लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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मैं रुचिका गिरहोत्रा हूं। 19 साल पहले भले ही मैं मर गई थी। इस दुनिया से मेरी रुह फनां हो गई। लेकिन वो आज भी आप सबके बीच मौजूद है। आप सब के बीच। आज आप सब मुझे जानते हैं। और मेरी लिए लड़ी जा रही जंग में शरीक हो रहे हैं। लेकिन आज से 14 साल पहले मुझे कोई नहीं जानता था। आज मैं आप सबके लिए एक कहानी हूं। जिसके बारे में जानने के लिए हर कोई खबरिया चैनलों पर नज़र टिकाये रखता हैं तो कभी अख़बार के पन्नों को पलटते रहता हैं। क्या हुआ मेरा? क्या हुआ मासूम रुचिका का? मुझे न्याय दिलाने में आज आप साझीदार बन रहे हैं। आज हर कोई मेरे साथ है। न्याय के लिए मेरी सहेली के क़दम से कद़म ताल मिला रहे हैं। और मेरे रुखसत हो जाने के 19 साल बाद मैं सूर्खियां बन गई हूं। ये जान कर मुझे अच्छा भी लग रहा है। लेकिन ज्यादा सोचूं तो कुछ बुरा सा भी लग रहा है। बुरा इसलिए क्या हमारी चेतना जागने के लिए 19 साल का वक्त चाहिए। 19 साल लग जाते हैं इस देश में एक फैसला आते-आते।.और तबतक आरोपी खुलेआम घुमता रहता है। मेरे जैसी रुचिकाओं के साथ यौन शोषण करने के लिए बिल्कुल फ्री। 19 साल के वक्त का एक एक लम्हा अपनी कहानी मानों खुद कह रहा है। मुझे आज भी याद है वो पल जब राठौर ने मुझे अपनी बांहों में जकड़ लिया था। और मैं छूटने की कोशिश में हाथ पैर मार रही थी। अगर उस समय मेरी दोस्त अनुराधा नहीं आई होती तो। शायद जो हुआ उससे भी बहुत बुरा होता। ख़ैर मेरे साथ जो हुआ उस कहानी के एक एक पन्ने आपके सामने है। हर पन्ने पर स्याह अक्षरों से मेरे और मेरे परिवार के साथ घटने वाली घटनाओं का जिक्र है। लेकिन मैं ये सोचती हूं कि। मैं तो एक रुचिका हूं। जिसे न्याय अगर 19 साल बाद मिल भी गया तो। क्या उन लाखों रुचिकाओं को न्याय मिल पाएगा राठौर जैसे शख्सियतों से? मुझे उस वक्त का एक वाकया याद आ रहा था। जब हम टेनिस कोर्ट पर होते थे। तो राठौर घंटो हमें देखा करता था। और लंबे स्कर्ट पहनने पर अक्सर ही अपनी नाराज़गी दिखाता। कोच के साथ वरिष्ठ अधिकारी होने के कारण हम उसका बहुत सम्मान करती थी। इसलिए उसके टोकते ही अपने स्कर्ट मोड़ लेती थी। तब हमें ये समझ में नहीं आता था कि वो हमें बेटी छोड़ किसी और भी नज़र से देखता है। और ऐसे न जाने कितने राठौर हैं जो बनते तो बड़े हैं। मानो पिता समान, नाटक भी करते हैं सबसे सगे होने का और इसी बहाने कभी किसी बच्ची की जिस्म पर हाथ फेरते हैं। तो कभी गालों पर। कभी कपड़े ठीक करते हुए टांगों पर भी नज़र टिका देते हैं। तो कभी मासूमियत से गले लगाते हुए अपने सीने से चिपका लेते हैं। मुझे लगता है हमारे इस समाज में ऐसे सैंकड़ों राठौर की नज़र सिर्फ यही ढ़ूढती रहती हैं कि कहां कब कौन सी लड़की का कौन सा अंग दिख रहा है और उस अंग पर किस बहाने हाथ फेरा जाए। या फिर कब मौका मिले की उसे अपनी बांहों में उसे जकड़ ले। चाहे वो 14 साल की रुचिका गिरहोत्रा हो या। सात साल की मासूम बच्ची। मुझे तो लगता है कि आज हर लड़की यौन शोषण की शिकार है। जब वो घर से बाहर निकलती है तो राह चलते पुरुषों की निगाहें कभी महिला या लड़की के चारों तरफ घूमती रहती है। रोज कितनी ही लड़कियों के साथ बलात्कार किया जाता है। अपने देश में हर दिन कितनी हीं लड़कियां बलात्कार की शिकार होती है। जिसके आंकड़े तो निकल जाएंगे। लेकिन इन सब से अलग जो मेरे साथ हुआ उस तरह के शिकार लड़कियों की तो गिनती ही नहीं है। और एक बार आंकड़ा निकाल भी लिया जाए तो। हर रोज पुरुष की कामुक नज़रों की शिकार होती लाखों करोड़ों लड़कियों का आंकड़ा तो चाह कर भी कोई संगठन नहीं निकाल सकता। और न ही राठौर जैसे पुरुषों की कमी अपने समाज में है, जिनकी नज़रे आगे से पीछे से चारो तरफ से सैंकड़ों रुचिकाओं का हर रोज यौन शोषण करती है। और इन राठौड़ों के लिए न तो देश के कानून ने न ही किसी संविधान ने कोई सज़ा मुकम्मल की है। इस राठौड़ को तो सज़ा मिल जाएगी लेकिन क्या समाज में हमारे आस-पास विराजे इन जैसे दूसरे राठौड़ों को सज़ा मिल पाएगी? इसका जवाब साफ तौर पर न है। क्योंकी इस राठौड़ के साथ हमारे समाज के सैंकड़ो राठौड़ को कानून न तो कानून से और न ही समाज से सज़ा मिल सकती है। मुझे तो लगता है ये देवलोक में भी संभव नही है। और जब तक सज़ा नहीं मिलेगी। सैंकडों सवाल मेरे जेहन में हर पल कौंधते रहेंगे। इस तरह रुचिका के सवाल हमेशा सवाल बन कर घुमते रहेंगे। न मुझे मुझे आज मुक्ति मिलेगी, न मेरे जैसी रुचिकाओं को। ये ग़म सिर्फ मेरा ही नहीं है मेरे जैसी सभी रुचिकाओं का है।

