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    Homeराजनीतिचरमराने लगी है कोरोना काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था

    चरमराने लगी है कोरोना काल में ग्रामीण अर्थव्यवस्था

    -अशोक “प्रवृद्ध”

    भारत के शहरी क्षेत्रों को प्रभावित करने के बाद वैश्विक कोरोना महामारी ने अब ग्रामीण क्षेत्रों में भयंकर तबाही मचाना शुरू कर दिया है। भारत में कोरोना की दूसरी लहर सिर्फ शहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों को भी अपनी चपेट में ले लिया है और देश के गांवों में यह महामारी तेजी से फैल रही है। कई राज्यों में ग्रामीण इलाकों से मिल रही सूचनाओं के अनुसार कोरोना से सिर्फ शहरी क्षेत्र प्रभावित नहीं है। गांवों में भी संक्रमण का फैलाव तेजी से हो रहा है। पहली लहर के बनिस्पत दूसरे लहर में ग्रामीण इलाके शहरी क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा प्रभावित हैं, और शहर के मुकाबले गांव से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, छतीसगढ़, गुजरात समेत देश के अधिकांश राज्यों के ग्रामीण क्षेत्र कोरोना महामारी की दूसरी लहर से बुरी तरह प्रभावित हैं। गाँवों में इन दिनों सर्दी, जुकाम, खांसी और बुखार आम है। अधिकांश घरों में कई लोग इन बीमारियों से सुते पड़े हैं। गांवों की सड़कें भी सुनी हैं, हाट-बाजार पूरी तरह से बंद हैं। लोग डरे और सहमे हैं। बाजारों, मंडियों के बंद होने अथवा कम क्षमता पर काम करने के कारण किसानों को फसलों के सही दाम नहीं मिल रहे हैं। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस से बचने के लिए बरती जा रही सावधानी और लॉकडाउन की मार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चरमरा कर रख दिया है, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के भी शहरों की तरह धराशायी होने का खतरा उत्पन्न हो चुका है। चरमराई हुई ग्रामीण अर्थव्यवस्था कराहने लगी है। लोकडाऊन से उत्पन्न आर्थिक स्थितियों से बुरी तरह प्रभावित गाँव व ग्रामीण इस महामारी से तो किसी तरह बच जा रहे हैं, लेकिन रोज़मर्रा की आवश्यक ज़रूरतों का पूरा न होना उनके लिए अलग मुश्किलें खड़ी कर रहा है। संक्रमण के आरम्भिक काल से ही लागू किए गए अनियोजित लॉकडाउन ने अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोगों के जीवन में एक आर्थिक तबाही मचा दी है। इनमें न केवल दिहाड़ी मज़दूर हैं, बल्कि अनियमित अर्थव्‍यवस्‍था में काम करने वाले मजदूर भी शामिल हैं। भारत के कुल कार्यबल का 80% से अधिक हिस्‍सा अनौपचारिक, असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं, इसमें से एक तिहाई कैज़ुअल मजदूर हैं। ऐसे लोगों के समक्ष यह महामारी और अनियोजित लोक डाउन ने आर्थिक संकटों की पहाड़ खड़ी कर दी है। लॉकडाउन के कारण बहुत से लोग शहरों से अपने गांव की ओर पलायन कर गए हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ गया है। सीएमआईई के अनुसार पिछले 15 मार्च से 5 अप्रैल के बीच ग्रामीण बेरोजगारी दर छह प्रतिशत से बढ़कर 20 प्रतिशत पर पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार इस आपदा में भारत में 40 करोड़ लोगों के सामने बेरोजगारी और गरीबी का संकट खड़ा होने की संभावना है। पूर्व से ही 70 प्रतिशत जनसंख्या का बोझ ढो रही ग्रामीण जनसंख्या में पलायन के कारण 75- 80 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इन्हें राहत पहुँचाने के उद्देश्य से रोजगार आदि के माध्यम से इनके बीच धन पहुँचने का स्रोत बनाये बिना, धन पहुंचाकर घरेलू खपत की हिस्सेदारी बढाये बिना ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार में मांग बढ़ने, और अर्थव्यवस्था के मंदी से बाहर आने की कोई उम्मीद नहीं है। दूसरी ओर अभी तक केंद्र अथवा राज्य सरकारों की घोषणाओं से यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि देश अथवा राज्य में फैले कोविड-19 को नियंत्रण के लिए अपनाई गई लॉकडाउन के कारण पहले से ही अनेक कठिनाईयों का सामना कर रहे ग्रामीणों के आर्थिक आपातकाल से निपटने की उसकी क्‍या योजना है?

