समकालीन साहित्य

साहित्यकारों के कुछ प्रिय विषय हैं,जिन्हे बार बार लिखकर उन्हे सार्वभौमिक सत्य की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है।सार्वभौमिक सत्य वह होते हैं जो हर काल में, हर स्थान पर खरे उतर सकते हों ।एक ही बात को बार बार कहा जाय तो वह सार्वभौमक सत्य लग सकती है, हो नहीं सकती ।कुछ विषय ऐसे हैं जिन पर जिन पर लिख लिख कर वो न थके हों पर कुछ पाठक पढ़ पढ़ कर ऊब चुके हैं, जैसे पूर्व में सब कुछ अच्छा है पश्चिम सब बुरा ।कुछ बातों पर लिख लिख कर साहित्यकारों ने अपनी बातों को सार्वभौमिक सत्य बना देने का पूरा प्रयास किया है।हर सभ्यता का मूल्यांकन हम नहीं कर सकते हैं। सभ्यताओं में मिश्रण भी होना स्वाभाविक है, कोई पूछे कि क्या देवदासी प्रथा, वेश्या वृत्ति ,दहेज़ प्रथा महिलाओं पर अत्याचार उनका शोषण पश्चिम की देन है!पश्चिम से हमने विज्ञान और तकनीक ली है, वहाँ से थोड़ा स्वच्छ रहने का भी ज्ञान ले लेते। सड़क पर थूकना, दीवार से सटकर पुरुषों का……., पालतू कुत्तों के लियें सार्वजनिक स्थानों को शौचालय बना देना तो कम से कम पश्चिम की देन नहीं है।जब तक हम अपने मुंह मियामिट्ठू बनना और कमियों को स्वीकारना नहीं सीखेंगे ,अतीत में जीते रहेंगे सामाजिक स्तर पर कोई सुधार नहीं कर सकेंगे।हमारे साहित्यकारों को पश्चिमी पहनावे पर ऐतराज़ है ये सारी बुराइयों की जड़ है। पश्चिमी पहनावा अब वैश्विक पहनावा बन चुका है, क्योंकि वह अवसर के अनुकूल होता है।पुरुषों ने तो न जाने कब से पैंट शर्ट सूट पहनना शुरू कर दिया क्योंकि वह सुविधाजनक है पर औरतों ने जब बदलाव किया तो संसकृति आड़े आ गई।हमेशा साड़ी मे सजी मांथे पर बड़ी सी बिंदी लगाये महिला बहुत सुदृढ़ चरित्र की होगी और यदि पश्चिमी पहनावा पहनती है तो वह दंबग किस्म की हो सकती है……कमसे कम वह एक आम ग्रहणी नहीं होगी।

भारत में जितना बुज़ुर्गों का सम्मान होता है कहीं नहीं होता पर हमारे साहित्यकार बुजुर्गों को लेकर इतने संवेंदनशील कि पूरी जवान पीढ़ी को अपराधबोध से ग्रस्त कराना चाहते हैं। किसी जवान का विदेश जाना अपराध ही की तरह पेश किया जाता रहा है। यदि जवान कहीं मौज मस्ती करें तो भी अपराध बोध से ग्रस्त रहें क्योंकि साहित्यकार के अनुसार उस चरित्र को माता पिता की सेवा करनी चाहिये थी, या उन्हे तीर्थ पर लेजाना चाहिये। अपने लिये कुछ करना भारत में स्वार्थी होने के बराबर ही माना जाता है। बहू तो कभी अच्छी हो ही नहीं सकती ये सब इस तरह से पेश करते हैं जैसे ये सार्वजनिक सत्य हों।जबकि एक हजार परिवारों में कंहीं कोई एक होगा जिसने अपने बुजुर्गों को संरक्षण ना दिया हो ,पर समाचार जिस तरह नकारात्मक ही होते हैं, साहित्यकार की कहानी भी वहीं से नकारात्मक कथानक चुनती है।

जिस समय माता पता की उम्र८० के आस पास होगी तो उनकी संतान की आयु भी पचास के लगभग होगी इस समय वह इंसान घर दफ्तर और परिवार की इतनी जिम्मेदारियों में घिरा होगा कि वह माता पिता को पर्याप्त समय नहीं दे पायेगा। अब हमारे साहित्यकार माता पिता के अहसान गिनायेंगे कि तुम्हे उन्होने उंगली पकड़ कर चलना सिखाया वगैरह….. अब उनका वक़्त है……….।हर बेटे या बेटी को अपने माता पिता की सुख सुविधा चिकित्सा के साधन जुटाने चाहिये ,अपनी समर्थ्य के अनुसार चाहें मातापिता के पास पैसा हो या नहो।बुजुर्गों को भी पहले से ही बढ़ती उम्र के लिये ख़ुद को तैयार करना चाहिये। वह अपने बुढ़ापे में अकेलेपन से कैसे निपटेंगे क्योंकि बच्चों को और जवान होते हुए पोते पोती को उनके पास बैठने की फुर्सत नहीं होगी। यह सच्चाई यदि बुज़ुर्ग स्वीकार लें तो उन्हे किसी से कोई शिकायत नहीं होगी।

