लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

रामभुलावन आज सुबह बहुत गुस्‍से में आया था । गणतंत्र दिवस था, मैंने दरवाजा खोला तो उम्‍मीद नहीं थी अंदर आए वगैर ही रामभुलावन इस तरह से मन में दबी हुई अपनी किसी बात पर प्रतिक्रिया देगा ।

मैंने कहा… रामभुलावन आज खुशी का मौका है …देश को आज ही के दिन तो अपना कानून मिला था। वह कानून जो भारत के आम नागरिक को यह विश्‍वास दिलाता है कि तुम्‍हें किसी प्रकार से भयभीत होने की जरूरत नहीं। भारत एक सम्‍प्रभू राष्‍ट्र है, जिसमें हर नागरिक के अपने अधिकार और कर्तव्‍य हैं। हर कोई स्‍वतंत्र है, घूमने के लिए , अपनी अभिव्‍यक्‍ति के लिए …..

पूरा देश आज के दिन जश्‍न मना रहा है, देखा नहीं…फेसबुक, ट्वीटर, वाट्सप जैसे तमाम सोशल मीडिया माध्‍यमों से लेकर चहुंओर गणतंत्र दिवस की धूम पिछले 24 घण्‍टों से मची हुई है ओर आगे यह ओर 24 घण्‍टे इसी तरह अनवरत जारी रहने वाली है।

रामभुलावन अंदर आया और बिना बैठे ही आक्रोश के साथ अपनी बात कहने लगा……

साहब, मैं पिछले कुछ दिनों से बहुत व्‍यथित हूँ । संवेदना के स्‍तर पर मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ की भगवान ने मुझे आदमी बनाकर कोई गलती तो नहीं कर दी ? इससे तो अच्‍छा में जानवर बन जाता तो बेहतर रहता । कम से कम जानवरों में तो फिमेल के प्रति हमसे कई गुना ज्‍यादा संवेदना रहती है…..

मैंने कहा, क्‍या हो गया है भाई ? इतना नाराज और दुखी तो मैंने पहले कभी तुम्‍हें नहीं देखा ?

उसने कहा, साहब बात ही कुछ ऐसी है। मैं भी बाल-बच्‍चे वाला हूँ, मेरी भी बेटियां हैं। ऐसे में सोचता हूँ, कहीं मैं अभागा बाप न बन जाऊँ, इन दिनों हर औरत में मुझे मेरी बेटी नजर आ रही है । समाचार पढ़ता हूँ कि फंला के साथ अत्‍याचार हुआ है, वह अत्‍याचार फिर किसी भी स्‍तर पर हो, मुझे हर बार यही लगता है कि वह मेरे घर में ही कहीं हो रहा है।

साहब, हम कब आजाद होंगे और हकीकत में वह दिन कभी आएगा, जब हमारा गण सही मायनों में स्‍वतंत्र होगा ? परतंत्रता और भय आज भी कई स्‍तर पर मौजूद है…..देश की आधी आबादी अब तक स्‍वतंत्र नहीं है। घटनाएं इतनी हैं साहब कि गिनाने बैठूं तो कई दिन और रात भी कम पड़ जाएंगे।

रामभुलावन से मैंने कहा कि अब क्‍या हो गया ? और तुम्‍हें क्‍या लगता है सरकार अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रही ? कानून राज क्‍या समाप्‍त हो गया है? रामभुलावन, साहब ये सब मैं नहीं जानता लेकिन जो देख-सुन रहा हूँ, उससे तो यही लगता है कि आदमी का अब ओर कितना नीचे गिरना शेष है, कभी इसकी सीमा समाप्‍त होगी कि नहीं ?

मध्‍यप्रदेश में हाल ही में दो दिन में दो घटनाएँ घटी हैं, एक में लड़की को सांप ने काटा तो पता चला कि उसके साथ पहले सामूहिक दुष्‍कर्म हुआ है । यदि वह सांप के काटने पर अस्‍पताल नहीं पहुँचती तो यह बात कभी पता ही नहीं चलती । साहब…. देश में ऐसी कितनी लड़किया होंगी जो आदमी की गंदी मानसिकता का दिन-रात शिकार होती हैं, लेकिन लाज-शर्म के चलते वे कहीं कुछ नहीं कहतीं । यह लाज-शर्म भी तो हमीं ने बनाई है, क्‍या यह औरत की अस्‍मिता से भी ऊपर है ?…

अभी हाल ही में पंचायत ने गांव की महिलाओं पर चरित्रहीनता का आरोप लगाया, आरोप लगाना एक बात है साहब…किंतु उन तमाम महिलाओं को एक साथ जूतों की माला पहनाकर जुलूस में निकालना दूसरी बात । महिलाओं के चरित्र का ठेकेदार आदमी कब तक बना रहेगा ?… ये हम कौन सा समाज बना बैठे हैं ?…

महिलाओं को पीट-पीट कर मारा जा रहा है । सरकारें कन्‍या भ्रूण हत्‍या रोकने के लाख प्रयत्‍न कर रही हैं लेकिन आदमी बाज नहीं आ रहा, वह औरत को पैदा होने से पहले ही मार दे रहा है। साहब… मेरे एक मित्र हैं पंकज जी, वे सुबह सवेरे अखबार की नौकरी करते हैं, उन्‍होंने आज सुबह फेसबुक पर एक फोटो साझा की, मैं उसे देखकर बहुत देर तक रोता रहा हूँ, छोटे से एक डब्‍बे में बेटी.. उफ्फ ….हाय मैं मर क्‍यों नहीं जाता….क्‍या हो गया है आदमी को..यह वहशीपन…ये जंगलीपन….नहीं नहीं साहब, जंगलीपन भी शायद इस वहशीयाने से कम है….