    यद्यपि सरकार के द्वारा जन वितरण की दूकानों से राशन वितरण,प्रधानमन्त्री आवास, प्रधानमन्त्री किसान सम्मान निधि, गरीब कल्याण योजना आदि जन कल्याण कारी योजनाओं के माध्यम से नगदी स्थानातरण के द्वारा राहत पहुंचाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन चहुंओर आर्थिक तंगी, महंगाई, शिक्षा- स्वास्थ्य, बेरोजगारी, महामारी और अन्य कई प्रकार के समस्याओं व प्रतिबन्धों से जूझते ग्रामीणों के लिए यह ऊंट के मुंह में जीरा सिद्ध हुआ है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना भी ग्राम रोजगार सेवकों, कार्यक्रम पदाधिकरियों, अभियंताओं, जनप्रतिनिधियों, सामग्री आपूर्तिकर्त्ताओं और प्रत्येक गाँवों में कुंडली मारकर बैठे बिचौलियों की भेंट चढ़ गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में जन कल्याणार्थ संचालित अन्य योजनाओं की भी यही स्थिति है। ऐसे में राहत पहुंचाने के सारे उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं। 85 प्रतिशत ग्रामीणों को खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत खाने के लिए राशन उपलब्ध कराया जा रहा है, लेकिन इससे अनेक जरुरतमन्द परिवार आज भी वंचित हैं और यह सभी समस्याओं का समाधान भी नहीं है। भोजन के इतर लोग अन्य खर्चों के लिए बेहाल हैं। कर्जे में डूब रहे हैं। जिनकी जमीन- जायदाद बिक्री योग्य हैं, वे जमीनें बेचकर अथवा जमीन के एवज में अग्रिम पैसा लेकर अपना कार्य किसी प्रकार चलाने को विवश हैं।

    इस विपदा से किसान की आय के सारे स्रोत सूख जाने के कारण किसानों की आमदनी और कर्ज़ चुका पाने की क्षमता कम हो गई है। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में शीघ्र धन का प्रवाह बढाने के लिए किसानों के कर्ज़ की वसूली, रिकवरी, किश्तों के भुगतान को एक वर्ष के लिए स्थगित, क्रेडिट कार्ड की सीमा को दोगुना और इस पर व्याज दर को घटाकर एक प्रतिशत किये जाने की सख्त आवश्यकता है। इससे देश की अर्थव्यवस्था को मंदी से निकलने में मदद मिलेगी। अन्यथा आमदनी घटने के कारण किसान साहूकारों से महंगे ब्याज़ पर कर्ज़ लेने के लिए बाध्य होंगे। अच्छी पैदावार के बावजूद खाद्य पदार्थों और कृषि उत्पादों की वितरण व्यवस्था बाधित हो रही है। फल-सब्ज़ियों को मंडियों तक पहुंचा पाना मुश्किल होने के कारण ये खेतों में ही सड़ने लगे हैं। कृषि से सम्बन्धित अन्य व्यवसाय- दुग्ध उत्पादन, पशु पालन, कुक्कुट पालन, मधु मक्खी पालन आदि पर भी इस महामारी का व्यापक असर हुआ है। दूध, मांस, मछली, मुर्गे, अंडे की मांग और खरीद कम हो गई है। पशु-आहार आदि के मूल्य बढ़ जाने से पशुओं को उचित मात्रा में पौष्टिक आहार नहीं मिल पाने के कारण पशुओं ने दूध देना कम कर दिया है। मुर्गियों और चूज़ों के भूख से मरने, वजन कम होने और कम अंडे देने की दर बढ़ गई है। बाजार के अभाव में किसानों को हो रहे नुकसान और महंगाई से जूझते उपभोक्ताओं को देखकर सरकार को मंडियों और इससे जुड़ी सारी खाद्य श्रृंखला की व्यवस्था को शीघ्रातिशीघ्र अपनी पूरी क्षमता पर निर्बाध रूप से शुरू करने का व्यवस्था करना चाहिए। मौजूदा काल में फ़सलों की समय पर खरीद, भंडारण, बुवाई और खाद्य पदार्थों की वितरण व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित नहीं किये जाने से किसानों, उपभोक्ताओं और अंततः देश को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। कोरोना संक्रमण जैसे आपातकाल में किसी भी देश के लिए अपने सभी निवासियों को भोजन उपलब्ध करवाना सबसे बड़ी चिंता व चुनौती का विषय होता है। इसलिए देश की खाद्य सुरक्षा की सुनिश्चितता हेतु भी कृषि व कृषि से सम्बन्धित कार्यों के निर्बाध रूप से संचालन योग्य बनाये जाने की आवश्यकता है।

