देश के निर्माण में आरएसएस का योगदान

बृजनन्दन राजू 

जब छात्रों को लेनिन,मार्क्स और कांग्रेस का इतिहास पढ़ाया जा सकता है तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक का क्यों नहीं। वैसे समाज से संबंध रखने वाली घटनाएं ही इतिहास बनती हैं। विगत काल में घटित घटनाएं ही इतिहास का रूप लेती हैं। नागपुर के राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में संघ का इतिहास और राष्ट्र निर्माण में इसकी भागीदारी का विषय 
शामिल किया गया तो कांग्रेसी बौखला गये है। कैसी विकृत मानसिकता है कांग्रेस के नेताओं की कि  खूनी क्रान्ति का संदेश देने वाले मार्क्सवाद और नया मार्क्सवाद जैसे विषय विश्वविद्यालयों में पढ़ाये जाते हैं लेकिन शुद्ध सांस्कृतिक सामाजिक संगठन के इतिहास से इन्हें गुरेज है। 
देश के नव निर्माण में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है।

अगर संघ नहीं होता तो आज पंजाब,गोवा और काश्मीर भारत के साथ नहीं होते। रामसेतु टूट गया होता। अमरनाथ यात्रा बंद हो गयी होती। गुलामी के प्रतीक बाबरी ढ़ांचे का विध्वंस भी नहीं नहीं होता। आज जो भारत की तेजस्विता पूरे विश्व में आलोकित हो रही है। इसके पीछे भी संघ है। समरस समर्थ और स्वाभिमानी भारत के निर्माण में संघ के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। संघ से निकले स्वयंसेवक समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। वह जिस भी क्षेत्र में गये उन्होंने ऊंचाईयां पायी हैं। विद्यार्थी,मजदूर,किसान,राजनीति और धर्म के क्षेत्र में संघ विचार से संबंध रखने वाले संगठन अपने —अपने क्षेत्र में शीर्ष पर है। इसके पीछे स्वयंसेवकों की ही ताकत है। सेवा के क्षेत्र में तो एक रिकार्ड है एक लाख 75 हजार से अधिक सेवा कार्य संघ द्वारा देशभर में चल रहे हैं। वह संगठन जिसने देश को नरेन्द्र मोदी जैसा प्रबल प्रभावी और सर्वमान्य नेतृत्व दिया हो उस संगठन के बारे में आज दुनिया जानना चाहती है। वैसे संघ के बारे में समझना है तो संघ संस्थापक डा. हेडगेवार के जीवन के बारे में समझना पड़ेगा। 

स्वतंत्रता संग्राम कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ा गया उसमें नरम और गरम सभी दल के नेताओं ने मत भिन्नता होने के बावजूद गांधी के नेतृत्व को स्वीकार किया था फिर चाहे वह सुभाष सावरकर या डा. हेडगेवार रहे हों। कांग्रेसियों ने जबरदस्ती सुभाष चन्द्र बोस से इस्तीफा दिलवाया था।  इससे बड़ा पाप और राष्ट्र के साथ धोखा क्या हो सकता है कि बहुमत सरदार पटेल के पक्ष में होने के बावजूद नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया। कांग्रेस का शुरू से ही यह इतिहास रहा है कि उन्होंने जनता के सामने सच आने ही नहीं दिया। देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कांग्रेस ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद सरदार भगत सिंह, उधम सिंह, अशफाक उल्ला, खान राम प्रसाद बिस्मिल, भाई परमानंद और डा. हेडगेवार जैसे हजारों क्रांतिकारियों को पीछे हटा कर आजादी का श्रेय स्वयं के नाम कर लिया। कांग्रेस ने आजादी के बाद देश को कम्युनिस्टों का लिखा आक्रान्ताओं का इतिहास तो पढ़ाया लेकिन हमारे देश के वीर महापुरूषों की यशगाथाएं नहीं पढ़ाई गयी। कांग्रेस ने पाठ्य पुस्तकों में अकबर,बाबर,औरंगजेब और अलाउद्लदीन खिलजी का इतिहास तो पढ़ाया लेकिन पृथ्वीराज चौहान,महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज,महाराजा सूहेलदेव और महारानी लक्ष्मीबाई का गौरवपूर्ण इतिहास सामने नहीं आने दिया।

