ऋतुराज बसन्त

   आ गया ऋतुराज बसन्त । 
    छा गया ऋतुराज बसन्त।।
            हरित घेंघरी पीत चुनरिया ,
            पहिन प्रकृति ने ली अँगड़ाई।
            नव-समृद्धि पा विनत हुए तरु,
             झूम  उठी   देखो  अमराई ।
     आज सुखद सुरभित सा क्यों ये 
     मादक  पवन  बहा अति  मन्द ।। आ गया.....
                       *
               फूल उठी खेतों में सरसों ,
               महक उठी क्यारी क्यारी ।
               लाल, गुलाबी, नीले, पीले,
                फूलों  की  छवि  है  न्यारी।
        आज  सजे फिर  नये  साज,
        वसुधा पर बिखर गये सतरंग ।। आ गया....
                         *
                हुआ पराजित आज शिशिर है,
                विजयी  हुआ  आज  ऋतुराज।
                विजय  दुम्दुभी  बजा  रहे  हैं ,
                गुन गुन  सा  करते  अलिराज।
         कष्ट  शीत  का  दूर  हो  गया ,
         मधु-ऋतु  लाई  सुख  अनन्त ।। आ गया ....
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                  थिरक  उठी है  प्रकृति सुन्दरी ,
                  आज  मिलन  की  वेला  आई ।
                   कूक कूक कोकिल कुल ने भी,
                   सुखकर , सुमधुर  तान  सुनाई।
         सखि! बसन्त आए वर बन कर ,
         साथ  लिये  अपने  अनंग ।। आ गया .....
                          *
                   आ  गया  ऋतुराज  बसन्त।
                    छा  गया ऋतुराज बसन्त ।।
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                             — शकुन्तला बहादुर

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