जीवात्मा के बन्धन और मोक्ष पर ऋषि दयानन्द के तर्क व युक्तिसंगत विचार

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-मनमोहन कुमार आर्य

संसार में हम एक सामान्य नियम देखते हैं कि यहां अच्छे काम करने वाले को सम्मानित किया जाता है और बुरे काम करने वालों को दण्डित किया जाता है। मनुष्य जीवन में आत्मा यदि अच्छे काम करती है तो परमात्मा की ओर से उसको उसके अच्छे कर्मों के फल के रूप में सुख प्रदान किये जाते हैं और जो मनुष्य बुरे व दूसरों को अकारण पीड़ा आदि पहुंचाते हैं उनको दुःख मिलता है। कर्म-फल सिद्धान्त पर विचार करने पर यह ज्ञात होता है कि यदि कोई मनुष्य अपने पुराने सभी बुरे कर्मों का फल भोग ले और उसके बाद कोई बुरा कर्म न करे तो ऐसे मनुष्य को किंचित भी दुःख प्राप्त नहीं होना चाहिये। ऐसे मनुष्य को ईश्वर की व्यवस्था से सुख ही सुख प्राप्त होगा। अब यदि ऐसे मनुष्य की मृत्यु होती है तो उस मनुष्य को श्रेष्ठ मनुष्य जन्म ही मिलेगा जिसमें उसे जन्म के आरम्भ से मृत्यु पर्यन्त सुख ही सुख मिलेंगे। इस नये जन्म में भी यदि वही सभी उत्तम कर्मों को करता है यथा वेदाध्ययन, वेदानुसार आचरण, ईश्वरोपासन, यज्ञादि कर्म सहित परोपकार और दान आदि कार्य करता है, ईश्वरोपासना करते हुए वह ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है तो अब उसकी और अधिक उन्नति होनी चाहिये व होती है। इसका उत्तर यह मिलता है कि ऐसी अवस्था में उस जीवात्मा वा मनुष्य का मोक्ष वा मुक्ति हो जाती है। जिस जीवात्मा को मोक्ष मिलता है उसको बहुत लम्बी अवधि के लिए जन्म व मृत्यु से अवकाश मिल जाता है। मोक्ष ऐसी अवस्था होती है जिसमें मुक्त जीव को सुख व आनन्द ही होता है। जीवात्मा की ऐसी कोई उचित कामना नहीं होती जिसकी पूर्ति वा प्राप्ति मोक्षावस्था में नहीं होती। यह मोक्ष की प्राप्ति ही प्रत्येक जीवात्मा का लक्ष्य है। जीवात्मा अनादि, अनुत्पन्न, नित्य व अमर है। इस कारण सभी जीवात्माओं के पूर्व में असंख्य व अनन्त जन्म हो चुके हैं और अनन्त बार ही उनकी मृत्यु भी हुई है। संसार में व ईश्वर के ज्ञान में जितनी भी योनियां हैं, उन सबमें जीवात्मा कई कई बार जन्म ले चुका है और कई बार वह मोक्ष भी प्राप्त कर चुका है। अन्तिम बार मोक्ष की प्राप्ति होने पर जब उसका जन्म हुआ तो वह किन्हीं कारण से अविद्या में कुछ फंस गया जिससे उसका पुनर्जन्म हुआ ओर ऐसा होते हुए हमारी व हम सबकी इस जन्म की वर्तमान स्थिति प्राप्त हुई है। हम सबके लिए वेद व उनका ज्ञान सुलभ है। मोक्ष की प्राप्ति के साधन भी हमें सत्यार्थप्रकाश व दर्शन आदि ग्रन्थों के अध्ययन से ज्ञात हो जाते हैं। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम सब मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील हों जिससे हमारा मनुष्य जीवन सफलता को प्राप्त हो सके।

 