कांग्रेस से अलग रहकर भी बहुत से संगठनों और अनगिनत क्रान्तिकारियों ने देश को स्वतंत्र कराने में योगदान किया। संघ के स्वयंसेवकों ने तो कांग्रेस के नेतृत्व में ही आजादी के आन्दोलन में भाग लिया। संघ रचनात्मक कार्य करता है। अपने को आन्दोलन से दूर रखता है। यही कारण है कि आज जो समाज  जीवन के विविध क्षेत्रों में परिवर्तन दिख रहा है उसी का परिणाम है। जब कभी देश को जगाने के लिए आन्दोलन की जरूरत पड़ी भी तो संघ ने हर प्रकार से मदद तो की लेकिन सामने नहीं आया। 1975 के आपातकाण के बाद देश में जनजागरण संघ ने किया। करीब एक लाख संघ के स्वयंसेवक जेल गये। उस समय राजनीतिक पार्टियों के बड़े नेता जेल में थे बाहर निराशा का माहौल था बाहर के राजनीतिक कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति थी। ऐसे समय में संघ ने देशव्यापी आन्दोलन चलाया। इसके लिए संघ ने लोक नायक जय प्रकाश नारायण को आगे किया था। देश में एकात्मता यात्रा रही हो राम जन्मभूमि का आन्दोलन रहा हो, अमरनाथ श्राइन बोर्ड या रामसेतु का विषय रहा हो या फिर विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा रही हो। इसके पीछे संघ शक्ति थी। लेकिन यह आन्दोलन संघ के बैनर के तले नहीं हुए। 
कांग्रेस के छांव में पले बढ़े कम्युनिस्टों ने देश के आध्यात्मिक संतों और महापुरूषों के बारे में अनेक मनगढ़ंत कहानियां गढ़ी जिससे जनता में भ्रम फैलाया जा सके। वेद पुराण को गड़रियों का गीत कहा गया। भगवान राम और कृष्ण काल्पनिक पात्र हैं यह कहा गया। तुलसीदास के बारे में जिन्होंने मुगलकाल में धार्मिक चेतना जगाने का काम किया उनके बारे में भ्रम फैलाया गया।  अकबर  को महान ओर शिवाजी को लूटेरे और पहाड़ी चूहे कहा गया। आर्य अनार्य का भ्रम फैलाया गया। कम्युनिस्टों ने क्या नहीं किया। चीन के आक्रमण के समय उनके साथ खड़े रहे। कम्युनिस्ट नेताओं ने गोला बारूद बनने वाली फैक्ट्रियों में हड़ताल करा दी थी। यह सब इतिहास तो जनता को बताना पड़ेगा। 

संघ को समझना है तो संघ संस्थापक डा. हेडगेवार के बारे में जानना पड़ेगा। डा.हेडगेवार बचपन से क्रान्तिकारी विचारों के थे। 22 जून 1897 को इग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के 60 वर्ष पूरे होने पर पूरे भारत में सरकारी आज्ञा से राज्यनिष्ठा प्रकट करने वाले समारोह हुए। इस अवसर पर विद्यालय में मिलने वाली मिठाई को बालक केशव ने कूड़ेदान में फेंक दी। उस समय बालक केशव की उम्र मात्र आठ वर्ष थी। इसके बाद 1901 में ब्रिटिश बादशाह एडवर्ड सप्तम के राज्यारोहण पर नगर में आतिशबाजी का बड़ा कार्यक्रम था। केशव के मित्रों ने आतिशबाजी देखने की योजना बनाई । पहले तो केशव ने मित्रों को डांटा और कहा कि विदेशी राजा का राज्यारोहण देखना हमारे लिए शर्म की बात है।

1906 में केशव बलिराम हेडगेवार अपने चाचा के यहां रामपायली गर्मी की छुट्टियां मनाने गए थे।  वहां पर दशहरे के दिन जुलूस निकलता था। इस बार केशव ने बालकों के साथ योजना बनाकर   जय श्रीराम और वंदे मातरम का जोरदार उद्घोष किया। भीड़ को रावण वध का वास्तविक अर्थ समझाने के लिए संक्षिप्त केशव उग्र क्रांतिकारी भाषण भी दिया। सरकार के खिलाफ उग्र भाषण देने के लिए हेडगेवार को उनके दो साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया।  यह केशव के क्रांतिकारी जीवन की पहली गिरफ्तारी थी। 