    लोक डाउन में कृषि व विपणन गतिविधियों के सुचारू रूप से नहीं चलने के कारण कृषि कार्य व गतिविधियों पर व्यापक असर पड़ा है और आगामी खरीफ़ की फ़सलों की बुवाई और उत्पादकता प्रभावित होने की सम्भावना उत्पन्न हो गई है।
    खरीफ फसलों की बुवाई हेतु अनुदानित मूल्य पर सभी आवश्यक निवेशों- बीज, खाद, कीटनाशक व खरपतवार नाशक दवाओं की उपलब्धता, इनके आयात, उत्पादन, भंडारण, वितरण और बिक्री की व्यवस्था को निर्बाध चलने योग्य बनाकर ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है। असमय व बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि एवं तूफान के कारण बड़े पैमाने पर कई राज्यों में हुई फसलों के व्यापक नुकसान का आंकलन और कृषि बीमा योजना के अंतर्गत दावों के भुगतान की व्यवस्था निर्बाध रूप से चलने की व्यवस्था किये जाने से किसानों को कुछ राहत महसूस होगी। भोजन से जूझ रहे रहे लोगों को तत्काल राहत उपलब्ध कराये जाने हेतु खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत आने वाले जरुरतमन्द लाभार्थियों की सूची में अपंजीकृत, अनामांकित ज़रूरतमंद लोगों के आधार कार्ड को ही राशनकार्ड मानकर इन्हें भी राशन दिए जाने, ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने की योजना मनरेगा के तहत काम के मिलने की अनिश्चितता दूर करने के लिए योजना को इस समय कृषि कार्यों से जोड़े जाने की आवश्यकता है। मांग जनित इस योजना में मांग बढ़ने पर इस योजना का बजट भी उसी के अनुसार बढ़ाना होगा। स्थानीय अकुशल श्रमिकों सहित पलायन कर वापस लौटे ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना, मनरेगा सहित ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित की जाने वाली सभी योजनाओं के बजट को बढ़ाकर दोगुना कर देना चाहिए। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मिलने में आसानी होगी और अतिरिक्त धन-प्रवाह से देश की अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा।

    बहरहाल ऐसी संकटमय स्थिति, आपातकाल, आर्थिक तंगी के मध्य यह यह कोरोना ग्रामीणों के बीच कहर बनकर टूटी है, लोग डरे हुए हैं, सर्दी, जुकाम, बुखार, कोई- कोई तो खांसी से भी पीड़ित हैं, ऊपर से कोरोना रोधी टीका के विरोधी अफवाह के कारण लोग सशंकित हैं, उन्हें सूझ नहीं रहा, करें तो क्या करें? गाँव- गाँव में शिविर लगाकर कोरोना जांच की जा रही है। अनेक लोग संक्रमित पाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री राहत कीट के द्वारा जरूरत की दवाएं देकर स्व- अलगाव अर्थात सेल्फ आइशोलेशन में रखा जा रहा है। ऐसी स्थिति देश के अधिकांश राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों की है। ऐसी परिस्थिति में संक्रमण से बचाव हेतु समुदाय के सदस्यों को स्व निगरानी की शिक्षा, सेल्फ आइसोलेशन और सरकार तथा स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा निर्देशित सावधानियों के अनुपालन के महत्व, संक्रमण के लक्षणों, और चिकित्सकों से सम्पर्क करने की परिस्थितियों के सम्बन्ध में शिक्षित किया जाना बेहतर होगा। सरकारी व निजी प्रयोगशालाओं द्वारा मुफ्त जांचों की संख्‍या को बढ़ाने, नकली परीक्षण, मास्‍क, साबुन, सेनिटाइजर आदि की काला-बाजारी, बेईमान व्यवहार के खिलाफ अनुकरणीय और तेज कार्रवाई कर इनके मूल्य नियमन को सुनिश्चित करने हेतु कदम उठाये जाने की आवश्यकता है। गरीबों, किसानों, मज़दूरों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए सरकार ने कई बड़े निर्णय लिए हैं, और उम्मीद है कि देश हित में सरकार और निर्णय भी लेगी तथा इनका ज़मीन पर सही क्रियान्वयन भी होगा।

    अशोक “प्रवृद्ध”
    अशोक “प्रवृद्ध”
    बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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