साहित्य और मनोविज्ञान

साहित्य मानव अनुभूतयों और सामाजिक व्यवहार का दर्पण होता है। साहित्यकार अपनी व्यक्तिगत कल्पनाओं और प्रतीकों के आधार पर, यथार्थ के धरातल पर, मानवीय संवेगों को संजोकर कोई रचना लिखता है। दूसरी ओर मनोविज्ञान व्यवहार का विज्ञान है, जो मन मे उठते अंतर्द्वन्दों, ,संवेगों और उद्वेगों के प्रभावों का अध्ययन करता है।

साहित्य का क्षेत्र असीम है, अनन्त है तो मनोविज्ञान का क्षेत्र और विस्तार हर उस जगह है जहाँ मानव है, मानव ही क्यों मनोविज्ञान पशु पक्षियों के व्यवहार का भी अध्ययन करता है। साहित्यकार की भी किसी रचना का मूल विषय पशु पक्षियों के व्यवहार से संबन्धित हो सकता है। कहते हैं जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि। मनोविज्ञान भी मन की उन पर्तो तक पहुँचता है जिसे अवचेतन और अचेतन कहते हैं।

कार्यक्षेत्र की समानता होते हुए भी दोनों में बहुत अंतर होता है। साहित्यकार की शिक्षा उसके लिये बहुत उपयोगी है, जितना वह पढ़ेगा साहित्य उतना परिष्कृत होता जायेगा परन्तु साहित्य  सृजन के लिये शिक्षा अनिवार्य शर्त नहीं है। कबीर के दोहों से कौन परिचित नहीं है वे तो पढ़े लिखे भी नहीं थे। सलाह देने को तो यहाँ सभी सलाहकार हैं पर जिसे मनोवैज्ञानिक काँउसैलिग और सायकोथैरैपी कहा जाता है वह केवल एक प्रशिक्षित और लाइसैंस प्राप्त मनोवैज्ञानिक ही दे सकता है। बहुत से बड़े बड़े साहित्यकार ये भ्रम पाले रहते हैं कि वह  अनुभूतियों को इतनी अच्छी तरह समझते हैं कि वे किसी मनोवैज्ञानिक से कम नहीं हैं।

साहित्यकार का उद्देश्य मनोरंजन हो सकता है, समाज को शिक्षित करना  हो सकता है, सकारात्मक दिशा देना हो सकता है, जो साहित्य केवल विकृतियों का खुला वर्णन करके छोड़ दे वह साहित्य नहीं हो सकता। मनोविज्ञान विकृतियों का अध्ययन करके उसके समाधान के रास्ते खोजता है।

साहित्यकार नैतिक और अनैतिक संबंधों पर कोई रचना लिख सकता है फिर भी उसका दायरा सीमित होता उसे एक अलिखित आचार्य संहिता का पालन करना  होता समाज में व्याप्त मान्यताओं में एक सीमा   तक बंधना होता है। उदाहरण के लिये मुस्लिम समाज में कजन विवाह या संबंधों को मान्यता मिली हुई वहाँ इन संबंधों पर कोई उपन्यास या कहानी लिखी जा सकती है पर हिंदू समाज में यह इनसैस्ट है इसे घृणित माना जाता है, जो ग़लत भी नहीं है।  इंसैस्ट रिश्तों पर साहित्यकार ज्यादा नहीं लिख सकता पाठक ही नकार देंगे। अश्लील माना जायेगा। हाँ साँकितक रूप से कभी कुछ कह सकते हैं। मनोवैज्ञानिक इनसैस्ट पर निर्णयात्मक नहीं होंगे वे थू थू नहीं करेंगे। इनसैस्ट रिश्ते में फंसे लोगों को उससे निकालकर उनका समाज में पुनर्वास करने के लिये प्रयत्नशील रहेंगे। वह पूरी गोपनीयता बरतेंगे।

भले ही साहित्यकार नैतिकता के कोई मापदण्ड नहीं बनाता फिर भी बोल्ड के  नाम पर वह गंदगी परोसेगा तो उसे कुछ लोग शाबाशी दे दें पर ज्यादातर उसकी रचना को नकार दिया जायेगा। यह इस प्रकार की बात होगी कि आपने गटर का ढक्कन खोल दिया सफ़ाई करनी आती नहीं बदबू और ज़हरीली गैस से लोग बीमार हो रहे हैं।