सरकार ने छात्रों को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रखने के लिए रिसले सर्कुलर जारी कर वंदे मातरम गाने पर प्रतिबंध लगा दिया। देशभर में विरोध हुआ। हेडगेवार ने अपने साथियों के साथ योजना बनाई कि कॉलेज में जब इंस्पेक्टर आएंगे उनके सामने खड़े होकर वंदे मातरम गाया जाएगा। शिक्षा विभाग के निरीक्षक तथा विद्यालय के मुख्याध्यापक जनार्दन विनायक को विद्यालय का निरीक्षण करने के लिए सबसे पहले कक्षा 10 में आए  प्रवेश करते ही विद्यार्थियों ने वंदे मातरम का जोरदार उद्घोष किया। इसके बाद   केशव को विद्यालय से निकाल दिया गया। कई दिनों तक स्कूल में हड़ताल चली। बालक केशव का प्रवेश यवतमाल के विद्या गृह में कराया गया। इसके बाद वह पढ़ाई करने कलकत्ता गये। वहां वह क्रांतिकारियों की संस्था अनुशीलन समिति के साथ जुड़कर सक्रियता के साथ कार्य किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद जब नागपुर वापस आये तो कांग्रेस में सक्रिय हो गये। वह कांग्रेस के प्रान्तीय मंत्री बनाये गये। 1920 में नागपुर में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन तय हुआ। उसके स्वागता अध्यक्ष डा. हेडगेवार थे। वहां की सारी व्यवस्था की जिम्मेदारी डा.केशव बलिराम हेडगेवार की थी। इससे पूर्व पूरे प्रान्त में घूम—घूम कर अधिवेशन की तैयारी कराई थी। इसमें डा. हेडगेवार ने महात्मा गांधी के सामने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव गांधी जी के समक्ष रखा था। नागपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी इरविन ने धारा 144 के अन्तर्गत 23 फरवरी 1921 को एक आदेश जारी कर किसी भी सार्वजनिक सभा करने पर रोक लगा दी। डा. हेडगेवार के दो भाषणों को आपत्तिजनक करार देकर राजद्रोह का मुकदमा दायर कर जेल भेज दिया गया। 
 डॉक्टर जी को जेल में जिंद के ऊपर कागज चिपकाने और लुगदी बनाने का काम दिया गया जिससे उनके हाथों में छाले पड़ गए लेकिन सभी कष्टों को और यात्राओं को भी पूरी मस्ती के साथ सहते रहे।  12 जुलाई 1922 को जेल से छुट्टी होने के बाद कारावास के बाहर उनका वंदे मातरम के उद्घोष पुष्प वर्षा से स्वागत किया गया। उनकी रिहाई के बाद स्वागत सभा में पंडित मोतीलाल नेहरू, हकीम  अजमल खान, डॉक्टर अंसारी, श्री राजगोपालाचारी, डा.मुंजे और डा. परांजपे जैसे कांग्रेस के वरिश्ठ नेता मौजूद थे। कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति से उनका कांग्रेस से मोहभंग हुआ। सन 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। डॉ हेडगेवार स्वयंसेवकों को  हिंदू राष्ट्र की पूर्ण स्वाधीनता की प्रतिज्ञा दिलाते थे। स्ंघ स्थापना के बाद भी डा. हेडगेवार कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे आन्दोलन में शामिल होते रहे।  1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में संघ के हजारों स्वयंसेवकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। विदर्भ के एक स्थान को स्वयंसेवकों ने  आजाद भी करा लिया था लेकिन 12 स्वयंसेवक शहीद भी हो गए थे।मेरठ की मवाना तहसील में हो तिरंगा झंडा पर आते समय पुलिस की गोलियों से कई संघ कार्यकर्ता जख्मी हो गये।  सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी संघ ने बिना शर्त समर्थन दिया था। संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार ने डा. परांजपे को सरसंघचालक का दायित्व देकर सत्याग्रह करके जेल गये थे।  सरदार भगत सिंह और राजगुरु ने पुलिस अफसर सांडर्स को लाहौर में दिनदहाड़े गोलियों से उड़ा दिया। दोनों क्रांतिकारी फरार होकर लाहौर से बाहर निकल गए। राजगुरु नागपुर की मोहिते की बाड़ा शाखा के स्वयंसेवक थे। वह आकर डाक्टर हेडगेवार से मिले। डॉक्टर जी ने अपने एक सहयोगी कार्यकर्ता भैया जी दाणी के यहां रोका। जो बाद में सरकार्यवाह भी बने। राजगुरु को डॉक्टर साहब ने कहा कि वह अपने गांव अभी न जाएं क्योंकि वहां पर उनके गिरफ्तार होने का पूरा खतरा है चेतावनी की को राजगुरु ने ध्यान नहीं दिया और अपने घर पुणे चले गए  वहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया उन पर मुकदमा चला और भगत सिंह सुखदेव के साथ उनकी मौत की सजा मिली तीनों को फांसी पर लटका दिया गया। इसके बाद विभाजन की विभीषिका में हिन्दुओं को पाकिस्तान से सुरक्षित निकालने में संघ के स्वयंसेवकों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। कश्मीर के महाराजा भारत में विलय नहीं करना चाहते थे। सरदार पटेल ने संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरूजी को सरकारी विमान से कश्मीर के महाराजा को मनाने के लिए भेजा। अंतत: महाराजा हरिसिंह गुरू जी बात मान गये। उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण त्याग दिये। उस समय पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर संघ ने लगाए थे। 1962 में चीन के भारत पर हुए हमले के समय संघ के स्वयंसेवकों ने आसाम के तेजपुर जिले में चीन के रेंट गार्ड्स को रोकने के लिए भारतीय सैनिकों की तीन दिन तक मदद की।   सेवा कार्यों से प्रभावित होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 26 जनवरी 1963 को गणतंत्र दिवस की परेड में भाग लेने का निमंत्रण दिया था अल्प सूचना पर भी दिल्ली के 3500 से ज्यादा स्वयंसेवक परेड में शामिल हुए। पाकिस्तान से युद्ध के समय लालबहादुर शास्त्री को भी संघ याद आया था। लाल बहादुर शास्त्री जी ने क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में मदद देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आग्रह किया, ताकि इन कार्यों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद में लगाया जा सके। घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान करने वाले भी संघ के स्वयंसेवक ही थे।


 लेखक पत्रकारिता से जुड़े हैं। 8004664748

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