वेदों के मर्मज्ञ ऋषि दयानन्द विद्या से मोक्ष और अविद्या से बन्ध व जन्म मरण मानते हैं। इसका विवेचन उन्होंने सत्यार्थप्रकाश के नवम समुल्लास में किया है। उनके अनुसार जो मनुष्य विद्या और अविद्या के स्वरूप को साथ ही साथ जानता है, वह अविद्या अर्थात् कर्मोपासना से मृत्यु को तर के विद्या अर्थात् यथार्थ ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है। अविद्या के लक्षण बताते हुए वह कहते हैं कि जो अनित्य संसार और देहादि में नित्य अर्थात् जो कार्य जगत् देखा, सुना जाता है सदा रहेगा, सदा से है और योगबल से यही देवों का शरीर सदा रहता है वैसी विपरीत बुद्धि होना अविद्या का प्रथम भाग है। अशुचि अर्थात् मलमय स्त्री आदि के शरीर और मिथ्याभाषण, चोरी आदि अपवित्र कर्मों में पवित्र बुद्धि, दूसरा अत्यन्त विषयसेवनरूप दुःख में सुखबुद्धि आदि तीसरा अनात्मा में आत्मबुद्धि करना अविद्या का चौथा भाग है। यह चार प्रकार का विपरीत ज्ञान अविद्या कहाती है। इसके विपरीत अनित्य मे अनित्य और नित्य में नित्य, अपवित्र में अपवित्र और पवित्र में पवित्र, दुःख में दुःख, सुख में सुख, अनात्मा में अनात्मा और आत्मा में आत्मा का ज्ञान होना विद्या है। जिस से पदार्थों का यथार्थ स्वरूप बोध होवे वह विद्या और जिस से तत्वस्वरूप न जान पड़े, अन्य में अन्य बुद्धि होवे वह अविद्या कहलाती है। अर्थात् कर्म और उपासना अविद्या इसलिये हैं कि यह बाह्य और अन्तर क्रियाविशेष नाम है, ज्ञान विशेष नहीं। इसी लिए वेद में कहा गया है कि विना शुद्ध कर्म और परमेश्वर की उपासना के मृत्यु दुःख से पार कोई नहीं होता। अर्थात् पवित्र कर्म, पवित्रोपासना और पवित्र ज्ञान ही से मुक्ति और अपवित्र मिथ्याभाषणादि कर्म पाषाणमूर्त्यादि की उपासना और मिथ्याज्ञान से बन्ध होता है। ऋषि के विवेचन से यह भली प्रकार विदित हो जाता है कि अविद्या से बन्ध वा जन्म-मरण तथा विद्या से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

महर्षि दयानन्द यह भी बताते हैं कि मुक्ति उनको प्राप्त होती है जो जन्म-मरण के बन्धन में फंसा होता है। पागल तो  वह है जो अधर्म अज्ञान में फंसा हुआ जीव है। बन्धन व मोक्ष स्वभाव से नहीं अपितु निमित्त से होता है। यदि बन्धन व मोक्ष स्वभाव से होता तो बन्ध जीव सदैवबन्धन में ही रहता और मुक्त जीव सदैव मुक्त ही रहता। बन्ध जीव की मुक्ति न होती और मुक्त जीव फिर बन्धन को प्राप्त न होता।

मोक्ष क्या है? जिस से छूट जाना हो उसको मुक्ति वा मोक्ष कहते हैं। सभी मनुष्य दुःखों से छूट जाना चाहते हैं इसलिये दुःखों से छूट कर सुखों को प्राप्त करना ही मुक्ति कहलाती है। दुःखों से छूट कर जीवात्मा आनन्दस्वरूप सर्वव्यापक भ्रम  में रहते हैं। प्रश्न है कि मुक्ति किन कर्मों के करने से होती है? इसका उत्तर है कि परमेश्वर की आज्ञा पालने, अधर्म, अविद्या, कुसंग, कुसंस्कार, बुरे व्यसनों से अलग रहने और सत्यभाषण, परोपकार, विद्या, पक्षपातरहित न्याय, धर्म की वृद्धि करने, वैदिक रीति से परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना अर्थात् योगाभ्यास करने, विद्या पढ़ने, पढ़ाने और धर्म से पुरुषार्थ कर ज्ञान की उन्नति करने, सब से उत्तम साधनों को करने और जो कुछ करे वह सब पक्षपातरहित न्यायधर्मानुसार ही करें। इन साधनों से मुक्ति होती है। इन साधनों के विपरीत ईश्वर आज्ञा के भंग करने आदि कामों से जीवात्मा बन्धन अर्थात् जन्म-मरण के चक्र में फंस कर दुःख और सुख दोनों प्राप्त कर बार बार जन्म व मृत्यु को प्राप्त होती रहती है।