मैने जीवन में इसके विपरीत घटनायें भी देखी हैं, ऐसे पिता देखे हैं जो अपने सपने बच्चों पर थोपते है, जैसे पिता गायक नहीं बन सके तो वो अपनी पूरी शक्ति बेटे को गायक बनाने में लगा देंगे, यदि बेटे के अभिरुचि है तब तो ठीक है अन्यथा पिता का सपना पूरा करने के लिये न वो गायक बन पायेगा न कुछ और।बस जो वो चाहते वह बच्चे को बनाकर छोड़ेगें बच्चे की रुचि उसमे है या नहीं, ये जानना ज़रूरी नहीं है, बच्चे के दिमाग़ मे बचपन से कूट कूट कर भर दिया जायेगा कि तुझे ये बनना है तो बनना है।
अच्छा होने और आदर्शों की दुहाई देने में फर्क होता है। संबध सफेद या काले नहीं होते हैं ग्रे ही होते एक तरफ़ बेचारगी दूसरी तरफ आदर्श का ढ़ोग लिखना चाहे जितना अच्छा लगे पर पाठक की कोरी संवेदना जगाता है जिसका कोई सकारात्मक असर नहीं होता।ऐसी बहुएं भी जो व्यस्त होने के बावजूद सास ससुर की देखभाल करती हैं पर अगर सास ससुर की उम्मीदें आसमान छूने लगें तो बहू के क़दम पीछे हटेंगे , स्वाभाविक है।रिश्तों में कोई सार्वभौमिक सत्य नहीं होता । माता कुमाता हो सकती है।परिवार के मान की रक्षा के नाम पर अपने बच्चों को मारने वाले माता पिता की बातें तो आये दिन अख़बारों में आती हैं।हमारी कहानियां और उपन्यास केवल संबधों को एक तरफ़ा सार्वभौमिक सत्य की तरह स्थापित करने में लगे हैं।लीक से हटकर कुछ पढ़ने को मिलता ही नहीं है।
प्रेम भी एक ऐसा ही विषय है जिसे कवि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं पर जो प्रेम साहित्य मे या सिनेमा में दिखाया जाता है वह आम आदमी की ज़िन्दगी से बहुत अलग होता है ये कविता कहानियां किशोरावस्था में बहुत प्रभावित करती है। प्रेमी या प्रेमिका को अपना न बना पाने, अस्वीकृति को न झेल पाने पर हत्या ,आत्महत्या या तेज़ाब से आक्रमण इसी तरह की सोच परिणाम होती हैं।किशोर को लगता है कि फलां व्यक्ति उसे न मिला या उसने उसका प्रणय निवेदन अस्वीकार कर दिया वह जी नहीं पायेगा, जबकि ये सत्य नहीं है, कोई नहीं लिखता कि ये जीवन में घटने वाली आम घटनायें हैं, आगे बढ़ना जिन्दगी है। प्रेमी को प्रेमिका न मिलने पर ख़ुद को या लड़की को नुकसान पंहुचाने का कोई हक नही हैं। साहित्य मे प्रेम का एक विकृत रूप दिखाया जाता है, जिसका असर जाने अनजाने युवाओं पर पड़ता है जिससे वो ग़लत कदम उठा लेते हैं।साहित्यकार कोई समाज सुधारक नहीं होता पर उसे युवाओं को सही रास्ता दिखाना चाहिये।कहीं न कहीं प्रेम में असफलता मिलने वाले जोड़े को आगे बढ़ने का संदेश मिलना चाहिये।एक व्यक्ति जीवन में इतना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता कि उसके लिये जान दी जाय या ले ली जाय या ज़िन्दगी भर दुखी रहा जाय।प्रेम का अर्थ संग साथ विश्वास एक दूसरे की भावनाओं के आदर के साथ शारीरिक आकर्षण भी होता है।काहनियों के चरित्र इसी प्रकार उभरने चाहिये।प्रेम में दोनो आत्महत्या करें, नशेड़े हो जायें, ऐसिड फेंके प्रेम के तीसरे कोण की हत्या करें तो ऐसे कथानक में लेखक को अपरोक्ष रूप से इसकी भर्तसना करनी चाहिये, कम से कम ऐसे प्रेम को गौरवान्वित तो बिलकुल भी नहीं करना चाहिये।