साहित्यकार अपने अनुभव, अनुभूतियों और सामाजिक वातावरण से प्रभावित हो कर कोई रचना लिखता है। मनोवैज्ञानिक अपने व्यक्तिगत स्तर से ऊपर उठकर निरपेक्ष रूप से समस्या को पहले से स्थापित सिद्धान्तों की पृष्टभूमि मे समझकर समाधान ढ़ूँढने का प्रयत्न करता है। वह कोई नैतिक स्तर नहीं बनाता ना ही वह निर्णयात्मक होता है। मनोविज्ञान के सिद्धान्त पर्याप्त अनुसंधान के बाद स्थापित किये जाते हैं। साहित्यकार का अनुसंधान स्थल उसका मन और मस्तिष्क होता है, वह कोई उपकरण नहीं मांगता और न कोई सिद्धान्त बनाता है, बस काग़ज़ और क़लम के भरोसे अपना काम करता है। साहित्यकार अधिकतर स्वान्तःसुखाय ही लिखता है, ,इसलियें वह साहित्य सृजन को अपना व्यवसाय नहीं बना पाता। बड़े बड़े साहितयकार जिनकी लेखनी ने चमत्कार दिखाये हैं, अपने आरंभिक दिनो मे ग़रीबी से जूझे थे। बहुत कम साहित्यकार साहित्य सृजन को अपनी रोटी रोज़ी का साधन बना पाते हैं। साहित्य विधा ही ऐसी है कि यदि उसका व्यावसायीकरण किया जाय तो वह साहित्य ही नहीं रह जायेगा।

मनोविज्ञान आज पूरी तरह से व्यवसाय बन चुका है। जीवन के हर क्षेत्र मे मनोवैज्ञानिको की आवश्यकता महसूस की जा रही है। चिकित्सा, शिक्षा, खेल जगत और कौरपोरेट जगत के अतिरिक्त कई क्षेत्रों मे मनोवैज्ञानिक कार्यरत हैं।

मनोविज्ञान दर्शन शास्त्र से प्रभावित होकर वैज्ञानिक विधियाँ अपनाकर अनेक अनुसंधान करने के बाद एक स्वतन्त्र विषय के रूप मे स्थापित हुआ है। साहित्य पर भी विभिन्न संसकृतियों और भाषाओं का प्रभाव पडता है। साहित्यकार अधिकतर बहुत पढ़ता है, उसकी रचनायें भी दूसरे लेखकों के प्रभाव से अछूती नहीं रहतीं । साहित्यकार अपने आसपास के महौल,,ऋतुओं व संवेगों से प्रभावित होकर पात्रों के चरित्र मे रंग भरता है ।

मनोविज्ञान भी मानता है कि ऋतुओं का प्रभाव व्यक्ति की मानिकता उसकी भावना और संवेगों पर पड़ता है। मनोविज्ञान व्यक्तित्व का विश्लेषण करता है। अनुभूतियाँ वही होती हैं, पर पकड़ अलग होती उद्येश्य भी अलग होते हैं। मनोविज्ञान मानवीय समसयाओं को परिस्थितियों के संदर्भ मे समझ कर सुलझाने के लियें प्रयत्नशील रहता है।

साहित्यकार का क्षेत्र कंहीं दूर पंहुँच कर प्रतीकात्मक रूप मे समस्या का हल दे जाता, ,जो अपरोक्ष होता है, लेखक किसी व्यक्ति की समस्या सुलझाने के लियें कुछ नहीं लिखता, पर कभी कभी कोई साहित्यिक रचना किसी के जीवन की दिशा बदल सकती है।

मनोवैज्ञानिक अचानक कुछ नहीं करता, हमेशा समस्या की जड़ तक पंहुँचने मे लगा रहता है, जब कारण मिल जात हैं तो समाधान ढूँढना सरल हो जाता है। यदि समस्या का कोई समाधान हो ही नहीं तो भी मनोवैज्ञानिक उसे एक सत्य के रूप मे स्वीकारने और उसका सामना  करने के लिेये व्यक्ति को तैयार करता है। कुछ साहित्यिक कृतियाँ भी ये काम कर जाती हैं।

मनोविज्ञान बुद्धि, अभिरुचियों, ,संवेगों और समूचे व्यक्तित्व को आँकने के लियें मापदण्ड बनाता है। इन्हें बनाने के लियें वैज्ञानिक विधियों से अनुसंधान किये जाते हैं, फिर इन मापदणडों की वैधता को भी सत्यापित करना पड़ता है। साहित्यकार इनही व्यकतिगत विशेषताओं को किसी चरित्र के ताने बाने मे कल्पना और यथार्थ के सहारे बुनकर पात्रों क चरित्र का विकास करता है। वह मानवीय अनुभूतयों का अपरोक्ष रूप से मूल्याँकन भी कर सकता है।