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि मुक्ति में जीव का ईश्वर में लय हो जाता है या उसकी पृथक सत्ता बनी रहती है? इसका उत्तर यह है कि जीव का पृथक अस्तित्व बना रहता है। उसका ईश्वर में न तो लय होता है और न ही जीव नष्ट व विनाश को प्राप्त होता है। जीव मुक्ति की अवस्था में ब्रह्म में व उसके सान्निध्य में रहता है। ऋषि दयानन्द बताते हैं कि मुक्ति की अवस्था में जीव सर्वत्र पूर्ण ब्रह्म अर्थात् सर्वव्यापक ईश्वर में मुक्त जीव अव्याहतगति अर्थात् उसको कहीं रुकावट नहीं, विज्ञान, आनन्दपूर्वक स्वतन्त्र विचरता है। मुक्त जीव का मुक्तावस्था में स्थूल शरीर नहीं रहता है। इस अवस्था में जीव के अपने सत्यसंकल्पादि स्वाभाविक गुण सामर्थ्य उसके पास होते हैं। ऋषि यह भी लिखते हैं कि मोक्ष में भौतिक शरीर वा इन्द्रियों के गोलक जीवात्मा के साथ नहीं रहते किन्तु अपने स्वाभाविक शुद्ध गुण रहते हैं। जब सुनना चाहता है तब श्रोत्र, स्पर्श करना चाहता है तब त्वचा, देखने के संकल्प से चक्षु, स्वाद के अर्थ रसना, गन्ध के लिये घ्राण, संकल्प विकल्प करते समय मन, निश्चय करने के लिये बुद्धि, स्मरण करने के लिए चित्त और अहंकार के अर्थ अहंकाररूप अपनी स्वशक्ति से जीवात्मा मुक्ति में हो जाता है और संकल्पमात्र शरीर होता है जैसे शरीर के आधार रहकर इन्द्रियों के गोलकों के द्वारा जीव स्वकार्य करता है वैसे जीव अपनी शक्ति से मुक्ति में सब आनन्द भोग लेता है। मुक्ति में जीव की शक्ति एक प्रकार की होती है और सामर्थ्य 24 प्रकार की होती है। बल, पराक्रम, आकर्षण, प्रेरणा, गति, भीषण, विवेचन, क्रिया, उत्साह, स्मरण, निश्चय, इच्छा, प्रेम, द्वेष, संयोग, विभाग, संयोजक, विभाजक, श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, स्वादन, गन्धग्रहण तथा ज्ञान यह 24 प्रकार की सामर्थ्य जीव की मुक्तावस्था में उसके साथ होती हैं। इन्हीं से जीव मुक्ति में भी आनन्द की प्राप्ति रूप भोग करता है।

 

मोक्ष की अवस्था में जीवात्मा कितनी अवधि तक रहता है? मुक्तजीव की यह अवधि 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष होती है। इसे महाकल्प व ब्रह्म के 100 वर्ष भी कहते हैं। इसके बाद मुक्ति की अवधि समाप्त हो जाती है और जीवात्मा फिर मनुष्य योनि में जन्म लेता है। इसके बाद पुनः शुभाशुभ कर्मों के अनुसार उसका बन्ध व मोक्ष होता है। ऋषि दयानन्द ने मुक्ति के साधनों का विस्तार से वर्णन भी सत्यार्थप्रकाश के नवम समुल्लास में किया है। जो बन्धु मुक्ति के विषय में विस्तार से जानना चाहते हैं उनको सत्यार्थप्रकाश का नवम समुल्लास पढ़ना चाहिये। हमने इस लेख में स्वामी दयानन्द जी के मोक्ष विष्खयक कुछ मन्तव्यो को प्रस्तुत किया है। हम आशा करते हैं कि पाठकों को इससे कुछ लाभ होगा। ओ३म् शम्।

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