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    Homeसाहित्‍यलेखखतरे की घंटी ही दिख रही देश में बढ़ते कोविड के केस!

    खतरे की घंटी ही दिख रही देश में बढ़ते कोविड के केस!

    लिमटी खरे

    कोरोना अभी गया नहीं है, यह बात लंबे समय से प्रधानमंत्री के द्वारा कही जा रही है। कुछ माहों तक कोरोना के आंकड़े कम होने के बाद अप्रैल माह के दूसरे पखवाड़े में एक बार फिर कोविड के आंकड़े बढ़ते हुए दिख रहे हैं। इन आंकड़ों में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली अर्थात दिल्ली एनसीआर के आसपास कोविड के प्रकरण बढ़ते हुए दिख रहे हैं। इनमें स्कूली विद्यार्थियों की तादाद अधिक बताई जा रही है, जो चिंता का विषय मानी जा सकती है।

    नोएडा के आसपास कोविड के बढ़ते प्रकरणों को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा गौतम बुद्ध नगर, हापुड़, मेरठ, बुलंदशहर, गाजियाबाद, बागपत, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आदि में मास्क लगाना एक बार फिर अनिवार्य कर दिया है। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि देश भर में अगर टेस्टिंग करवाई जाए तो देश में आंकड़े ज्यादा भी मिल सकते हैं। हलांकि वेक्सीनेशन के बाद कोविड तो हो रहा है पर यह गंभीर स्तर तक लोगों को नहीं ले जा पा रहा है। लगभग 11 से 12 सप्ताह तक कोविड के प्रकरणों में गिरावट के बाद एकाएक बढ़ोत्तरी दर्ज किया जाना चिंता का विषय ही माना जा सकता है। 21 जनवरी को सर्वाधिक लगभग सवा तीन लाख प्रकरणों के बाद कोविड ढलान पर आ गया था। इसके बाद 18 अप्रैल को सात दिन का औसत 1389 पर जा पहुंचा है। इसके साथ ही दक्षिण भारत में यह अभी भी लोगों को सताता दिख रहा है। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और केरल में कोविड के प्रकरण बढ़ते नजर आ रहे हैं।

    वैसे भी तीन लहरें झेल चुके देश में अब चौथी लहर की आशंका जताई जा रही है। दुनिया के अनेक देशों में कोविड का संक्रमण तेज ही दिख रहा है। इन परिस्थितियों में कोविड के निर्धारित प्रोटोकॉल, शारीरिक दूरी और मास्क लगाने के प्रति सभी को सचेत रहने की आवश्यकता महसूस होने लगी है। इसी बीच यह राहत की बात मानी जा सकती है कि जनवरी के बाद आए संक्रमण के मामलों में कम ही लोगों को अस्पताल में दाखिल होने की जरूरत पड़ी है, इसलिए यह घबराने की बात नहीं मानी जा सकती है। इसके लिए देश में कोविड वेक्सीनेशन ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार माना जा सकता है, जिसके चलते लोग कोविड संक्रमित तो हो रहे हैं पर अस्पताल में भर्ती होने की नौबत नहीं आ रही है।

    हालिया परिस्थितियों में कोविड की एहतियात अर्थात प्राकशन या बूस्टर डोज कारगर साबित हो सकती है। सरकार ने इसको लगाने की अनुमति दे दी है। इस अभियान में अभी तेजी इसलिए नहीं आ पा रही है क्योंकि इसे लगाने के लिए सरकार के द्वारा दूसरे डोज के 09 माह के अंतराल की अनिवार्य शर्त रख दी है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए अनेक शोधों में यह बात निकलकर सामने आई है कि कोविड की वेक्सीन के डोज लगने के 06 माह के उपरांत ही इम्यूनिटी कुछ हद तक कमजोर पड़ने लगती है, इसलिए नौ माह के स्थान पर अब अंतराल को 06 माह कर दिया जाना ही उचित होगा। वर्तमान में प्रकाशन डोज निजि केंद्रों में लगाए जा रहे हैं जबकि अधिकतर लोग इसकी कीमत को वहन नही कर पा रहे हैं, इसलिए इसे सरकारी स्तर पर मुहैया करवाया जाना चाहिए।

    एक समय था जब मार्च में परीक्षाएं समाप्त होने के बाद 30 अप्रैल को परीक्षा परिणाम आते थे और उसके बाद गर्मी के अवकाश के उपरांत 01 जुलाई से शालाएं लगा करती थीं। नए नए परीक्षणों से अब तो अप्रैल माह में ही शालाएं लगने लगी हैं। दो सालों से ऑन लाईन पढ़ाई के बाद अब शालेय विद्यार्थियों को अपनी शाला और संगी साथियों से मिलने का मौका मिल रहा है। शालेय विद्यार्थी इसे शिद्धत से याद कर रहे थे। सरकारी और निजि शालाओं में विद्यार्थियों के आने का सिलसिला तो आरंभ हुआ, किन्तु शालाओं में जरूरी अनिवार्यताओं की अनदेखी जमकर हो रही है। अगर कोई कोविड पाजिटिव होता है और वह शालेय परिवहन का प्रयोग करता है या कक्षा में उपस्थिति देता रहता है तो उसकी कांटेक्ट ट्रेसिंग के मामले में सभी उदासीन ही नजर आ रहे हैं। और तो और अब इस तरह के हालातों में शाला प्रबंधन को क्या करना चाहिए इस बारे में भी सूबाई सरकारें और केंद्र सरकार ने किसी तरह की गाईड लाईन जारी नहीं की है।

    देखा जाए तो शालाओं में तालाबंदी उचित विकल्प नहीं है। पर अगर कोविड का संक्रमण एक बार फिर मुंह उठाता दिख रहा है तो पिछले सभी अनुभवों से सबक लेकर इसके पुर्नमूल्यांकन की महती जरूरत महसूस होने लगी है। जिस भी कक्षा में कोविड के प्रकरण मिलें उस कक्षा में कम से कम एक सप्ताह तक ऑन लाईन क्लासेस का विकल्प दे दिया जाना ही बेहतर होगा। अगर किसी क्लास में कोई पाजिटिव मिलता है तो कम से कम उस कक्षा में अध्ययनरत अन्य विद्यार्थियों के पालकों को इसकी जानकारी देना शाला प्रबंधन का नैतिक दायित्व है, अफसोस ऐसा नहीं हो रहा है। सरकार को चाहिए कि वह शालाओं को सेल्फ टेस्ट किट की उपलब्धता भी सुनिश्चित करने के लिए पाबंद करे।

    लिमटी खरे
    लिमटी खरेhttps://limtykhare.blogspot.com
    हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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