साहित्य मनोरंजन भी देता है, मनोविज्ञान मनोरंजन तो नहीं देता पर मनोरंजन को आवश्यक मानता है, तनाव कम करने के लियें। सहित्यकार मानव ही नहीं पशु पक्षियों को भी अपनी रचना का मुख्य पात्र बना सकता है। मनोविज्ञान भी पशुओं पक्षियों के व्यवहार का विधिवत अध्ययन करता है। वह जानने की कोशिश करता है कि कबूतर को ही संचार का माध्यम क्यों बनाया गया किसी और पक्षी को क्यों नहीं, ,इस तरह पशु पक्षियों विशिष्ठ क्षमताओं का अध्ययन मनोविज्ञान की एक अलग शाखा कम्पैरिटिव सायकौलौजी में के अंतर्गत किया जाता है।

बच्चों की जिज्ञासाओं की अभिव्यक्ति कविता मे हो सकती है,, जिज्ञासा का समाधान कहानी मे मिल सकता है। बाल मनोवैज्ञानिक इनही भावनाओं का, ,जिज्ञासाओं का, अंतर्द्वनदों का और दुविधाओं का निरीक्षण और परीक्षण करते हैं। यदि बच्चों की कोई व्यावहारिक समसया हो तो उनसे सलाह ली जा सकती है।

किसी उपन्यासकार के पात्रों के चरित्र इस प्रकार उभरते हैं कि मनोवैज्ञानिक भी चकित रह जाते हैं। मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यासों मे और कहानियों मे मध्यवर्ग की कशमकश और जीवन के उतार चढाव की अभिव्यक्ति पढ कर कई मनोवैज्ञानिक तथ्य सामने आते हैं।

मनोविज्ञान के सिद्धान्त सार्वभौमिक होते हैं, फिर भी संसकृति, काल और देश से अछूते नहीं रह सकते। मनोविज्ञान की कार्य प्रणाली वैज्ञानिक होती है पर व्यवहार पर वातावरण का प्रभाव पड़ता है, इसलियें मनोविज्ञान के सिद्धान्त लचीले होते हैं। साहित्यकार कोई सिद्धा्न्त नहीं बनाता पर रचना की समीक्षा कर सकता है। व्याकरण और भाषा विज्ञान का ज्ञान लेखन को परिष्कृत करता है उसी तरह मनोविज्ञान के मूल सिद्धान्तों का अध्ययन करने के बाद ही पर्याप्त प्रशिक्षण लेकर ही कोई मनोवैज्ञानिक परामर्ष देने के योग्य बनता है। साहित्यकार के लियें भले ही व्याकरण का ज्ञान अनिवार्य न हो पर मनोवज्ञानिक के लिये मनोविज्ञान की शिक्षा और प्रशिक्षण अनिवार्य होता है। 

कुछ साहित्य ऐसे लोग रच गये जिन्हें स्वयं अपनी योग्यता का अन्दाज़ ही नहीं था। कबीर रहीम रैदास के दोहों में ज्ञान का भंडार भरा हुआ है,,वे तो शिक्षित भी नहीं थे। इसी प्रकार समाज मे कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनकी सोच सुलझी हुई होती है, जिनसे आप अपनी दुविधायें और समस्यायें बाँट सकते हैं, ये कभी कभी समस्या का समाधान भी दे सकते हैं, भले ही इन्होंने कभी मनोविज्ञान न पढा हो,  परन्तु बिना शैक्षिक योग्यता और पर्याप्त प्रशिक्षण के कोई व्यक्ति व्यावसायिक तौर पर प्रैक्टिस नहीं कर सकता।

साहित्यकार के लियें पढना, ,सोचना, विवेचन करना, व्याकरण सम्मत भाषा लिखना रचना का आकर्षण बढाता है। शब्दों का चयन विषय के अनुकूल होना चाहिये। कलापक्ष और भावपक्ष मे समन्वय होना चाहये। मनवैज्ञानिक को भी समस्या की सतह तक पंहुचने के लिये अलग अलग तरीके अपनाने होते हैं और उसी के अनुसार समाधान खोजने होते हैं।

मनोविज्ञान और साहित्य की प्रणालियाँ अलग होती हैं पर विषय-वस्तु एक ही है, मनुष्य और अन्य प्राणियों का व्यवहार।

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