स्त्री और पुरुष के अधिकारों और संबधों के विषय में कोई सार्वभौमिक सिद्धांत हो सकता है तो केवल यह कि दोनों एक दूसरे के सम्मान देने के लिये वचनबद्ध हों ।हमारे यहाँ अधिकतर नारी का बलिदान और शहीद होने वाला व्यक्तित्व गौरवान्वित किया जाता हैजो पूजा पाठ करे ,खाना बनाये ,बच्चों के लिये हर समय बलिदान दे यदि वह अपनी ख़ुशी के लिये कुछ करे, अपने शौक पूरे करे तो वह बहुत स्वार्थी होगी।
शादी के बिना औरत अधूरी है, मातृत्व के बिना औरत अधूरी है यह कहकर उन सभी महिलाओं को जो अविवाहित हैं या जिनके बच्चे नहीं है बार बार अधूरेपन का अहसास करवाकर इसे सार्वभौमिक सत्य के रूप सदियों से पाठकों को परोसा जा रहा है, जबकि ऐसी महिलायें भरपूर और ख़शहाल जीवन बिता सकती हैं, बिता रही है, जबकि कोई पुरुष शादी के बिना या पिता बने बिना कभी अधूरा नहीं होता।
सामाजिक व्यवस्थायें निरंतर परिवर्तित होती हैं।जो व्यवहार कल सही नहीं समझा जाता था वो आज मान्य है।गाँव की मान्यतायें अलग होती हैं शहरों की अलग परन्तु संचार के साधनो के कारण अब ये अँतर कम होगये हैं छोटे शहरों की लड़कियाँ पढ़ने या काम करने महानगरों में जाने लगी हैं।लड़के लड़कियों की मित्रता आम बात है। जोड़ियाँ बनती है टूटती  हैं। लिव इन रिलेशन, विवाह से पूर्व शारीरिक संबध, विवाहेत्तर संबध समाज में हैं, तो इनपर कहानी उपन्यास लिखते समय साहित्यकार को कोई नैतिक भाषण न देकर चरित्रों के माध्यम से प्रतीकात्मक रूप मे सही ग़लत का परिणाम दिखाना चाहिये।
साहित्य और भाषा एक दूसरे से जुड़े हैं।कथानक और चरित्र चित्रण कथा साहित्य का आधार हैं पर इससे भी ज्यादा महत्व भाषा का है।कुछ साहित्कार भाषा की शुद्धता को महत्वपूर्ण मानतें हैं कुछ पात्रानुकूल भाषा के नाम पर कुछ भी लिखने से नहीं हिचकिचाते वो गाली भी हो सकती, कोई स्थानीय बोली भी हो सकती है और हिन्दी इंगलिश की मिली जुली खिचड़ी भी।इसबारे में सबके अलग अलग विचार हो सकते हैं मैं नहीं कह सकती कि क्या ग़लत है क्या सही केवल अपना पक्ष रख सकती हूँ।
मेरे विचार से भाषा की,शुद्धता व उसका व्याकरण सम्मत होना ज़रूरी है। यदि आपकी कहीनी या उपन्यास की भाषा हिन्दी है तो कृति का शीर्षक कहानी में हिन्दी में ही होने चाहियें इंगलिश के शब्दों का प्रयोग तभी होना चाहिये जब हिन्दी में सही शब्द मिले ही नहीं। कुछ शब्द जैसे मशीन, कार,कम्प्यूटर, पैन या ट्रेन जैसे शब्दों के लियें हिन्दी के अव्यवाहरिक अनुवाद करने की ज़रूरत नहीं है, हिन्दी को हास्यास्पद नहीं बनाना चाहिये।शुद्ध भाषा और साहित्यिक कहलाने के मोह में भाषा क्लिष्ट होगी तो, आम जनता उसे नहीं स्वीकारेगी इसलिय बोधगम्य होना भाषा का विशेष गुण है।
साहित्य समाज का दर्पण होता है पर साहित्य में समाज को दर्पण दिखाने की क्षमता भी होनी चाहिये। कथा साहित्य हो काव्य कुछ सोचने के लिये सामग्री दे तभी सार्थक होता है।समाज को अपरोक्ष रूप से बिना प्रवचन या भाषण दिये साहित्यकार प्रभावित करे तभी उसकी रचना सफल होती है।

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