गर्भवती पत्नी का पेट ब्लेड से चीरा जा रहा है, शराब पीने का विरोध करने पर महिला का मुंह खौलती कड़ाही में डाला जा रहा है, 80-वर्षीय बूढ़ी को निर्वस्त्र कर गधे पर घुमाया जा रहा है, देह व्यापार से इनकार करने पर महिला की बेरहमी से पिटाई हो रही है, जहां वेश्यावृत्ति से इनकार करने पर ससुराल वाले ही महिला का सिर काट दे रहे हैं, गर्भवती बहू को नदी में फि‍कवाने से भी यहां लोग नहीं चूक रहे, इतना ही नहीं सिरफिरे पत्नी के गुप्तांग में ताला लगाने से भी बाझ नहीं आते हैं, सरे आम उन पर तेजाब डालने और एक तरफा प्‍यार में जान से मार देने तक की घटनाएं आम हैं, ऐसे में साहब लगता है आदमी से अच्‍छे तो जानवर हैं, कम से कम हम कह तो सकते हैं कि वे जानवर हैं …अब आदमी को हम क्‍या कहें …?

अब तक रामभुलावन की बाते सुनकर मैं भी बहुत व्‍यथि‍त हो चुका था, वह बोले जा रहा था और मैं सुन रहा था… ऐसा कोई दिन नहीं बीतता साहब, जब देश के कई कोनों से महिलाओं पर अत्याचार की घटनाओं की खबर न आती हों । आदमी ने आज दरिंदगी और हैवानियत की सभी हदें पार कर दी हैं… जब छह वर्ष, आठ वर्ष या ग्यारह वर्ष की बच्चियों के साथ अमानुषिक बलात्कार की घटनाएँ घटती हैं तो समझ ही नहीं आता कि क्या हों गया है , आदमी को …? इन मासूम बच्चियों में भला इन नर पिशाचों को कौन सा आकर्षण दिखता है या ये कैसे इन नर पिशाचों को उकसाती हैं, ये समझ से परे है…

साहब..कहीं कोई आशा की किरण नहीं दिखाई दे रही। लोकतंत्र का आज का यह सबसे बड़ा जश्‍न गणतंत्र दिवस, कानून का दिन मुझे हर बार की तरह फीका नजर आ रहा है। जिसमें औपचारिकता तो हैं लेकिन आवाज नहीं, जोश नहीं ….

प्रश्‍न यह भी है कि औरत कब तक भोग विलास की सीमाओं में बंधी रहेगी ? क्‍या कभी इस पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को न्याय मिलेगा ? क्‍या औरतों को ही कानून अपने हाथ में ले लेना चाहिए जैसे कि कुछ वर्ष पूर्व मुंबई के एक कोर्ट में हुआ था, जहाँ औरतों ने सबके सामने ही एक बलात्कारी आरोपी को मार डाला था…मणिपुर में महिलाएं नग्न आंदोलन करने के लिए सड़कों पर उतर आयी थीं …साहब लगता है कि शायद ये सब भी कम उपाय हैं …आदमी संस्‍कारों, परिवेश से बंधा है, क्‍यों नहीं उसके संस्‍कारों और परिवेश में ही परिवर्तन के सार्थक उपाय किए जाते हैं ? जिसके बाद कुछ तो इस मामले में आशा की किरण जागेगी…

रामभुलावन ने कहा, गणतंत्र का दिन भारत जैसे मेरे देश में तब तक सार्थक नहीं होगा साहब, जब तक यहां आदमी अपनी आधी आबादी के साथ जंगली से भी बदतर व्‍यवहार करता रहेगा। साहब, आज आदमी के ऐसे गंदे जीन में ही परिवर्तन किए जाने की जरूरत है, वैज्ञानिक कहते हैं कि परिवेश और संस्‍कारों से जीन भी समय के साथ बदल जाते हैं, तो क्‍यों नहीं हमारी सरकार और समाज के ठेकेदार और हम सभी ऐसे उपाय करते , फिर वे नैतिक शिक्षा के माध्‍यम से हों या अन्‍य सामाजिक गतिविधि और सहयोग के माध्‍यम से, जिसमें आदमी कितनी भी विपरीत परिस्‍थ‍ितियों में क्‍यों न हो, कम से कम औरत के प्रति अपने बहशीपन पर, दरिन्‍दगी पर तो उतारू न हो ….काश …ऐसा हो पाए…

मैं भी आज, अब तक रामभुलावन की ये सारी बातें सुनकर अंदर तक हिल चुका था , विचार सतत थे कि रामभुलावन कह तो सही रहा है । गणतंत्र को सफल बनाने के लिए हमें स्‍वयं से ही पहल करनी होगी …..

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