-चेतना

छोटे शहर से निकली एक कलम से।

7 Responses to “रुचिका के सवाल…”

  1. Amjad

    इसमें सबसे ज्यादा कोई अगर कसूरवार है तो वो है हमारा समाज जिसने औरत और मर्द के बीच में गहरी खाई खोद रखी है. पुरुष कुछ भी करे तो वो सही है पर महिलाओं पर उँगलियाँ उठाने वाले हमारे समाज के हर कोने में भरे पड़े हैं. अब भी ये मामला अगर सुर्ख़ियों में है तो महज इसलिए के इसके साथ किसी बड़ी हस्ती का नाम जुदा हुआ है. रुचिका का केस हमारे लिए सिर्फ चटकारी न्यूज़ बनकर रह गया है. १९ साल बाद भी अगर उसे न्याय मिलेगा तो भी उससे क्या हासिल हो जायेगा. ज्यादा से ज्यादा राठोड को ६ या १ साल की सजा दे दी जायेगी और फिर उसे जमानत पर छोड़ दिया जायेगा…..

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  2. sunil patel

    राठौर को आज तक म्रत्यु दंड नहीं मिला है तो वाकई हमारे देश के लिए बड़े शर्म की बात है. राठौर सरे आम फाशी दे देनी चहिये. ऐसे दरिन्दे को जीने का कोई हक़ नहीं है. महिला हमारे देश मैं पूजनीय होती है. १४ साल की रुचिका के साथ जो अन्याय हुआ है वह हमारे देश का लिए बहुत बड़ा कलंक है. राठौर को बचाने वाले हर व्यक्ति से आम आदमी को आपने को दूर रखना चहिये, राठौर का समर्थको का सामजिक बहिस्कार करना चैये.

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  3. punita singh

    chatnaa bhdai रुचिका को न्याय मिला भी तो क्या ?उन्नीस साल पहले हम से जुदा हुई रुचिका अगर पुनर्जन्म ले चुकी हो तो आज भी हमारी न्याय प्रणाली पर आसू ही वहा रही होगी |अभी भी राठौर को उचित दंड मिलेगा कहना मुश्किल है ?राठोर से भी बड़े मुज़रिम है उसे बचाने वाले राजनीति के धुरन्दर जो अपनी वोट निति के लिए काम करते है |समाज में हजारो करोड़ो ऐसे जानवरों पर अब नकेल कसनी ही चाहिए जो नारी को सिर्फ एक देह ही समझते है|

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  4. सुमित कर्ण

    सुमित कुमार कर्ण

    आपने सही लिखा है।

    ”इस राठौड़ को तो सज़ा मिल जाएगी लेकिन क्या समाज में हमारे आस-पास विराजे इन जैसे दूसरे राठौड़ों को सज़ा मिल पाएगी? इसका जवाब साफ तौर पर न है। क्योंकि इस राठौड़ के साथ हमारे समाज के सैंकड़ो राठौड़ को न तो कानून से और न ही समाज से सज़ा मिल सकती है।”

    कब चेतेंगे हम।

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  5. vijayprakash

    लेख की शैली विचारोत्तेजक है.एक कड़वी सच्चाई की ओर ध्यान आकर्षित किया है

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