीखते हुए सं0 1905 की ग्रीष्म ऋतु में चाणोद-करनाली में श्री पूर्णानन्द सरस्वती से संन्यास लिया और दयानन्द सरस्वती नाम पाया। छः मास तक दण्ड धारण कर विसर्जन कर दिया। वे स्थान-स्थान पर जाकर विद्याग्रहण व योग-साधना परायण रहे। सम्वत् 1910 के आरम्भ में चाणोदकन्याली में दो अच्छे योगी ज्वालानन्द पुरी तथा शिवानन्द गिरि मिले। इन्होंने स्वामी दयानन्द की परीक्षा कर इन्हें अधिकारी जान योग की उत्तम शिक्षा दी। इसके उपरान्त आबू पर्वत पर योगाभ्यास करके कुछ और भी योग तत्वों को प्राप्त करते हुए ये सं0 1911 के अन्त में हरिद्वार के कुम्भ मेले पर पहुंचे। संवत् 1912 में ज्ञान सम्पन्न योगियों व गुरुओं की खोज में केदारनाथ, बदरीनाथ आदि की यात्रा की। इस यात्रा में जोशीमठ के शंकराचार्य ने इन्हें हरिद्वार में स्वामी पूर्णानन्द सरस्वती से पढ़ने की सम्मति दी। स्वामी दयानन्द उत्तराखण्ड के पर्वतों की यात्रा से लौटकर संवत् 1912 में लगभग 108 वर्ष के अतिवृद्ध स्वामी पूर्णानन्दजी के पास पहुंचे। वे अतिवृद्ध हो मौनी बन गये थे, पढ़ाते न थे। उन्होंने लिखकर दयानन्द को अपने शिष्य विरजानन्द जी के पास मथुरा जाने की प्रेरणा की।

                स्वामी दयानन्द संवत् 1917 कार्तिक शुक्ला 2 बुधवार (14-11-1860) को स्वामी विरजानन्द जी के शिष्य बने। उन्होंने इनसे व्याकरण वेदानन्तदर्शन का अध्ययन किया। व्याकरण के विशेष सूत्रों पर दार्शनिक चर्चायें काशी के कौमुदी के अध्यापन में भी आती हैं। इन चर्चाओं का भी विस्तारसंकोच गुरुशिष्य की योग्यतानुसार हो सकता है। जब विरजानन्द जैसे दार्शनिक गुरु थे, और दयानन्द जैसे दार्शनिक शिष्य थे, तो दर्शन के प्रायः सभी मार्मिक स्थलों की आलोचना व्याकरण व वेदान्त के अध्ययन में ही आ गई होगी। दयानन्द के बुद्धि-विकास में विरजानन्द का विशेष भाग था। विरजानन्द व दयानन्द का संयोग मणि-कांचन था। दोनों ने परस्पर संयोग से अपने जीवनों को सफल माना।

                विद्या समाप्ति पर, मुमुक्षुवय, अकिंचन दयानन्द सरस्वती गुरुदक्षिणानियमनिर्वाहार्थ लौंगे, गुरुदक्षिणा के रूप में लेकर उपस्थित हुए। विरजानन्द स्वछात्रों से गुरुदक्षिणा के रूप में कुछ लेते थे। वे बोले-‘‘दयानन्द, तुम्हारी यह भक्तिपूर्ण भेंट स्वीकार है, रख दो। पर इतने मात्र से गुरुदक्षिणा होगी। गुरुदक्षिणा में मुझे तुमसे कुछ और मांगना है, और वह तुम्हारे पास है भी। क्या तुम मेरी मांगी वस्तु मुझे दे सकोगे?’’ दयानन्द बोले-‘‘मेरा रोमरोम आपके आदेशार्थ समर्पित है। आप निःसंकोच आदेश करिये।देशदशा चिन्तित विरजानन्द ने कहा-‘‘दयानन्द! देश में घोर अज्ञान फैला हुआ है। स्वार्थी लोग जनता को पथभ्रष्ट कर रहे हैं। तुम इस व्यापक अन्धकार के निवारणार्थ सर्वात्मना प्रयत्न करो।दयानन्द ने ‘‘तथास्तुकहकर गुरु निर्देश को शिरोधार्य किया और सम्पूर्ण जीवन देशोद्धार में होम दिया। मोक्ष-प्राप्ति के स्थान में देशोद्धार मुख्य लक्ष्य बन गया। पं0 भीमसेन शास्त्री द्वारा लिखित यह कथा स्वामी दयानन्द जी के विद्याध्ययन एवं देश हित में वेदों के पुनरुद्धार व उनके प्रचार की इतिहास-कथा है। गुरु-शिष्य के सान्निध्य ने देश का अपूर्व कल्याण किया और देश धार्मिक दृष्टि से अनिश्चितता के वातावरण से बाहर आया और अब विश्वगुरु बनने के पथ पर अग्रसर है। स्वामी विरजानन्द जी का जीवन बहुआयामी था। उन्होंने अलवर नरेश को संस्कृत पढ़ाई थी। मथुरा की पाठशाला के लिये अलवर नरेश से आर्थिक सहायता भी प्राप्त होती थी। स्वामी विरजानन्द जी ने व्याकरणाचार्यों व पौराणिक मतों के आचायों से व्याकरण सम्बन्धी विषयों पर कई शास्त्रार्थ भी किये। देश के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम सन् 1857 में उनका गुप्त योगदान था, ऐसी चर्चा पढ़ने को मिलती है। स्थानाभाव से उन सबका उल्लेख सम्भव नहीं है। ईश्वर-भक्ति तथा आर्ष-ग्रन्थाध्ययन-अध्यापन की पवित्र साधना में अपना जीवन व्यतीत करते हुए नब्बे वर्ष की आयु में उदरशूल से पीड़ित रहते हुए संवत् 1925 आश्विन बदि 13, सोमवार (14-9-1868) को दण्डीजी ने मथुरा में अपनी विनश्वर देह का त्याग किया। स्वामी दयानन्द जी को जब यह समाचार शहबाजपुर में कार्तिक मास में मिला तो कहा जाता है कि वह इस वज्राहत समाचार को सुनकर स्तब्ध रह गये। कुछ देर बाद वह बोले ‘व्याकरण का सूर्य अस्त हो गया।’ उस दिन दयानन्द जी ने जल भी ग्रहण नहीं किया था, ऐसा बताया जाता है। स्वामी दयानन्द का निर्माण स्वामी विरजानन्द की शिक्षा व सान्निध्य की देन थी। इन दोनों महापुरुषों को सादर नमन है। दयानन्द जी के द्वारा वैदिक धर्म का पुनरुद्धार एवं रक्षा हुई है और देश का अपूर्व कल्याण हुआ है।

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